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कोरोना वायरस के कारण बदलेगा 250 साल पुराना इतिहास, चिटाने वाली माता का मेला नहीं लगेगा

कोरोना वायरस का कहर पूरी दुनिया पर बरस रहा हैं। वायरस की रोकथाम के लिए पूरे देश को लॉकडाउन किया गया हैं। जिसके चलते मंदिरों के कपाटों को भक्तों के लिए बंद कर दिया गया। जिले में गांव चिटाना में विराजमान चिटाने वाली माता पर इन नवरात्रों में लगने वाला दो दिवसीय मेला नहीं लगेगा।

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कोरोना वायरस का कहर पूरी दुनिया पर बरस रहा हैं। वायरस की रोकथाम के लिए पूरे देश को लॉकडाउन किया गया हैं। जिसके चलते मंदिरों के कपाटों को भक्तों के लिए बंद कर दिया गया। जिले में गांव चिटाना में विराजमान चिटाने वाली माता पर इन नवरात्रों में लगने वाला दो दिवसीय मेला नहीं लगेगा। सरकार के आदेश में मंदिर ट्रस्ट ने मंदिर के कपाट बंद कर दिये हैं। मंदिर के मुख्य गेट पर ताला लगाकर व नोटिस चस्पा कर मंदिर में प्रवेश वृजित किया गया हैं। ट्रस्ट की तरफ से भक्तों को घर पर रहकर पुजा करने की अपील की जा रही हैं। मंदिर के कपाट बंद होने के कारण आसपास के सेकड़ों गांव के लोगों को 250 साल बाद माता के दर्शन नहीं हो पायेगें।

मंदिर का इतिहास-

ट्रस्ट के प्रधान शशिकांत भारद्वाज ने बताया कि बुजुर्गो के बताये अनुसार माता की मूर्ति सैकड़ों साल पहले तालाब की खुदाई के दौरान मिली थी। गांव में रहने वाले पंडित हरद्वारी लाल को ताला में मामा की मूर्ति होने का का सपना आया था। जिसे खुदाई के दौरान निकाला गया था। गांव में मंदिर की व्यवस्था न होने के कारण पंडित मूर्ति को लेकर हलवाई हट्टा स्थित मंदिर में आ गया। शहर में रहकर माता के मंदिर में पूजा करने लगा।

नवरात्रों के दिनों में माता को सप्तमी के दिन गांव चिटाना में लेकर जाया जाता था। दो दिन के बाद फिर से माता की मूर्ति को लेकर हलवाई हट्टा आते थे। सदियां बीत जाने के बाद चिटाना गांव में भक्तों के सहयोग से माता का मंदिर स्थापित कर दिया। जिसके बाद माता की मूर्ति को गांव में ही स्थापित करने की आसपास के ग्रामीणों में सहमति बनी, लेकिन कुछ शहर वासियों न इस बारे में विवाद शुरू कर दिया।

उसके बाद ग्रामीणों ने पंचायत कर माता की मूर्ति को गांव से बाहर न जाने पर सहमति बनी। उक्त सहमति करीब 100 गांवों व शहर के भक्तों द्वारा बनी। उसके बाद से माता की मूर्ति गांव में बने मंदिर में ही स्थपित हैं। जबकि शहर वासियों ने दूसरी मूर्ति तैयार करवाकर हलवाई हट्टा स्थित मंदिर में स्थापित कर दिया।

250 साल बाद नहीं लगेगा दो दिवसीय मेला

नवरात्रों के दिनों में सप्तमी के दिन व्रत रखने वाले श्रृद्धालू माता के मंदिर में चिटाना पहुंचते थे। मिली जानकारी के अनुसार सप्तमी के दिन शहर वासी जल चढ़ाकर अपनी मनोकामना माता के दरबार में पूरी करते थे। वहीं अष्ठमी के दिन आसपास के गांव के श्रृद्धालू माता के दर्शन करने के लिए चिटाना में आते थे। मंदिर परिसर में दो दिन तक भव्य मेले का आयोजन होता था। लाखों की संख्या में श्रृद्धालू माता के दर्शन करते थे। करीब 250 साल बाद कोरोना वायरस के कहर के कारण लाखों श्रृद्धालू मंदिर में माता के दर्शन नहीं कर पायेगें। साथ ही मेले का आंनद नहीं ले पायेगें।

थाने तक पहुंचा था मूर्ति रखने का विवाद-

वर्ष 2019 में चिटाना माता वाली का गांव में भव्य मंदिर बनकर तैयार हो चुका था। सप्तमी के दिन हलवाई हट्टा से माता की मूर्ति को गांव चिटाना लेकर जाया गया। उसके बाद ग्रामीणों ने अष्ठमी के बाद मूर्ति को गांव में विराजमान रहने पर सहमति जताई। जिसको लेकर दो पक्षों में संबंध बिगड़ गये। एक पक्ष माता की मूर्ति को परम्परा के चलते शहर में स्थापित करने पर अड़ गया। जबकि दूसरा पक्ष गांव में मंदिर बनने के बाद हमेशा के लिए मंदिर में स्थापित करने पर अड़ गया। आसपास के सेकड़ों गांव के ग्रामीणों ने पंचायत कर गांव में ही मूर्ति स्थापित करने पर सहमति जताई। जिसको लेकर मामला थाने तक पहुंचा था।

गेट पर लगाया ताला, गांव में करवाई मुनादी-

ट्रस्ट के प्रधान शशिकांत ने बताया कि कोरोना वायरस की रोकथाम को लेकर देश में लॉकडाउन घोषित कर रखा हैं। सप्तमी व अष्ठमी के दिन मंदिर में लाखों की संख्या में श्रृद्धालू दर्शन करने के लिए आते हैं। वायरस की रोकथाम के लिए उठाये गये कदम की सहराना करते हुए इस बाद मेले का आयोजन न करने पर सहमति बनी हैं। आसपास के गांव में मुनादी करवाकर लोगों को जानकारी दी गई हैं। 31 मार्च व 1 अप्रैल को लगने वाले मेले का आयोजन नहीं किया जायेगा।


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