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Interview: आखिर क्यों दिव्या दत्ता की फिल्में थिएटर तक नहीं पहुंचती।

दिव्या दत्ता बॉलीवुड की ऐसी कैरेक्टर आर्टिस्ट हैं, जो अपनी एक्टिंग से दर्शकों के जेहन में उतर जाती हैं। खासकर बाल फिल्मों में निभाए गए उनके किरदार लंबे समय तक याद किए जाते हैं। इन दिनों भी वह बच्चों की फिल्मों में बिजी हैं। लेकिन ये फिल्में थिएटर तक कम ही पहुंचती हैं, इस कंडीशन को कैसे बदला जा सकता है? बच्चों की फिल्मों और करियर से जुड़ी बातें शेयर कर रही हैं दिव्या दत्ता।

Interview: आखिर क्यों दिव्या दत्ता की फिल्में थिएटर तक नहीं पहुंचती।

शिवाली त्रिपाठी: अब तक दिव्या दत्ता 'ट्रेन टू पाकिस्तान', 'वीर जारा', 'दिल्ली-6' के अलावा सौ से ज्यादा सफल फिल्में कर चुकी हैं। हाल ही में वह एक बच्चों की फिल्म 'टेनिस बडीज' में भी नजर आई थीं। अब उन्हें अपनी अपकमिंग फिल्म 'झलकी' की रिलीज का इंतजार है, यह भी बच्चों की फिल्म है। इससे पहले भी वह 'स्टेनली का डिब्बा' जैसी बाल फिल्म का हिस्सा रही हैं। बातचीत दिव्या दत्ता से।

चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी द्वारा प्रोड्यूस फिल्में थिएटर तक नहीं पहुंच पातीं। ऐसे में जब आप बच्चों के लिए बनने वाली फिल्में एक्सेप्ट करती हैं तो सोच क्या होती है?

आप एकदम सही कह रही हैं। जब हमारी फिल्म 'टेनिस बडीज' को लेकर चिल्ड्रेन फिल्म सोसाइटी में चर्चा शुरू हुई थी, उस वक्त चिल्ड्रेन फिल्म सोसायटी के चेयरमैन मुकेश खन्ना थे। उन्होंने हमसे वादा किया था कि यह फिल्म थिएटरों में जरूर पहुंचेगी। उसके बाद फिल्म के निर्माता अशोक वाधवा ने भी प्रयास किए, जिसके चलते हमारी यह फिल्म 29 मार्च को थिएटरों में पहुंची। तो अब एक अच्छी शुरुआत हो गई है। क्रिएटिविटी बनाम मार्केटिंग का झगड़ा चलता रहेगा। एक तरफ बाजार है, दूसरी तरफ क्रिएटिविटी है। दोनों के बीच बैलेंस बैठाने की कोशिश तो करनी ही पड़ेगी।

क्या आपको लगता है कि बच्चों की फिल्मों का कोई मार्केट है?

इससे पहले मैंने दो बाल फिल्में की हैं। मैं अपने दोस्तों के साथ अपनी बाल फिल्म 'स्टेनली का डिब्बा' देखने थिएटर में गई थी। हाल पूरा भरा हुआ था। फिल्म खत्म होने के बाद सभी ने खड़े होकर तालियां बजाई थीं। मुझे अहसास हुआ कि बच्चों की फिल्म को जो इज्जत मिलनी चाहिए, वह मिली। हर फिल्म को अलग रेस्पॉन्स मिलता है। 'तारे जमीं पर' को भी जबर्दस्त सफलता मिली थी। उसकी कहानी ऐसी थी कि उसने सफलता का लैंड मार्क बनाया था। आमिर खान ने इसे अच्छी तरह से संजोया था। अमोल गुप्ते की बच्चों के साथ अपनी एक अलग समझ है।

वह बच्चों के साथ कमाल का काम करते हैं। लेकिन यह भी सच है कि हम बच्चों की फिल्म को मार्केट करते समय सिर्फ अपने जज्बे के साथ नहीं आ सकते। आपको दस लोगों को साथ लेकर चलना होता है, इसमें फिल्म का बिजनेस हैंडल करने वाले लोग भी होते हैं। वरना 'टेनिस बडीज' जैसी फिल्में कब आएंगी, कब जाएंगी, पता नहीं चलेगा। लेकिन बच्चों की फिल्मों को ठीक से प्रमोट किया जाए तो इनका मार्केट भी बन जाएगा। जैसे एक बच्चों की फिल्म आई थी-'चिल्लर पार्टी', जिसको सलमान खान ने प्रोड्यूस किया था। इसे यूटीवी ने बड़े लेवल पर रिलीज किया था। इस तरह दूसरी चिल्ड्रेन फिल्म के साथ भी हो तो सफलता मिलेगी।

बतौर एक्टर क्या आप संतुष्ट हैं?

देखिए, हम कलाकार के तौर पर मेहनत से एक फिल्म करते हैं, वह फिल्म सफल हो जाती है तो उस फिल्म में मैंने जिस तरह का किरदार निभाया होता है, उसी तरह की छवि हमें दे दी जाती है। आखिर आप कौन होते हैं, हमें एक छवि देने वाले? हमें हर फिल्म में अलग तरह के चुनौतीपूर्ण किरदार निभाने के लिए क्यों नहीं चुना जाता? बॉलीवुड में हर फिल्म के साथ अपनी छवि को तोड़ना, खासकर महिला कलाकारों के लिए आसान नहीं है। लेकिन मैं सफल रही कि मैंने हर फिल्म में मेहनत करके अपनी छवि को तोड़ा। मैंने नायिका की सहेली से लेकर तेज राजनीतिज्ञ, शराबी महिला तक के अलग-अलग किरदार निभाए हैं।

मैं हर फिल्म में एक ही तरह के किरदार निभाते हुए बोर नहीं होना चाहती, इसलिए कम फिल्में करती हूं। मुझे सिनेमा से प्यार है। मुझे काम करना पसंद है। मैं हमेशा चाहती हूं कि मैं जब भी सेट पर जाऊं, एक बच्चे की तरह जाऊं लेकिन नर्वस न होऊं। मैं सेट पर जाकर निर्देशक से कभी नहीं कहती कि मुझे सब कुछ आता है। लेकिन मैं खुशकिस्मत हूं कि मुझे ऐसे फिल्मकार मिले, जो मेरी तरह की फिल्में बनाते हैं। मैंने जिनके साथ भी फिल्में कीं, उन फिल्मकारों ने मुझे दोबारा अपनी फिल्म के लिए याद किया।

आप अभी कोई दूसरी बाल फिल्म कर रही हैं?

मैंने अभी एक बहुत अच्छी बाल फिल्म 'झलकी' की है। बड़ी प्यारी कहानी है। इसमें नौ साल की लड़की है, जिसे अपने भाई की तलाश है। उसके भाई को बाल मजदूरी में डाल दिया है। इसके अलावा दो सामान्य फिल्में भी कर रही हूं, लेकिन इनके बारे में अभी नहीं बता सकती हूं।

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