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Interview : सुशांत सिंह राजपूत ने खोले पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ की सीक्रेट्स

फिल्म सोनचिड़िया (Sonchiriya) में चंबल के बागियों की कहानी है। इसमें सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) अहम किरदार में हैं। एक बागी, डाकू का किरदार निभाने के लिए उन्होंने क्या एफर्ट किए? इस तरह का किरदार निभाना सुशांत को रिस्की नहीं लगा जबकि दर्शक उन्हें क्यूट ब्वॉय के रोल में ज्यादा पसंद करते हैं? बातचीत सुशांत सिंह राजपूत से।

Interview : सुशांत सिंह राजपूत ने खोले पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ की सीक्रेट्स

सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) इन दिनों फिल्म सोनचिड़िया (Sonchiriya) को लेकर चर्चा में हैं। पहले थिएटर फिर टीवी से फिल्मों में आए सुशांत सिंह राजपूत ने बहुत कम समय में इंडस्ट्री में बिना किसी गॉडफादर के अपने लिए अलग जगह बनाई है। उन्होंने पहली ही फिल्म ‘काई पो चे’ में अपने एक्टिंग से इंडस्ट्री के कई मेकर्स को इंप्रेस कर दिया था। इसके बाद वह ‘शुद्ध देसी रोमांस’, ‘एम एस धोनी’, ‘राब्ता’ जैसी कई फिल्मों में नजर आए। सुशांत अपनी पिछली फिल्म ‘केदारनाथ’ में सारा अली खान के अपोजिट थे। पेश है, सुशांत सिंह राजपूत से हुई बातचीत के चुनिंदा अंश...

‘सोनचिड़िया’ के पहले भी कई फिल्में बागियों, डाकुओं पर बन चुकी हैं, यह फिल्म उन फिल्मों से कितनी मेल खाती है और अलग है?

अगर समानता की बात करूं तो सबके तन पर खाकी वर्दी और सबके हाथ में बंदूक हैं, वो भी इसलिए क्योंकि उनकी सोच एक जैसी है और बात अगर सिर्फ इस फिल्म की करूं तो यही कहूंगा कि यह फिल्म बाकी बागी फिल्मों से काफी अलग है और काफी इंट्रेस्टिंग भी। उन फिल्मों में बागियों के एकजुट होने का मुद्दा एक ही है लेकिन हमारी फिल्म में हर कोई अपने-अपने कॉन्फ्लिक्ट की वजह से एकजुट हुआ है। अगर मेरे किरदार की ही बात की जाए, तो मुझे कुछ चाहिए और वो मुझे नहीं मिलता है तो मैं बागी बन जाता हूं, दूसरी तरफ मैं यह भी सोचता हूं कि अगर वो चीज मुझे मिल जाए तो क्या होगा? ऐसे ही सबके अपने-अपने मुद्दे हैं।

सुनने में आया था कि इस किरदार को निभाने के लिए आपने खुद को दुनिया से दूर कर दिया था, ऐसा क्यों?

अगर आप किसी ब्लैकबोर्ड पर कुछ नया लिखना चाहते हैं तो उसके पहले आपको उस पर लिखी चीजें मिटानी पड़ती हैं। बस मेरी भी यही कोशिश थी, कुछ नया करने के लिए मुझे पुरानी चीजों को भूलना था। मेरा मानना है कि आपको किसी भी चीज को पाने के लिए कुछ समय खुद के साथ बिताना चाहिए। झट से कोई चीज नहीं मिलती। एक छोटा बच्चा भी पैदा होते ही बात नहीं करता, उसे बोलने में दो साल का वक्त लग जाता है। इसी तरह अपना हंड्रेड पर्सेंट देने के लिए मुझे अपना ध्यान खुद पर फोकस करना था, मेरे लिए यह किरदार काफी चैलेंजिंग था।

फिल्म की शूटिंग चंबल की रियल लोकेशन पर हुई, इस वजह से अपने किरदार को निभाने में आपको कितनी मदद मिली?

बहुत ज्यादा, अगर हम कहीं और शूट करते तो मेरी दाढ़ी-मूंछ जरूर बढ़ जाती लेकिन मुझे बार-बार खुद को यह कहकर प्रिपेयर करना पड़ता कि मैं चंबल में हूं, धूप में हूं, आस-पास रेत है, गर्मी हो रही है। चंबल में होने से खुद-ब-खुद धूप और गर्मी लग रही थी, इसलिए खुद को बार-बार यह बताना नहीं पड़ रहा था कि मैं चंबल में हूं, इसलिए काम और भी आसान हो गया। पूरा ध्यान किरदार और एक्टिंग पर रहा। इसके साथ मुझे कई पर्सनल फायदे भी हुए हैं, कैलोरीज बर्न होने से मुझे जिम की जरूरत नहीं पड़ी, साथ ही जो मन में आता था, मैं वो खा पाता था, किसी तरह का कोई परहेज नहीं था।

फिल्म में आपके साथ मनोज बाजपेयी भी हैं, जो पहले भी डाकू, बागी का रोल कर चुके हैं, आपने शूटिंग से पहले उनसे कुछ टिप्स लिए?

मनोज जी दिग्गज एक्टर हैं, मैं उस वक्त से उनका फैन हूं, जब मैं इंडस्ट्री में था भी नहीं। मैं खुद को खुशनसीब समझता हूं कि मुझे उनके साथ काम करने का मौका मिला। मैं चाहता तो उनसे कई टिप्स ले सकता था, शूटिंग पूरी होने के बाद उन्होंने अपने कई एक्सपीरियंस भी बताए लेकिन उनसे पहले इसलिए कुछ नहीं पूछा क्योंकि मैं उनके किसी किरदार से प्रभावित नहीं होना चाहता था। एक एक्टर होने के नाते मुझे कुछ नया करना था।

दर्शक आपको क्यूट ब्वॉय के रूप में ज्यादा पसंद करते हैं, ऐसे में आपको डाकू का रोल करना रिस्की नहीं लगा?

हो सकता है दर्शक मुझे क्यूट लुक में पसंद करते हैं, लेकिन एक एक्टर होने के नाते मैं दर्शकों को अपने सारे शेड्स दिखाना चाहता हूं। मैं जो हूं, अगर वही पर्दे पर भी करूं तो क्या नया है? हां, मैं जो नहीं हूं अगर वो कर दिखाऊं तो बड़ी बात है। दर्शक यह फिल्म देखेंगे तो मेरे किरदार को जरूर पसंद करेंगे।

फिल्म में डायरेक्टर अभिषेक चौबे और भूमि पेंडनेकर के साथ काम करने का एक्सपीरियंस कैसा रहा?

अभिषेक जी को तो मैं कई सालों से खोज रहा था काम करने के लिए, लेकिन मुझे बेहद खुशी है इस बात की कि इस फिल्म के लिए वो मुझे ढूंढ़ते हुए आए। वह कमाल के डायरेक्टर हैं। स्टोरी को नैरेट करने का उनका अंदाज यूनीक है, जिसका मैं कायल हूं। जहां तक बात भूमि की है, वो बहुत ही अच्छी और मेहनती एक्ट्रेस हैं।

मेरी नजर में सच्चा हमसफर

जल्दसुशांत सिंह राजपूत प्यार और सच्चे हमसफर को लेकर क्या सोचते हैं? पूछने पर वह जवाब देते हैं, ‘मेरे हिसाब से सच्चा साथी या सही हमसफर वही है, जिसे न सिर्फ आप समझें बल्कि वो भी आपको समझे। अगर मैं किसी मुकाम को पाने के लिए कड़ी मेहनत कर रहा हूं, तो वह उस बात को समझे और मेरा साथ दे, न कि मेरा ध्यान किसी और तरफ खींचे या मुझे डिस्टर्ब करे।’

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