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Sunday Special: जब विधु विनोद चोपड़ा की ज़िद के आगे लाल कृष्ण आडवाणी नें मानी थी हार, पढ़ें पूरा किस्सा

बॉलीवुड के मशहूर फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा नें आज अपनी ज़िंदगी के 69 साल पूरे कर लिए हैं। अपनी किताब 'अनस्क्रिप्टेड कंन्वरसेशन ऑन लाइफ एंड सिनेमा' में उन्होंने लाल कृष्ण आडवाणी और अपना एक मज़ेदार किस्सा सुनाया है।

Sunday Special: जब विधु विनोद चोपड़ा की ज़िद के आगे लाल कृष्ण आडवाणी नें मानी थी हार, पढ़ें पूरा किस्सा
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बॉलीवुड के मशहूर फिल्म डायरेक्टर और प्रोड्यूसर विधु विनोद चोपड़ा (Vidhu Vinod Chopra) नें आज अपनी ज़िंदगी के 69 साल पूरे कर लिए हैं। विधु एक कश्मीरी पंडित हैं और उनका जन्म 5 सितंबर 1952 को जम्मू कश्मीर के श्रीनगर में हुआ था। मर्डर ऐट मंकी हिल से अपने करियर की शुरुआत करनें वाले विधु विनोद चोपड़ा स्वभाव से काफी हठी है। तो आज विधु के जन्मदिन पर एक ऐसा ही किस्सा सुनानें जा रहें हैं। जिसे वह कई बार अपनें इंटरव्यूज़ में भी बया कर चुकें हैं। इस किस्से को उन्होंनें अपनी किताब 'अनस्क्रिप्टेड कंन्वरसेशन ऑन लाइफ एंड सिनेमा' (Unscripted Conversations on Life and Cinema) में भी बयान किया है। विधु और अभिजात जोशी (Abhijat Joshi) की ये किताब इस साल की शुरुआत 9 फरवरी 2021 को रिलीज़ हुई थी।


विधु विनोद चोपड़ा को 'मर्डर ऐट मंकी हिल' (Murder At Monkey Hill) के लिए नेशनल अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था। इस बात की जानकारी विधु विनोद चोपड़ा को अखबार के ज़रिए मिली थी। उन्होंने एक मीडिया को दिए गए अपनें इंटरव्यू में बताया, "नेशनल अवॉर्ड मिला तो हिंदी में छपा था कि नकद पुरस्कार 4000 रुपये। तो हम बड़े खुश हो गए दिल्ली पहुंच गए, स्टेज पर चढ़ गए तो उन्होंनें लाल फीते वाला मेडल पहनाया गया। अब मेरा ध्यान पूरा एनवेलप पर था, तो दिया उन्होंनें लिफाफा अब लिफाफा देखता हूं तो पतला सा था वो मैने कहा यार 4000 रुपये उन दिनों तो 100- 100 रुपये होते थे तो मोटा होना चाहिए था, मेरे से रहा नहीं गया तो मैनें खोल दिया। तो अंदर से देखता हूं तो एक बॉन्ड निकलता है पोस्टल बॉन्ड 4 साल के बाद भुनाने योग्य। तो मै वैसे ही खड़ा हो गया।"


आगे विधु नें बताया, "लोग ये देखकर बोल रहे क्या हुआ मैनें धीरे से आडवाणी जी (Lal Krishna Advani) से कहा कि मैनें कहा कि ये तो नकद पुरस्कार की बात हुई थी ये तो पोस्टल बॉन्ड है 7 साल के बाद। वो बोले 'हां पर ये आप को मिल जाएगा 7 साल के बाद' फिर मैनें कहा 7 साल बाद तो उन्होंने कहा, 'ज्यादा मिल जाएगा लगभग डबल हो जाएगा।' मै बोला सर पर नकद पुरस्कार तो अभी नकद मिलना चाहिए, तो वो बोले 'चलो अच्छा बात करते हैं उतरो', तो अब विज्ञान भवन स्टेज पर आप खड़े हैं। अब मैनें कहा कि नहीं सर मै कैसे उतरू आपने मुझे बोला था नकद पुरस्कार आप नकद दे दीजिए। अब ये बातचीत तो राष्ट्रपति सुन रहे हैं नीलम संजीवा रेड्डी (Neelam Sanjiva Reddy) वो हिंदी कम जानते थे, तो उन्होंने अंग्रेज़ी में पूछा कि कोई समस्या है नौजवान तो मैनें उनको अंग्रेजी में बोला, उन्होंने नकद देने का वादा किया था और यह नकद नहीं है। आडवाणी जी नें कहा 'आप शास्त्री भवन आइए सुबह 11 बजे आपको पैसे मिल जाएंगे, चलिए।'"


अपनी बात को जारी रखते हुए विधु नें आगे कहा, "मै घबरा गया कि उतर गया तो फिर खत्म बात हो गई। अब वहां तीन ही लोग थे मै था, आडवाणी जी थे और राष्ट्रपति। मैनें राष्ट्रपति जी से कहा कि इन्होंने पैसे नहीं दिए तो मै कहां जाउंगा आपको फोन करूंगा नंबर दे दीजिए, तब राष्ट्रपति ने कहा 'नहीं ये बहुत अच्छे इंसान है दे देंगे नहीं दिए तो आप राष्ट्रपति भवन आ जाना हो जाएगा आपका काम।' तो मै उतर गया, फिर 11 बजे पहुंचा शास्त्री भवन इतनें गुस्सें में बैठे हुए आडवाणी जी और उन्होंनें ज़ोर से मुझपर चिल्ला कर कहा कि ये मै भारत का भविष्य देख रहा हूं, राष्ट्रीय पुरस्कार के विजयता अपने पिता जी को फोन लगाइए मैनें उठा लिया फोन वो बोल रहे थे कि मै उनसे पूछना चाहता हूं कि ये है भारता का भविष्य और वो लगातार बोलते ही जा रहे थे।"


इस पर मैनें कहा कि आप नें नाश्ता किया है। तो वो रुक गए बोले 'क्यों, क्यों?' मैनें बोला किया है न तो वो बोले 'हां किया है क्यों।' तो मैनें कहा मैनें नहीं किया मै भूखा हूं। तो वो बोले 'क्यों' तो मैनें कहा मेरे पास पैसे नहीं है, मैनें कहा उधार की कमीज़ है, पहली बार पैंट इतनी अच्छी पहनी है और दोस्तों से पैसे लिए थे उधार उनकों क्या बोलूंगा कि 7 साल के बाद तुम 1200 का 2500 ले लो सर आप भाषण रहनें दीजिए मुझे पैसे दे दीजिए।" विधु की इतनी बात सुनकर आडवाणी जी पिघल गए। आडवाणी जी नें फिर शास्त्री भवन में विधु के लिए नाश्ता ऑर्डर किया। विधु ने वहां नाश्ता किया और फिर आडवाणी जी नें उन्हें पोस्ट ऑफिस भेजा और वहां पर उन्हें 4000 रुपये नकद मिल गए। विधु ने बताया कि वह उनके जीवन की पहली कमाई थी जो उन्हें इतनें संघर्ष के बाद मिली थी।

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