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Taapsee Pannu Interview : घरेलू हिंसा कैसे रुके? तापसी पन्नू ने दिया ये जवाब...

बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के तापसी पन्नू बॉलीवुड में आईं और उन्होंने एक बेस्ट एक्ट्रेस के रूप में पहचान बनाई। तापसी ने ज्यादातर इश्यू बेस्ड फिल्में ही की हैं, इनमें उनके किरदार स्त्री अस्मिता से जुड़े थे। अपनी रियल लाइफ में भी वह स्त्री अस्मिता और आजादी की जबरदस्त पक्षदर हैं। आजकल तापसी अपनी अपकमिंग फिल्म ‘बदला’ को लेकर चर्चा में हैं।

Taapsee Pannu Interview : घरेलू हिंसा कैसे रुके? तापसी पन्नू ने दिया ये जवाब...

बिना किसी फिल्मी बैकग्राउंड के तापसी पन्नू बॉलीवुड में आईं और उन्होंने एक बेस्ट एक्ट्रेस के रूप में पहचान बनाई। चाहे फिल्म ‘मनमर्जियां’ हो या ‘मुल्क’ या फिर ‘पिंक’ और ‘जुड़वा-2’, हर फिल्म में तापसी पन्नू एक नए अंदाज, एक अलग किरदार में नजर आई हैं। तापसी की यह सबसे बड़ी खासियत है कि एक बड़े स्टार बनने के बाद भी उनमें कोई स्टार्स वाला एटीट्यूड नहीं आया, वो दिखावे से दूर हैं। इस समय तापसी सुर्खियों में हैं, क्योंकि वह कई ऑफबीट फिल्में कर रही हैं। 8 मार्च, अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर तापसी अभिनीत फिल्म ‘बदला’ रिलीज होगी। इस फिल्म को निर्देशित किया है सुजॉय घोष ने। अमिताभ बच्चन इस फिल्म में एडवोकेट के अहम किरदार में नजर आएंगे। प्रस्तुत है, तापसी पन्नू से हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

फिल्म ‘बदला’ में आप सोलो हीरोइन हैं। फिल्म में अपने किरदार नयना सेठी के लिए आपने क्या कोई ऑडिशन दिया था?

मैं और ऑडिशन, असंभव। यह भी एक रिकॉर्ड है कि मैंने आज तक जितनी भी ऑडिशंस दिए हैं, कभी भी सेलेक्ट नहीं हुई हूं। अगर डायरेक्टर को मेरी काबिलियत पर अविश्वास है तो वो मुझे सेलेक्ट न करें, यही रवैया मेरा रहता है। अगर मुझे फिल्म ‘बदला’ के लिए ऑडिशन देनी पड़ती तो मैं नहीं करती यह फिल्म।

तो फिर डायरेक्टर सुजॉय घोष ने आपको कैसे सेलेक्ट किया?

सभी जानते हैं कि फिल्म ‘बदला’ में शुरुआती दौर में कुछेक बदलाव होते रहे। मुझे इस फिल्म का ऑफर किसी और रोल के लिए मिला था। फिल्म में पहले यही दिखाया जाना था एक लड़की का मर्डर होता है। मैंने निर्माता से कहा, कहानी में अगर लड़की के मर्डर की बजाय लड़के का मर्डर दिखाएं तो मैं उस लड़की का किरदार (नयना सेठी) करना चाहूंगी, जो बदला लेना चाहती है। मेरी बात मानी गई और मैं नयना सेठी के लिए फाइनल हो गई। शुरुआत में यह बदलाव डायरेक्टर सुजॉय घोष को पसंद नहीं आया, वो इस फिल्म को करने के लिए राजी नहीं थे। फिर मेकर्स ने वकील (बादल गुप्ता) के दमदार रोल के लिए अमिताभ बच्चन को साइन किया, तब जाकर सुजॉय घोष फिल्म करने के लिए राजी हुए।

फिल्म के पोस्टर पर लिखा है, ‘हर बार माफ करना अच्छा नहीं होता’। क्या आपके मन में कभी किसी के प्रति बदले की भावना रही है?

जीवन में हर तरह के अच्छे-बुरे लोग हमें मिलते हैं। अगर कोई हमारे साथ गलत व्यवहार करता है तो उसके प्रति बदले की भावना रखने से मेरे दिल में नेगेटिविटी जन्म लेगी, जो मेरी मेंटल हेल्थ के लिए अच्छी नहीं। वैसे ‘बदला’ लेना एक इमोशन है। उम्र के हर पड़ाव में बदला लेने का हमारा तरीका अलग होता है। बचपन में गुस्सा आने पर दोस्तों से फाइट करते हैं बच्चे। कुछ हद तक कॉलेज लाइफ में भी यह गुस्से और बदले का आदान-प्रदान होता रहता है। प्रौढ़ होने पर बदले की भावना बस दिल तक सीमित रहती है।

क्या आप अपने साथ बुरा करने वालों को माफ कर देती हैं?

भई, मैं आखिर इंसान हूं, साधु-महात्मा नहीं कि उन सभी को माफ करती जाऊं, जिन्होंने मेरे साथ बुरा सुलूक किया। लेकिन यह सोचती हूं कि मैं बदला नहीं लूं पर किस्मत बुरे व्यवहार का बदला अपने तरीके से देती है। जैसा बोओगे, वैसा ही पाओगे। कड़वी भावनाओं को दिल में पालना भी हमारे मानसिक विकास लिए ठीक नहीं होता है।

आप अमिताभ बच्चन के साथ फिल्म ‘बदला’ से पहले 2016 में ‘पिंक’ भी कर चुकी हैं। महानायक के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? क्या उनके साथ फिल्म करने का कोई प्रेशर आप पर रहा?

बता दूं कि अमिताभ सर के साथ ‘पिंक’ की शूटिंग जैसे ही शुरू हुई, बस दो दिन बाद ही सर के साथ मैं बहुत ही अच्छे से घुल-मिल गई। उनको लेकर जो झिझक थी, सब दूर हो गई। एक प्यारा रिश्ता अमित सर से बन गया। हम दोनों सेट पर आपस में गपशप करते। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर वो मेरी पोस्ट पर रिएक्ट करते। सेट पर वह हर व्यक्ति की चिंता करते हैं। सभी के साथ अमिताभ सर का आदर पूर्वक व्यवहार रहता है।

अमिताभ बच्चन अभिनय के शहंशाह हैं, फिर भी वो रिहर्सल करते हैं। इस बारे में आपका क्या अनुभव है?

अमित सर और अभिनय एक समीकरण की तरह हैं। फिर भी सर काफी रिहर्सल्स करते हैं। ‘बदला’ में हम दोनों को लगभग पूरी फिल्म में एक साथ, एक फ्रेम में काम करना था। मेरी आदत है, मैं रिहर्सल नहीं करती, स्पॉनटेनियस एक्टिंग करती हूं। लेकिन अमित सर को रिहर्सल करनी होती है। मुझे लगता है बार-बार रिहर्सल करने से एनर्जी वेस्ट होती है, जो फाइनल टेक के लिए बचती नहीं। लेकिन अमित सर मुझसे कहते थे, ‘आइए, मोहतरमा, एक बार तो रिहर्सल करते हैं आपके साथ।’ अमित सर बहुत कम यानी दो-चार घंटों की नींद लेते हैं, आराम शब्द नहीं है उनके पास। मैं कहती थी, सर आराम कीजिए, आपको नींद की जरूरत है, रिहर्सल की नहीं। लेकिन वो अपने काम को अपना भगवान, अपना ईमान, अपना धर्म मानते हैं। मुझे समझ में नहीं आता कि इस उम्र में उन्हें इतनी एनर्जी कहां से मिलती है। दुनिया के लिए प्रेरणादायी शख्सियत हैं अमित सर।

आपकी हर फिल्म में आपके किरदार काफी डिफरेंट होते हैं, क्या यह कॉन्शस डिसीजन होता है आपका?

कुछ ऐसा नहीं कहा जा सकता। ‘नाम शबाना’, ‘पिंक’, ‘मुल्क’ जैसी फिल्मों में मुझे और फिल्म को सराहा गया। शायद इसीलिए मेरी इस तरह की इमेज बनती गई। मेकर्स ने मुझे ऐसे रोल ही दिए-ए वूमन विद स्ट्रॉन्ग स्पाइन। सच्चाई यही है कि अब दर्शक बेवकूफ नायिका को देखना नहीं चाहते, फिर वो ग्लैमरस ही क्यों न हो। मैं चूंकि नॉन फिल्मी फैमिली से हूं, मेरा कोई गॉडफादर-मेंटर नहीं है, लिहाजा मेरे लिए लिखे गए रोल और कहानी नहीं मिलेगी मुझे। जो भी ऑफर्स मिले, उनमें सेलेक्शन करती गई। वैसे यह खुशी की बात है कि अपने वजूद पर जिंदगी जीने वाली सशक्त स्त्री के किरदारों

के लिए मेरा सेलेक्शन होता है।

फिल्म ‘बदला’ महिला दिन 8 मार्च के दिन रिलीज हो रही है। आपके लिए फेमिनिन लिबर्टी (नारी मुक्ति ) क्या है?

नारी मुक्ति हाथों में झंडा लहराने से नहीं मिलती। यह एक सोच है एक ऐसी सोच, जो महिलाओं को दकियानूसी ख्यालों से आजाद करती है। स्त्री मुक्ति से यह मतलब नहीं है कि उसने किसी की परवाह किए बिना उन्मुक्त जीवन जीना शुरू किया हो। नारी मुक्ति से मेरा मतलब है इक्वेलिटी। जहां स्त्री और पुरुष एक समान हों। उनके साथ एक-सा व्यवहार हो। एक युवक और एक युवती, दोनों की अगर एजुकेशनल क्वालिफिकेशन एक-सी हैं तो सैलरी भी एक जैसी मिलनी चाहिए। उनकी डेजिग्नेशन भी समान हो। अगर मैं सिर्फ बॉलीवुड की बात करूं तो सालों-साल हीरो का मेहनताना हीरोइनों से बहुत ज्यादा था, यह भी असमानता थी।

इस तरह महिलाओं को कम आंकने की सोच कब-कैसे कम होगी?

हम अच्छी सोच और अच्छे काम से इसकी शुरुआत कर सकते हैं। आप अपने घर से शुरू कीजिए। घर के काम-काज का बंटवारा स्त्री और पुरुषों का एक-सा करें। क्यों महिलाएं बर्तन मांजें और पुरुष सिर्फ अखबार पढ़ते रहें? महिलाओं को कोई डिक्टेट न करे। अगर महिलाओं की मर्जी है तो वो काम करेंगी, लेकिन उन्हें झुकाकर, उन्हें किसी बात पर राजी करवाना मैं गलत मानती हूं।

पुरुष प्रधान समाज में स्त्री अत्याचार को रोकने के लिए क्या किया जाना चाहिए? घरेलू हिंसा कैसे रुके?

मैंने कहा ना कि समाज पहल करे, आप शुरू करें। आपने अगर स्त्री अत्याचार को देखा तो पुलिस में शिकायत करें। आवाज उठाएं। लगभग हर देश में पुरुष प्रधान मानसिकता है। उसको पूरी तरह खत्म करने में वक्त लगेगा पर पहल करें, स्त्री-पुरुष समानता का आग्रह रखिए।

आप बॉलीवुड में किस एक्ट्रेस को (फ्रेटरनिटी ऑफ वूमेन सब्सटांस यानी) अपनी बिरादरी का मानती हैं?

मेरे लिए कोई एक अभिनेत्री ऐसी नहीं है। अनुष्का शर्मा, प्रियंका चोपड़ा, दीपिका पादुकोण और कंगना रनोट ये सभी मुझसे सीनियर हैं। इन्होंने अपने क्षेत्र में खुद के बलबूते पर अपनी एक जगह बनाई है। हर दौर में ऐसी अभिनेत्रियां रही हैं, जिन्होंने अपने टैलेंट के बलबूते पर कई बार हीरो से अधिक मेहनताना पाया है। मैं इन सभी की सराहना करती हूं।

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