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हर सक्सेसफुल पर्सन अपने आप में बाजीगर होता है: वत्सल सेठ

वत्सल ने कहा, ''मैं रियल में काफी सॉफ्ट स्पोकन हूं।''

हर सक्सेसफुल पर्सन अपने आप में बाजीगर होता है: वत्सल सेठ
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मुंबई. लाइफ ओके पर शुरू हुए शो ‘रिश्तों का सौदागर बाजीगर’ में आरव त्रिवेदी का कैरेक्टर काफी इंट्रेस्टिंग हो चला है। आरव के रोल में वत्सल सेठ पहली बार मल्टीशेडेड कैरेक्टर प्ले कर रहे हैं। इससे पहले ‘एक हसीना थी’ में शौर्य का नेगेटिव कैरेक्टर प्ले कर वह काफी तारीफ बटोर चुके हैं। पेश है, वत्सल सेठ से हुई बातचीत के प्रमुख अंश।
इस शो में अपने कैरेक्टर आरव त्रिवेदी के बारे में कुछ बताइए ?
आरव एक बिजनेसमैन है। वह एक परफेक्शनिस्ट किस्म का लड़का है। वह पैशनेट, जुनूनी और टेंपरामेंटल है। आरव को लगता है कि ये दुनिया बहुत सेल्फिश है। इसकी वजह से वह रिलेशनशिप पर बिलीव नहीं करता है। उसका मानना है कि हर चीज की कीमत होती है, जो चुकानी ही पड़ती है।
क्या इस शो में भी आप नेगेटिव रोल में हैं?
आरव के कैरेक्टर में कई सारे शेड्स हैं, जो वक्त के साथ बदलते रहेंगे। कभी नेगेटिव तो कभी पॉजिटिव। मेरा पिछला शो ‘एक हसीना थी’ एक हिट शो था। इसमें मेरे नेगेटिव कैरेक्टर शौर्य को आॅडियंस ने खूब पसंद किया था, तो जब मुझे आरव का मल्टीशेडेड रोल आॅफर हुआ तो मैं न नहीं कर पाया, बल्कि मैं अपना रोल सुनकर काफी एक्साइटेड हो गया था, क्योंकि इस बार मुझे फिर से कुछ चैलेंजिंग करने का मौका मिल रहा था। मैं इस रोल को काफी एंज्वॉय कर रहा हूं।
आपको डर नहीं लग रहा कि आप नेगेटिव इमेज में बंध जाएंगे?
जी बिलकुल नहीं। डर किस बात का। मेरे रोल को आॅडियंस पसंद कर रही है और अच्छा फीडबैक मिल रहा है। मेरे बड़े और छोटे पर्दे के हर रोल को पसंद किया गया है। मेरा मानना है कि कैरेक्टर बस इंट्रेस्टिंग होना चाहिए पॉजिटिव हो या नेगेटिव, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।
रियल में आप बाजीगर किसे मानते हैं?
मेरी नजर में हर सक्सेसफुल पर्सन अपने आप में बाजीगर है, क्योंकि हर सक्सेस के पीछे बहुत सारे सैक्रीफाइज होते हैं।
वत्सल और आरव में क्या कुछ कॉमन है?
आरव और वत्सल एकदम अलग हैं। मैं रियल में काफी सॉफ्ट स्पोकन हूं और बोरिंग भी। मैं ज्यादातर घर पर ही रहना पसंद करता हूं। घर पर रहकर बुक्स पढ़ने का शौकीन हूं। एप्स के जरिए नई-नई चीजें सीखता हूं। जबकि आरव का कैरेक्टर एकदम डिफरेंट है। वह काफी लाउड और आउटगोइंग पर्सन है।
टीवी पर वापस आने में इतना वक्त क्यों लगा?
मैंने अपने अब तक के एक्टिंग करियर में छोटे और बड़े पर्दे पर जो भी काम किया है, मुझे उस पर प्राउड है। मैं कभी काम के पीछे भागा नहीं। ‘एक हसीना थी’ नंबर वन शो था, तो जब यह शो आॅफ एयर हुआ तो मुझे काफी टिपिकल टाइप रोल आॅफर हुए। लेकिन मैं हमेशा कुछ डिफरेंट करने में बिलीव करता हूं। मैं वही करता हूं, जिसे खुद भी एंज्वॉय कर सकूं। इस शो में मुझे बहुत ड्रामा नजर आया। मेरा मानना है कि जब तक खुद का इंट्रेस्ट न हो, काम करने में तब तक मजा नहीं है।
बड़े और छोेटे पर्दे पर कितना फर्क महसूस करते हैं?
एज एन एक्टर कोई फर्क नहीं है। चाहे छोटा पर्दा हो या बड़ा, एक्टिंग और हार्ड वर्क वैसे ही करना पड़ता है। आजकल तो छोटा पर्दा भी बड़े पर्दे जितना बड़ा हो गया है। अब फिल्मों की तरह बजट बड़ा होने लगा है। टीवी शोज में भी कई तरह के इफेक्ट्स दिखाए जाने लगे हैं। फिल्मों की तरह प्रमोशन काफी ग्रांड होने लगे हैं। हर जगह बड़े-बड़े बैनर लगाए जाते हैं, जबकि पहले ऐसा नहीं होता था।
आॅन स्क्रीन कैरेक्टर होता है फिक्शन
क्या टीवी सीरियल के कैरेक्टर्स का इफेक्ट्स आॅडियंस पर पड़ता है? पूछे जाने पर वत्सल कहते हैं, ‘टीवी शोज सिर्फ आॅडियंस के एंटरटेनमेंट के लिए बनाए जाते हैं। आॅन स्क्रीन कैरेक्टर पूरी तरह फिक्शन होता है, इसलिए उस कैरेक्टर को फॉलो नहीं करना चाहिए। हर एक्टर का मकसद सिर्फ और सिर्फ आॅडियंस को एंटरटेन करना होता है। कभी वह पॉजिटिव हो सकता है तो कभी नेगेटिव। हां, अगर कोई एक्टर रियल लाइफ में कुछ अच्छा करता है, तो उसे फॉलो करने में कोई हर्ज नहीं है।’
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