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प्रोफेसर रणबीर सिंह का लेख: स्वतंत्रता और विभाजन का हरियाणा की राजनीति पर प्रभाव

1953 में राज्य पुर्नगठन आयोग की स्थापना के बाद पंडित श्रीराम शर्मा ने गांधी जनता पार्टी, जमींदारा लीग और समाजवादी पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर हरियाणा प्रांत फ्रंट बनाया और अलग राज्य की आवाज बुलंद की। फ्रंट का कहना था कि हरियाणा की भाषा और संस्कृति पूरी तरह से पंजाब से अलग है और दिल्ली, पश्चिमी यूपी और राजस्थान के अलवर, भरतपुर और धौलपुर हरियाणा से मिलते हैं। हरियाणा के नेताओं की इस मांग का अकाली दल ने भी समर्थन किया।

प्रोफेसर रणबीर सिंह का लेख: स्वतंत्रता और विभाजन का हरियाणा की राजनीति पर प्रभाव
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52 में हुए चुनावों का हरियाणा की राजनीति पर गहन प्रभाव पड़ा। लोकसभा की इस क्षेत्र में निर्धारित सभी सातों सीटों पर कांग्रेस के प्रत्याशी चुनाव जीते। कांग्रेस की राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व की वजह से यह जीत संभव हो पाई थी। विधानसभा की भी 45 सीटों में से 42 भी इसी दल ने जीती। जमींदारा लीग का जनाधार केवल जाटाें तक सिमटने के कारण दो ही सीटों पर चुनाव जीत हासिल कर सकी। बहादुरगढ़ से चौधरी श्रीचंद और सांपला से चौधरी माडू सिंह ही चुनाव जीत पाए। ये भी जाट बाहुल्य सीट होने की वजह से हो पाया था।

भारतीय जनसंघ भी शहरों में पंजाबी जनाधार पर सीमित थी इसलिए उसे एक भी स्थान पर जीत नहीं मिल सकी। एक सीट समाजवादी दल ने भी जीती। इसके प्रत्याशी रामप्रकाश जगाधरी की आरक्षित सीट से चुनाव जीते थे लेकिन इसमें उनकी पार्टी का कम और उनका व्यक्तिगत प्रभाव ज्यादा रहा था। इस चुनाव में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बुटाना करनाल में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अपनी जमानत भी जब्त करवा बैठे थे।

चुनाव में गुड़गांव से चुने गए मौलाना अब्दुल कलाम आजाद केंद्र में शिक्षाामंत्री बने और उन्हीं की इच्छा से भीमसेन सच्चर को पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया गया, हालांकि तब विधायकों का बहुत प्रताप सिंह कैरो के साथ था। सच्चर ने हरियाणा क्षेत्र से रोहतक जिले के पंडित श्रीराम शर्मा और चौधरी लहरी सिंह को अपने मंत्रिमंडल में शामिल किया। इसके बाद बदले राजनीतिक घटनाक्रम में अमृतसर से विधायक सतपाल सहगल गुट से टकराव के चलते पंडित श्रीराम शर्मा को 1953 में निकाल दिया गया। इसके बाद नाराज होकर उन्होंने कुछ अन्य नाराज कांग्रेसियों को लेकर गांधी जनता पार्टी का गठन किया। इस पार्टी में गोहाना के मास्टर नांदुराम, पटौदी के पंडित बाबू दयाल शर्मा और

नूंह से मौलवी अब्दुल गनी शामिल हुए।

1953 में राज्य पुर्नगठन आयोग की स्थापना के बाद पंडित श्रीराम शर्मा ने गांधी जनता पार्टी, जमींदारा लीग और समाजवादी पार्टी के नेताओं के साथ मिलकर हरियाणा प्रांत फ्रंट बनाया और अलग राज्य की आवाज बुलंद की। फ्रंट का कहना था कि हरियाणा की भाषा और संस्कृति पूरी तरह से पंजाब से अलग है और दिल्ली, पश्चिमी यूपी और राजस्थान के अलवर, भरतपुर और धौलपुर हरियाणा से मिलते हैं। हरियाणा के नेताओं की इस मांग का अकाली दल ने भी समर्थन किया।

कैरो खेमे के कांग्रेसी विधायक चौधरी देवीलाल, बाबू मूलचंद जैन और प्रोफेसर शेरसिंह ने भी इस मांग के पत्र में आवाज उठाई थी लेकिन जनसंघ ने इसका विरोध किया। एक तरफ जहां चौधरी देवीलाल ने इसे भाषाई और सांस्कृतिक आधार पर उठाया वहीं प्रोफेसर शेरसिंह ने हरियाणा की विकास में अनदेखी, मंत्रिमंडल और सरदारी पदों में भागीदारी नहीं मिलने की बात उठाई और अलग हरियाणा का

समर्थन किया।

हरियाणा प्रांत फ्रंट ने समालखा, सोनीपत और रोहतक में इस मांग के समर्थन में सम्मेलन किए पर कोई बड़ा जनआंदोलन उस वक्त खड़ा नहीं हो सका था। इसके समर्थक विधायकों ने विधानसभा में भी ये आवाज उठाई। हरियाणा के स्थानीय लोगाें विशेषकर जाटों का इस मुहिम को जबरदस्त समर्थन मिला। हरियाणा के पंजाबियों ने इसका विरोध किया। उनका तर्क था कि किसी भी सूरत में पंजाब का एक और विभाजन नहीं हो। जनसंघ ने तो अलग पंजाबी सूबे की मांग के विरोध में यह मांग उठाई की पेप्सू और हिमाचल प्रदेश को भी पंजाब में मिलाना चाहिए।

आयोग ने हरयिाणा प्रांत की मांग को यह कहकर रद कर दिया कि इस घाटे वाले क्षेत्र को अलग राज्य बनाने से इसकी वास्तविक और काल्पनिक शिकायतों को दूर नहीं किया जा सकता है। आयोग ने इस तथ्य को भी अनदेखा कर दिया कि दिल्ली की विधानसभा ने सर्वसम्मति से महादिल्ली के गठन के लिए पंजाब के हरियाणा क्षेत्र, पश्चिमी यूपी और राजस्थान के कुछ भाग दिल्ली में मिलाने की मांग की थी। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 26 विधायकों ने भी इसके पक्ष ज्ञापन दिया था। पंडित नेहरू भी पंजाबी सूबे की मांग और यूपी के विभाजन के पक्ष में नहीं थे इसलिए आयोग ने इस मांग को खारिज कर दिया था।

कैरों समर्थकों के दबाव में 1956 में भीमसेन सच्चर को त्यागपत्र देना पडा और कैरो पंजाब के मुख्यमंत्री बनाए गए। उन्होंने प्रोफेसर शेर सिंह को उप मुख्यमंत्री और मूलचंद जैन को मंत्री बनाया। चौधरी देवीलाल को मुख्य संसदीय सचिव बनाया गया। इस राजनीतिक बदलाव में हरियाणा के विधायकों की अहम भूमिका रही।

पंजाबी सूबे की मांग के न माने जाने के बाद अकालियों को शांत करवाने के लिए और हरियाणा प्रांत फ्रंट को संतुष्ट करने के लिए क्षेत्रीय फार्मूला बनाया गया। पंजाब को पंजाबी और हिंदी क्षेत्र में बांटा गया। दोनों के लिए क्षेत्रीय समितियां बनाई गई। 1956 में पेप्सु के पंजाब में विलय के बाद वहां के मुख्यमंत्री ब्रिशभान को उप मुख्यमंत्री और वहां की मुख्य संसदीय सचिव चंद्रावती को संसदीय सचिव बनाया गया था।

लेखक का हरियाणा की राजनीतिक और सामाजिक व्यवस्था पर गहन अध्ययन है।

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