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हरियाणा में राहुल गांधी की न्यू बनाम सोनिया गांधी की ओल्ड कांग्रेस में लड़ाई

हरियाणा प्रदेश (Haryana Assembly Elections) की राजनीति एक ऐसे मोड़ पर आ खड़ी हुई है। जहां कांग्रेस पार्टी (Congress party) गुटबाजी में दो फाड़ हो गई है। एक ही पार्टी के कार्यकर्ता एक ही परिवार के दो अलग सदस्यों के लिए वफादारी दिखा रहे हैं। एक तरफ है सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) की ओल्ड कांग्रेस (Veterans) तो दूसरी तरफ राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की न्यू कांग्रेस(Youth Congress) के कार्यकर्ता आमने सामने हैं।

हरियाणा में राहुल गांधी की न्यू बनाम सोनियां गांधी की ओल्ड कांग्रेस की लड़ाई
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Haryana Assembly Elections Congress party divided between youth versus veterans leaders

हरियाणा विधान सभा चुनाव की तारीख पास आने के साथ ही कांग्रेस पार्टी में मची आंतरिक हलचल तेज हो गई है। टिकट वितरण में जिस तरह पार्टी के भीतर कलह देखने को मिली उससे एक बात तो बिल्कुल स्पष्ट है कि चुनाव के वक्त पार्टी में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। कांग्रेस पूरी तरह से दो खेमों में बंटी नजर आ रही है ऐसे में एक खेमा है पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा का है। जबकि दूसरे का नेतृत्व कर रहे हैं पूर्व कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अशोक तंवर कर रहे हैं। पार्टी में गुटबाजी कुछ इस कदर चल रही है कि कार्यकर्ता एक ही परिवार के दो अलग सदस्यों के लिए वफादारी दिखा रहे हैं।

राहुल गांधी की न्यू बनाम सोनियां गांधी की ओल्ड कांग्रेस

हरियाणा प्रदेश में कांग्रेस पार्टूी में गुटबाजी की असली कहानी शुरू होती है राहुल गांधी के वक्त से जब उन्होंने कांग्रेस महासचिव रहते हुए पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के राजनीतिक वर्चस्व को कम करते हुए प्रदेश में युवा नेता अशोक तंवर को कमान सौंपी थी। जिसके बाद से ही पार्टी में तंवर ने नए युवा चेहरों को तवज्जो दी। उनका मानना था कि पुराने हारे हुए नेताओं के बजाय नए उभरते हुए नेता पार्टी के लिए बेहतर विकल्प साबित होंगे।

उस समय तो पार्टी आलाकमान और राहुल गांधी का करीबी होने के कारण उनका विरोध नहीं हुआ। लेकिन उनके प्रतिनिधित्व में लगातार लोकसभा चुनाव 2014 और फिर विधानसभा चुनाव हारने के बाद पार्टी के अंदर बगावती रुख तेज हो गए। हालांकि फिर भी राहुल गांधी का करीबी होने के कारण वह लोकसभा 2019 तक अध्यक्ष बने रहे। लेकिन लोकसभा चुनाव 2019 में भी पार्टी के एक भी सीट न निकाल पाने के बाद से हुड्डा खेमा खुलकर सामने आ गया। इसके बाद चालू हो गई वर्चस्व की लड़ाई। जहां एक ओर हरियाणा के पुराने कद्दावर नेताओं का नेतृत्व कर रहे है भूपेंद्र सिंह हुड्डा तो युवा नेताओं की कमान है अशोक तंवर के हाथों में थी। जानकार मानते हैं कि अशोक तंवर को राहुल गांधी का करीबी माना जाता है। उन्होंने ही अशोक तंवर को कमान सौंपने में अहम भूमिका निभाई थी। वह राहुल के युवा खेमे के माने जाते हैं। इसके विपरीत भूपेंद्र सिंह हुड्डा कांग्रेस के दिग्गज नेताओं में आते हैं, जिन्हें सोनिया गांधी का समर्थन प्राप्त है।

राहुल के साथ खत्म हुआ अशोक तंवर का बर्चस्व

लोकसभा चुनाव 2019 मे कांग्रेस पार्टी के हारने पर राहुल गांधी ने अपने अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। जिसके बाद ही अशोक तंवर पर संकट के बादल मंडराने शुरु हो गए। जैसे ही सोनिया गांधी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष की कुर्सी संभाली उन्होंने अशोक तंवर को जिम्मेदारी से मुक्त कर दिया। इसे हुड्डा खेमे की बड़ी जीत के रुप में देखा गया। फिर कुमारी शैलजा को प्रदेश की कमान सौंपी गई। इसी के साथ ही हुड्डा एक बार फिर से प्रदेश की राजनीति में बड़ा रोल निभाने के लिए तैयार दिख रहे हैं।

टिकट बंटवारे में दिखा हुड्डा का दम

कांग्रेस पार्टी के हरियाणा चुनाव में टिकट वितरण से एक बात बिल्कुल साफ हो गई थी कि अब पार्टी में तंवर की नहीं चलने वाली। जहां हुड्डा के समर्थकों को चुन-2 कर टिकट दिए गए। वहीं पार्टी ने ज्यादातर तंवर समर्थकों के टिकट काट दिए। जिसके बाद अशोक तंवर ने दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के घर के सामने हंगामा किया, लेकिन उसका कोई फायदा नहीं हुआ। आखिरकारी तंवर ने 5 अक्टूबर को कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। अब हुड्डा और कुमारी शैलजा के नेतृत्व में चुनाव लड़ा जाना है। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि क्या गुटबाजी का शिकार हुई कांग्रेस अब एक हो सकती है?

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