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इस बार आसान नहीं थानेसर की थानेदारी, इनेलो-कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर

थानेसर को जीतना इस बार किसी भी पार्टी के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा।

इस बार आसान नहीं थानेसर की थानेदारी, इनेलो-कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ी टक्कर
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थानेसर को जीतना इस बार किसी भी पार्टी के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। इनेलो-कांग्रेस और भाजपा के बीच कड़ा मुकाबला होगा। इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष अशोक अरोड़ा मैदान में हैं तो कांग्रेस से सीएम के सहपाठी रहे बाबू रमेश गुप्ता चुनाव लड़ सकते हैं। इनेलो के लिए प्रदेशाध्यक्ष की हार और जीत मायने रखती है और रमेश गुप्ता को अपने साथ-साथ सीएम की साख भी बचानी है। भाजपा के लिए थानेसर का मुकाबला इसलिए खास हो जाता है क्योंकि यहां लोकसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार राजकुमार सैनी जीते थे। अब इस सीट को बचाए और बनाए रखना भाजपा के लिए चुनौती होगी।
हजकां अगर किसी मजबूत पंजाबी प्रत्याशी को मैदान में उतारती है तो थानेसर को पार करना और भी कठिन हो जाएगा। इसका एक कारण यह भी है कि यहां पंजाबी और जाट वोटरों की भूमिका रहती है। पंजाबी वोटरों में अरोड़ा और गुप्ता की खास पैठ मानी जाती है। हालांकि अरोड़ा वर्ष 1996, 2000 व 2009 में 3 बार थानेसर से चुनाव जीत चुके हैं लेकिन इस बार अशोक अरोड़ा के लिए थानेसर की सीट को फतेह करना कोई आसान कार्य नहीं है। 2005 में वे कांग्रेस के प्रत्याशी बाबू रमेश गुप्ता से बुरी तरह पराजित हुए लेकिन अरोड़ा ने 2009 में कांग्रेस प्रत्याशी बाबू रमेश गुप्ता से हार का बदला ले कर उन्हें पराजित कर दिया।
राजनीति लगी दांव पर: अशोक अरोड़ा इनेलो के प्रदेशाध्यक्ष भी है। ऐसे में उनकी राजनीति दांव पर लगी हुई है। हार और जीत पार्टी में कद तय करेगी।
ताकत अशोक अरोड़ा को पंजाबियों के अलावा जाट समुदाय के लोगों का भी सर्मथन प्राप्त है। इसके अलावा जिला के इनेलो से जुड़े वरिष्ठ नेता भी उनकी ताकत माने जाते हैं।
कमजोरी लोकसभा चुनाव में इनेलो प्रत्याशी बलबीर सैनी का भाजपा प्रत्याशी राजकुमार सैनी से 23,457 मतों के अंतर से हारना कमजोर कड़ी है। यदि भाजपा यहां से पंजाबी समुदाय से मजबूत प्रत्याशी उतारती है तो पंजाबी वोट खिसकने की संभावना है।
सीएम की साख बचानी होगी: रमेश गुप्ता को सीएम का खासमखास माना जाता है। इसलिए यह चुनाव गुप्ता के साथ-साथ सीएम की साख का सवाल बन गया है।
कमजोरी विधायक होते हुए कई कांग्रेसी उनका साथ छोड़ गए थे। गुप्ता ने इस बार भी पहले के विस चुनाव की तरह थानेसर के मतदाताओं को दरकिनार किया हुआ है। ऐसे में यदि थानेसर से ही चुनाव लड़ते हैं तो उनका व्यवहार कमजोरी बन सकता है।
ताकत पूई विधायक रमेश गुप्ता की मुख्य राजनीतिक ताकत उनके सहपाठी रहे सीएम हुड्डा स्वयं हैं। पंजाबी वोटरों पर खासी पकड़ बताई जाती है। शहरी इलाके में भी प्रभाव है।
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