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यशपाल शर्मा ने रिलीज से पहले ही बताई फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ की कहानी

यशपाल शर्मा अब तक ‘लगान’, ‘अपहरण’, ‘आरक्षण’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘गंगाजल’ जैसी कई फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी दिखा चुके हैं। वह मेनस्ट्रीम सिनेमा के साथ-साथ आर्ट फिल्में भी करते हैं।

यशपाल शर्मा ने रिलीज से पहले ही बताई फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ की कहानी

यशपाल शर्मा अब तक ‘लगान’, ‘अपहरण’, ‘आरक्षण’, ‘अब तक छप्पन’ और ‘गंगाजल’ जैसी कई फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी दिखा चुके हैं। वह मेनस्ट्रीम सिनेमा के साथ-साथ आर्ट फिल्में भी करते हैं।

यशपाल फिल्मों में बिजी रहने के बावजूद थिएटर को भी नहीं भूले हैं। इन दिनों उनकी चर्चा डायरेक्टर पवन कुमार शर्मा की फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ को लेकर हो रही है। पिता-बेटे के रिश्ते को फिल्म में दिखाया गया है।

साथ ही फिल्म की कहानी आतंकवाद के खिलाफ मैसेज भी देती है। इसमें यशपाल के कैरेक्टर के बेटे का रोल चाइल्ड आर्टिस्ट हर्षित रजावत ने किया है। फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ को कई फिल्म फेस्टिवल में सराहा गया है।

फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ की कहानी और इसमें आपका किरदार क्या है?

जम्मू-कश्मीर में जो लोग बकरियां पाल-पोसकर और उन्हें चराकर अपना जीवन यापन बड़ी मुश्किलों के साथ करते हैं, वे लोग बकरवाल कहलाते हैं। उनकी जिंदगी बड़ी जोखिम भरी होती है।

कभी उन्हें आतंकवादी परेशान करते हैं, कभी कोई उनकी बकरियां उठा ले जाता है। उसी बैकड्रॉप पर फिल्म ‘करीम मोहम्मद’ की कहानी है, जिसमें एक पिता-बेटे के रिश्ते को दिखाया गया है। मैंने पिता का रोल किया है, जबकि बच्चे का रोल हर्षित रजावत ने अदा किया है।

फिल्म में बच्चा पिता से बहुत तरह के सवाल पूछता रहता है, जो उसके मासूम जेहन में आते हैं। बच्चे के सवालों के जरिए जो इश्यूज उठाए गए हैं, वह दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर देंगे कि किस तरह आतंकवाद, जात-पात और भेदभाव हमारी इंसानियत को खत्म करते हैं।

इस रोल के लिए आपको कितनी रिसर्च करनी पड़ी, आपने क्या तैयारियां कीं?

फिल्म के डायरेक्टर पवन कुमार शर्मा ने इस सब्जेक्ट पर बहुत रिसर्च की थी। एक बच्चे के प्वाइंट ऑफ व्यू से उन्होंने इस फिल्म में कुछ गंभीर सवाल उठाए हैं। इसकी कहानी सुनकर ही मैंने कह दिया था कि यह फिल्म मुझे करनी है, चाहे जो भी हो जाए।

मैंने कई हफ्तों तक चरवाहों की जिंदगी पर रिसर्च की। वह कैसे कपड़े पहनते हैं? उनके बोलने का अंदाज क्या होता है? उनका रहन-सहन, उनकी पगड़ी, उनके म्यूजिक, सबके बारे में मैंने बड़ी गहराई से रिसर्च की। अपनी दाढ़ी बढ़ाई, क्योंकि मैं नकली दाढ़ी लगाकर एक्टिंग करने में विश्वास नहीं रखता था।

कैरेक्टर को ऑथेंटिक रखने के लिए मैंने हिमाचल में बीस दिनों की शूटिंग में एक ही कपड़ा पहना, न तो मैं सोते समय उसे बदलता था और न उसे धुलवाया। जिससे कैरेक्टर रियल लगे।

इस कैरेक्टर की किन खूबियों ने आपके दिल को छू लिया?

मुझे इस किरदार की मासूमियत और उसमें मौजूद इंसानियत ने छू लिया। बकरवाल लोग जानवरों और नेचर के साथ रहते हैं, इसलिए उनमें अब भी जमीर और इंसानियत जिंदा हैं। यह फिल्म भी

जमीर और जिंदगी के बीच एक जंग दिखाती है। फिल्म का एक डायलॉग बेहद असरदार है-‘जमीर और जिंदगी के बीच अगर कभी मुझे एक को चुनना पड़े तो मैं जमीर को चुनूंगा।’ ये बकरी चराने वाले अनपढ़ जरूर होते हैं, लेकिन पढ़े-लिखे लोगों से बेहतर बातें करते हैं।

चाइल्ड आर्टिस्ट के साथ काम करना काफी मुश्किल होता है, आपका इस फिल्म में कैसा एक्सपीरियंस रहा?

शुरू में मुझे भी लगा था कि चाइल्ड आर्टिस्ट के साथ काम करने में दिक्कत होगी। लेकिन फिर जिस तरह हर्षित रजावत ने अपने आप को किरदार में ढाला है, वो कमाल है।

आपने मल्टी स्टारर फिल्मों में काम किया है, लेकिन इधर कुछ समय से आप ऑफबीट फिल्में चूज कर रहे हैं, कोई खास वजह?

देखिए, मुझे बड़े स्टार्स की फिल्मों में छोटे किरदार करके सैटिस्फेक्शन नहीं मिलता है। ‘राउडी राठौर’ या ‘सिंह इज किंग’ में जो मैं करता हूं, उससे संतुष्टि नहीं मिलती। हां, दुनिया देख लेती है, पैसे मिल जाते हैं। सलमान खान के साथ एक भी फिल्म नहीं की थी, इसलिए ‘ट्यूबलाइट’ में काम किया।

सलमान की पहले दो फिल्में मना कर चुका था। अमिताभ, सलमान, आमिर के साथ फिल्में कर चुका हूं। लेकिन थिएटर मेरा पहला प्यार है। मेरे इस समय ग्यारह प्लेज चल रहे हैं। अगर मैं पैसों को अहमियत देता तो मैं नाटक नहीं करता।

मैं एक्टिंग पैसों के लिए नहीं करता। गुलजार साहब के साथ चार नाटक, मकरंद देशपांडे के साथ दो, नादिरा बब्बर के साथ एक और रजत कपूर के साथ भी नाटक कर रहा हूं। असली सैटिस्फेक्शन तो कला फिल्मों और नाटक में ही मिलती है। वैसे भी मैं किसी एक ढर्रे में कैद होकर नहीं रह सकता।

आगे आपके पास कौन से प्रोजेक्ट्स हैं?

मैं एक फिल्म ‘मिस्टर पानवाला’ कर रहा हूं। एक इंटरनेशनल फिल्म ‘फागुन हवाएं’ कर रहा हूं। बतौर डायरेक्टर एक हरियाणवी फिल्म कर रहा हूं, जो एक बायोपिक है। मैं पंजाबी, हरियाणवी, गुजरती, तेलुगू और भोजपुरी फिल्मों में काम कर चूका हूं। अब मेरा मोटिव है हरियाणवी सिनेमा को पंजाबी या मराठी सिनेमा के लेवल तक पहुंचाऊं।

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