Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh

Interview : नितीश वाधवा का खुलासा- घर में टीवी, फ्रिज भी है लेकिन टॉयलेट नहीं है

नितीश वाधवा डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ से बॉलीवुड में बतौर एक्टर डेब्यू कर रहे हैं। इससे पहले उन्होंने फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर और कास्टिंग डायरेक्टर के रूप में भी काम किया। नितीश वाधवा से बेबाक बातचीत।

Interview : नितीश वाधवा का खुलासा-  घर में टीवी, फ्रिज भी है लेकिन टॉयलेट नहीं है
X

नितीश वाधवा ने अपने करियर की शुरुआत थिएटर से की थी। नितीश ने कुछ विज्ञापन और कुछ शॉर्ट फिल्में भी की हैं। मुंबई आने के बाद उन्होंने राकेश ओमप्रकाश मेहरा के साथ फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ में बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर भी काम किया। इसके बाद कास्टिंग डायरेक्टर बनकर ‘दंगल’ और ‘रंगून’ के लिए कास्टिंग भी की। अब फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ से वह बॉलीवुड में बतौर एक्टर डेब्यू कर रहे हैं। इस फिल्म और इसमें अपने किरदार से जुड़ी बातचीत नितीश वाधवा से।

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ बतौर एक्टर आपकी पहली फिल्म है, इसका ऑफर कैसे मिला?

मैं बहुत पहले से ही राकेश सर के साथ काम करना चाहता था। जब मुझे पता चला कि मुकेश छाबड़ा इस फिल्म की कास्टिंग कर रहे हैं और रोल के हिसाब से जिस उम्र, पर्सनालिटी की दरकार है, वो मेरे पास है तो मैं तुरंत मुकेश जी के पास पहुंचा। मैंने उनसे रिक्वेस्ट की कि बस किसी भी तरह एक बार मुझे ऑडिशन देने का मौका दें। तय दिन मैं पप्पू पांडे (किरदार) की तरह कपड़े और बाल बनाकर पहुंच गया। मैंने ऑडिशन दिया, कुछ दिन बाद मुझे पता चला कि मैं शॉर्ट लिस्ट हो गया हूं। फिर एक दिन मैं रोल के लिए फाइनल हो गया हूं, इसका भी फोन आया। वो दिन मेरी जिंदगी का सबसे खुशी का दिन था।

फिल्म में अपने किरदार के बारे में क्या कहेंगे, कैसी तैयारियां कीं आपने?

मेरे किरदार का नाम पप्पू पांडे है, जो बेसिकली इलाहाबाद से है। जहां उसका बुक स्टॉल का बिजनेस है, लेकिन अब लोग मोबाइल, आईपैड पर किताबें पढ़ने लगे हैं, इसलिए उसका धंधा मंदा पड़ जाता है। तब वो कमाने के इरादे से मुंबई आता है। मुंबई में वो वीटी स्टेशन पर एक मैग्जीन स्टॉल खोलता है। इस किरदार के लिए मैं वीटी के कई मैग्जीन, बुक और अखबार के स्टॉल्स वालों से मिला। उनसे मैंने जाना कि वो किस तरह की लाइफ जीते हैं, कब उठते हैं, सोते हैं, कितना कमा लेते हैं, कितना बचा पाते हैं। इस तरह मुझे अपने किरदार को समझने में काफी मदद मिली।

फिल्म में आपका और अंजलि (जो सरगम का रोल कर रही हैं) का लव एंगल भी है, उस लव स्टोरी के बारे में कुछ बताएं?

दरअसल, सरगम का आठ साल का बेटा कन्नु मेरे यहां स्टॉल पर काम करता है। ऐसे में मैं रोज सुबह काम के लिए उसके घर से उसे पिकअप करता हूं। उसी दौरान मेरी मुलाकात कन्नु की मां यानी कि सरगम से होती है। मैं उसे देखते ही दिल दे बैठता हूं। मुझे उससे एकतरफा प्यार हो जाता है, लेकिन चूंकि पप्पू पांडे बहुत ही शर्मीला किस्म का इंसान है, इसलिए अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाता। धीरे-धीरे कन्नु के बहाने पप्पू रोज सरगम से मिलता है और कहानी आगे बढ़ती है।

फिल्म खुले में शौच के लिए जाने से महिलाओं को कौन-सी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है पर बनी है, क्या आप पहले से इस समस्या से रूबरू थे?

जानकारी थी मुझे लेकिन ऊपरी, मैं कभी गहराई में नहीं गया था। ठीक उसी तरह जैसे मैंने किसी अखबार के न्यूज की सिर्फ हेडिंग पढ़ी हो पूरी न्यूज नहीं। लेकिन यह फिल्म करने के बाद असली दिक्कतों के बारे में मुझे पता चला, तब यूं लगा कि मैंने हेडिंग के बाद पूरी खबर भी पढ़ ली है। फिल्म की शूटिंग घाटकोपर इलाके में हुई है। मुझे वहां जाकर और उन लोगों के बारे में यह जानकर बहुत आश्चर्य हुआ कि उनके घर में टीवी, फ्रिज भी है लेकिन टॉयलेट नहीं है, ये अपने आप में बहुत बड़ा सवाल है।

इंडस्ट्री में आपने करियर की शुरुआत कैसे की?

मुझे बचपन से ही एक्टिंग का शौक रहा है। स्कूल के दिनों में मैं ड्रामा करता था। बाद में बकायदा एक साल मैंने थिएटर और फिल्म इंस्टीट्यूट से एक्टिंग की ट्रेनिंग ली। फिर मैं थिएटर करने लगा। मुझे डायरेक्शन की भी समझ थी, इसलिए मैंने शुरुआत बतौर असिस्टेंट डायरेक्टर की। मैं राकेश सर के साथ फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ का असिस्टेंट डायरेक्टर भी रहा हूं। उसके बाद मैं कास्टिंग डायरेक्टर बन गया और मुकेश छाबड़ा के साथ मिलकर मैंने फिल्म ‘दंगल’ और ‘रंगून’ की कास्टिंग की। हालांकि मैंने डायरेक्शन, कास्टिंग दोनों किया लेकिन जो मजा एक्टिंग में था, वो किसी में नहीं। तब मुझे लगा कि एक्टिंग ही मेरी कॉलिंग है। फिर मैंने कुछ एड किए और हाल ही में दो शॉर्ट फिल्में भी कीं।

आपके मुताबिक इंडस्ट्री में करियर बनाने के लिए लक जरूरी है या हार्ड वर्क?

मुझे लगता है लक एक जगह है और हार्डवर्क एक जगह। अगर आपको कोई मौका मिलता है और आप कड़ी मेहनत से खुद को साबित कर लेते हैं, तो आपकी गिनती लकी पर्सन में होने लगती है। लेकिन आप यदि यह सोचकर घर बैठे रहें कि मैं किस्मतवाला हूं, मेरे पास काम खुद आएगा, मेरा कुछ ना कुछ अच्छा ही होगा, तो आई थिंक आपका कुछ नहीं हो सकता है। आपको कोशिशें लगातार करनी होगी, क्योंकि लक का रोल बहुत छोटा होता है और कड़ी मेहनत आपको लंबी रेस का घोड़ा बनाती है। एक वाक्य में कहूं तो हार्ड वर्क से लक बदला जा सकता है।

और पढ़े: Haryana News | Chhattisgarh News | MP News | Aaj Ka Rashifal | Jokes | Haryana Video News | Haryana News App

Next Story
Top