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सौ साल पहले किया था असहयोग और आज कर रहे सहयोग

सौ साल पहले 1920 में अंग्रेजों को भारत से खदेडने के लिए असयोग आंदोलन चलाया गया था तो अब कोरोना को खदेडने के लिए सहयोग आंदोलन चल रहा है।

सौ साल पहले किया था असहयोग और आज कर रहे सहयोग

रवींद्र राठी। बहादुरगढ़

लाम भारत को आजाद करवाने के लिए देश की जनता ने सौ साल पहले असहयोग आंदोलन को हथियार बनाया था। वर्ष 1920 में शुरू हुए इस आंदोलन को जनता के समर्थन से अंग्रेज शासन की चूलें हिल गई थी। इसी की तर्ज पर अब कोरोना जैसी वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए देश में सामाजिक दूरी को अपनाते हुए सहयोग आंदोलन चलाया जा रहा है। असहयोग आंदोलन में देश की जनता ने एक-दूसरे के साथ कदमताल की थी, लेकिन वर्तमान आंदोलन में हर नागरिक दो कदम दूर रहकर एक दूसरे से सहयोग कर रहा है।

आज से 100 साल पूर्व सफलतापूर्वक चलाए गए 'असहयोग आंदोलन' ने भारत को अंग्रेजों से आजादी दिलाने में अहम भूमिका निभाई लेकिन 5 फरवरी 2022 को गोरखपुर के चौरी-चौरा नामक स्थान पर अति-उत्साही जनता ने थाने में आग लगी दी थी। इसमें एक थानेदार और 21 सिपाहियों की मौत हो गई थी। इस घटना से पूरा देश स्तब्ध हो गया और 12 फरवरी 1922 को कांग्रेस ने इस आंदोलन की समाप्ति की घोषणा कर दी थी।

वर्तमान समय में अति उत्साही लोग इस आंदोलन के लिए खतरा हो सकते हैं। कोरोना से जंग जीतने के लिए सामाजिक दूरी के साथ चलाए जा रहे सहयोग आंदोलन की सफलता को लेकर हर कृतज्ञ नागरिक चिंतित है। हालांकि अमीर से लेकर गरीब और सक्षम से लेकर असहाय वर्ग के सहयोग से लॉकडाउन सफलता की ओर बढ़ रहा है। संकट के इस दौर में प्रशासन, पुलिस, डॉक्टरों की टीम और सैकड़ों सेमाजसेवी लोग मदद के लिए आगे आ रहे हैं।

अब घरों में ही लॉकडाउन होकर लोग इस सहयोग आंदोलन में शामिल हो रहे हैं। इस महामारी से निपटने के लिए एक तरफ जहां शासन-प्रशासन और पुलिस सख्ती बरत रहे हैं। वहीं घरों में रहकर लोग अपने संयम और सहयोग का परिचय दे रहे हैं। इसी जन-सहयोग से हम कोरोना को हरा सकते हैं। शहरों के साथ गांवों में लोग मुस्तैद नजर आ रहे हैं। ग्रामीण बाहरी लोगों को अपने गांव में घुसने नहीं दे रहे। अधिकांश लोग सतर्क दिखाई दे रहे हैं। जरूरी सामान की खरीदारी करते समय सामाजिक दूरी बनाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। हाथ मिलाने की जगह नमस्कार कर रहे हैं।


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