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माहवारी के वो पांच दिन और राधिका आप्टे की ये दर्दभरी कहानी पढ़कर आंखें हो जाएंगी नम

मैंने जब फिल्म की कहानी सुनी, तो बहुत खुशी हुई। दरअसल, यह फिल्म औरतों के स्वास्थ्य से जुड़े एक अहम मुद्दे पर बात करती है। जब महिलाओं को पीरियड्स होते हैं, तो सैनेटरी नैपकिन पैड का इस्तेमाल करना जरूरी होता है। इसके बावजूद हमारे देश में माहवारी या सैनेटरी नैपकिन पर बात करना टैबू है। महिलाएं भी इस बात पर शर्म और अपराध महसूस करती हैं। जब औरतें मेडिकल स्टोर पर सैनेटरी नैपकिन पैड लेने जाती हैं, तो दुकानदार भी उसे काले रंग के कागज में लपेटकर ही देता है। वहीं हमारे देश में शिक्षा और धन के अभाव के चलते देश की अस्सी प्रतिशत से अधिक महिलाएं हर माह माहवारी के पांच दिन सैनेटरी नैपकिन पैड का उपयोग करने की बजाय गंदे कपड़े या पत्ते या राख का इस्तेमाल करती हैं। जिससे उन्हें कई तरह की बीमारियां हो जाती हैं। कुछ बीमारियों का इलाज हो पाता है, तो कुछ बीमारियों का इलाज नहीं हो पाता है, वे मौत की शिकार हो जाती हैं। कुछ लड़कियां इन पांच दिनों में स्कूल नहीं जाती हैं। ऐसी कई समस्याएं महिलाओं को सिर्फ इसलिए झेलनी पड़ती हैं क्योंकि सैनेटरी नैपकिन सस्ते नहीं हैं या उपलब्ध नहीं हैं। हमारी फिल्म ‘पैडमैन’ दो रुपए में सैनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराने के लिए मशीन का ईजाद करने वाले अरुणाचलम मुरुगनाथन की जिंदगी से इंस्पायर है।

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