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मोहन राकेश जिन्होंने रंगमंच को अंधेरे से निकालकर दुनिया के सामने पेश किया, जानें उनके बारे में

रंगमंच शांति और सामंजस्य की स्थापना में एक महत्वपूर्ण औजार है। हम रंगमंच को सिर्फ एक मनोरंजन के माध्यम से ही देखते है न कि संदेश देने के माध्यम से. जिसका रंगमंच हमेशा से ही देने का प्रयास करता है। अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में नेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।

मोहन राकेश जिन्होंने रंगमंच को अंधेरे से निकालकर दुनिया के सामने पेश किया, जानें उनके बारे में

रंगमंच शांति और सामंजस्य की स्थापना में एक महत्वपूर्ण औजार है। हम रंगमंच को सिर्फ एक मनोरंजन के माध्यम से ही देखते है न कि संदेश देने के माध्यम से जिसका रंगमंच हमेशा से ही देने का प्रयास करता है।

हम रंगमंच में प्रस्तुत की जा रही कलाकारों की कहानी को देखते हैं जो अभिनय कर रहे हैं। अगर हमें उनका अभिनय पसंद नहीं आता तो हम उसे अच्छा कलाकार नही मानते। इसके साथ ही अगर हमे रंगमंच मे प्रस्तुत की जा रही कहानी भा जाती है तो फिर हम उस कलाकार को अच्छा बता देते हैं।

मोहन राकेश के लिखे कई कहानियां

'नयी कहानी आंदोलन', 'आषाढ़ का एक दिन' के नाम से विख्यात महानायक मोहन राकेश ने आधुनिक युग मे आज भी अपनी रचनाओं को नाटकों के रूप मे ज़िंदा रखा है। जहां भारतेंदु हरिश्चंद्र और जयशंकर प्रसाद का नाम गूंजता था वहीं मोहन राकेश का नाम भी गूंजने लगा।

उन्हे भी जनता से वहीं प्यार मिला। उन्होने हिंदी नाटकों को फिर से रंगमंच से जोड़ा. मोहन राकेश ने अपने जीवन की विकास-यात्रा मे काफी महत्वपूर्ण पड़ाव तय किए है। जिस कारण उन्हे नाट्य-क्षेत्र मे काफी सफलता मिली. उन्होने कई नाटक लिखे जैसे 'लहरों के राजहंस', 'आधे-अधूरे' आदि।

सभी का रंगमंच से सीधा नाता है. हम भी कभी-कभार आइने को देखते हुए कई तरह के हाव-भाव को व्यक्त करते है। जो हमारे अंदर के छिपे कलाकार को आइने के द्रारा बाहर निकालता है। जो किसी अभिनेता से कम नही होते। मतलब यह कि हममे भी अभिनेता के वही स्वभाव होते है जो किसी कलाकार से कम नही होते. एक कलाकार की परीक्षा भी रंगमंच के दौरान होती है। जब उसे कई रूप धारण करने पड़ते है।

यहां हुई थी रंगमंच दिवस की स्थापना

हम मे से रंगमंच को तो सभी ने देखा है लेकिन क्या आप मे से कोई जानता है कि इसकी स्थापना हुई। अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच दिवस की स्थापना 1961 में नेशनल थियेट्रिकल इंस्टीट्यूट द्वारा की गई थी। 1962 में पहला अंतर्राष्ट्रीय रंगमंच संदेश फ्रांस की जीन काक्टे ने दिया था। वर्ष 2002 में यह संदेश भारत के प्रसिद्ध रंगकर्मी गिरीश कर्नाड द्वारा दिया गया था।

भारत के कई राज्यों में अलग नाम से जाना जाता है रंगमंच को

भारत मे रंगमंच मनाया तो जाता है लेकिन इसे हर राज्य मे अलग-अलग नामों से जाना जाता है. जैसे पश्चिम बंगाल मे जात्रा, महाराष्ट्र मे तमाशा, गजरात मे भवई आदि नामों से रंगमंच को अलग-अलग राज्यों मे पेश किया जाता है।

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