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हर खलनायक अपने आपमें नायक होता हैः पुनीत इस्सर

गरजती आवाज, पहलवानों जैसी मांस-पेशियां, पुनीत इस्सर को उनके शारीरिक एसेट्स से आगे देखना कठिन है। वह उस समय स्क्रीन पर आए थे, जब नकारात्मक, सकारात्मक किरदार के बीच गहरा अंतर माना जाता था।

हर खलनायक अपने आपमें नायक होता हैः पुनीत इस्सर
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गरजती आवाज, पहलवानों जैसी मांस-पेशियां, पुनीत इस्सर को उनके शारीरिक एसेट्स से आगे देखना कठिन है। वह उस समय स्क्रीन पर आए थे, जब नकारात्मक, सकारात्मक किरदार के बीच गहरा अंतर माना जाता था।

पुनीत बुराई का चेहरा बन गए, जब बीआर चोपड़ा ने उन्हें ‘महाभारत’ में दुर्योधन की भूमिका में पेश किया। इसके बाद पुनीत ने कई फिल्मों, टेलीविजन सीरियलों में अलग-अलग रोल करके ‘दुर्योधन की इमेज’ से निकलने की भरपूर कोशिश की, जैसे फिल्म ‘बॉर्डर’ में रतन सिंह का पॉजिटिव किरदार निभाया।

लेकिन दुर्योधन की छवि ने उनका पीछा नहीं छोड़ा। पुनीत कहते हैं, ‘थिएटर में मैंने रावण की भूमिका अदा की, लेकिन हर परफॉर्मेंस के बाद दर्शक मुझ पर दुर्योधन के कुछ डायलॉग बोलने का दबाव डालते।

मैं महसूस करता कि तीन घंटे तक रावण बने रहने के बाद भी मैं उस चरित्र की इमेज से मुक्त नहीं हो पा रहा हूं, जो मैंने तीन दशक पहले निभाया था। दर्शकों के अनुरोध पर आज भी जब मैं मामाश्री कहता हूं तो दर्शक खिलखिलाकर हंस पड़ते हैं।’

वैसे, स्वयं पुनीत भी अपने अंदर से दुर्योधन को कहां निकाल पाए हैं। उन्हें अहसास है कि विख्यात चरित्र होने के बावजूद आइकोनिक सीरियल में दुर्योधन को एक ध्रुवीय व्यक्ति बना दिया गया था।

इस चरित्र को निभाने से पुनीत को राष्ट्रीय पहचान अवश्य मिली, लेकिन वह इस चरित्र को और गहराई तक समझना चाहते थे। पुनीत कहते हैं, ‘मुझे मैथलीशरण गुप्त की ‘जयद्रथ वध’ कंठस्थ है, जिसमें अर्जुन, सुभद्रा और अभिमन्यु की भावनाओं को व्यक्त किया गया है।

मैंने रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की ‘रश्मिरथी’ को पढ़ा है, जो घटनाओं को कर्ण की दृष्टि से देखती हैं। इसलिए कुछ वर्ष पहले मैंने ‘महाभारत’ पर एक नाटक लिखना शुरू किया, जो इस महाकाव्य को दुर्योधन और कर्ण की दृष्टि से देखता है।

मैं संस्कृत नाटक ‘उरुभंगम’ से प्रेरित हुआ, जिसमें भीम से युद्ध के बाद दुर्योधन अपने जीवन और कर्मों पर विचार करता है। यहां हमें मालूम होता है कि वह भी मानव है, जो बुराइयों से अछूता नहीं है।’

पुनीत, दुर्योधन और कर्ण की नि:स्वार्थ दोस्ती से प्रभावित हुए। तमाम साजिशों, धोखों और जटिलताओं के बाद भी यह एक संबंध है, जो शुद्ध था। साथ ही पुनीत ने नकारात्मकता कैसे विकसित होती है।

इसका भी विश्लेषण किया है, ‘जब अभिमन्यु अपनी मां के गर्भ में युद्ध करना सीख सकता है तो दुर्योधन में नकारात्मकता क्यों नहीं आ सकती? अंधेरे के बीज तो पहले ही बो दिए गए थे।’

बहरहाल, खलनायकों को समझने का जो यह नया क्रिएटिव ट्रेंड चला है, उससे हीरो का जश्न मनाना कम होता जा रहा है। लेकिन अगर साहित्यिक इतिहास को देखें तो ऐसी मिसालों की कमी नहीं है।

इसलिए पुनीत इसे नया ट्रेंड नहीं मानते हैं। उनके अनुसार, ‘शेक्सपियर ने अपने खलनायकों में हीरो जैसे गुणों की तलाश की है। इतिहास विजयी लोग लिखते हैं, लेकिन कुछ समय बाद उसका पुनः मूल्यांकन किया जाता है।

हर खलनायक अपने आपमें नायक होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमने अर्जुन को खलनायक बना दिया है। जो गलत है वह गलत है, लेकिन एक कहानी की अनेक परतें होती हैं और यही महाभारत को टाइमलेस बना देता है। लोग इसके चरित्रों को वास्तविक पाते हैं। इन चरित्रों का प्रतिबिंब आज भी लोगों में मिलता है।’

नाटक को आगे बढ़ाने के लिए पुनीत को एक कथावाचक की आवश्यकता थी। इसके लिए वह आसानी से अमिताभ बच्चन या शत्रुघ्न सिन्हा या हरीश भिमानी को ले सकते थे।

उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि वह बीआर चोपड़ा की महाभारत से लिंक नहीं जोड़ना चाहते थे बल्कि अपना प्रभाव छोड़ना चाहते थे। इसलिए उन्होंने धरती मां का चरित्र विकसित किया, जो कुरुक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करती है। वह कहती है कि मारा कोई भी जाए लेकिन आखिर खून तो उसका ही बहता है।

निर्देशन के क्षेत्र में कदम रखने के बारे में पुनीत कहते हैं, ‘बहुत से लोग यह भूल जाते हैं कि मैंने सलमान खान की फिल्म ‘गर्व’ का निर्देशन किया है और अनेक टीवी सीरियलों का भी निर्देशन किया है, जिनमें ‘जय माता की’ भी है, जिसमें हेमा मालिनी मुख्य भूमिका में थीं। हालांकि फिल्म बनाना मुश्किल होता है, लेकिन थिएटर की भी अपनी चुनौतियां होती हैं।’

सवाल यह है कि क्या आज के समय में पुनीत की पसंद के सिनेमा के लिए कोई जगह है, जिसमें चीजों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जाता है और बॉम्बास्टिक डायलॉग होते हैं?

पुनीत जवाब देते हैं, ‘यह विषय और उसके प्रस्तुतिकरण पर निर्भर करता है। ‘बाहुबली’, ‘बाजीराव मस्तानी’ और ‘पद्मावत’ जैसी फिल्मों ने साबित किया है कि किस तरह इस स्पेस में भी सफल हुआ जा सकता है।’

पुनीत इस समय एक वेब-सीरीज पर काम कर रहे हैं, जो आइकोनिक पहलवान गामा पर आधारित है। इस फिल्म में उनके दोस्त सलमान खान शीर्षक भूमिका में हैं। सलमान ‘सुल्तान’ में पहलवान बन चुके हैं।

इसलिए यह जानना दिलचस्प है कि उन्होंने सलमान को अखाड़े में लौटने के लिए कैसे मनाया? पुनीत बताते हैं, ‘दोनों भूमिकाओं में कोई तुलना नहीं है, एक काल्पनिक चरित्र है और दूसरा वास्तविक। सलमान इस सीरीज से न सिर्फ संतुष्ट हैं बल्कि इसके निर्माता भी हैं।’

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