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Exclusive Interview : नवाजुद्दीन सिद्दीकी का बड़ा खुलासा, संजय राउत और उद्धव ठाकरे ने बाला साहब के बारे में बताई ये बातें

qफिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’, ‘मंटो’ के बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक और बायोपिक ‘ठाकरे’ में नजर आएंगे। यह फिल्म महाराष्ट्र के फेमस पॉलिटिकल लीडर रहे बाला साहब ठाकरे पर बेस्ड है। फिल्म को प्रोड्यूस किया है संजय राउत ने और डायरेक्टर हैं अभिजीत पानसे। 23 जनवरी के दिन बाला साहब ठाकरे का जन्मदिन होता है, इसीलिए 25 जनवरी को फिल्म रिलीज जा रही है। एक खास मुलाकाल में फिल्म ‘ठाकरे’ और करियर से जुड़ी बातें साझा कर रहे हैं, नवाजुद्दीन सिद्दीकी...

Exclusive Interview : नवाजुद्दीन सिद्दीकी का बड़ा खुलासा, संजय राउत और उद्धव ठाकरे ने बाला साहब के बारे में बताई ये बातें
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फिल्म ‘मांझी : द माउंटेन मैन’, ‘मंटो’ के बाद नवाजुद्दीन सिद्दीकी एक और बायोपिक ‘ठाकरे’ में नजर आएंगे। यह फिल्म महाराष्ट्र के फेमस पॉलिटिकल लीडर रहे बाला साहब ठाकरे पर बेस्ड है। फिल्म को प्रोड्यूस किया है संजय राउत ने और डायरेक्टर हैं अभिजीत पानसे। 23 जनवरी के दिन बाला साहब ठाकरे का जन्मदिन होता है, इसीलिए 25 जनवरी को फिल्म रिलीज जा रही है। नवाजुद्दीन भी इस फिल्म का हिस्सा बनकर प्राउड फील कर रहे हैं। उनका रोल निभाना नवाजुद्दीन के लिए कितना मुश्किल रहा? इस फिल्म को करने के दौरान वह बाला साहब को कितना समझ पाए? लगातार बायोपिक फिल्मों में काम करने की वजह से उन्हें बायोपिक किंग कहा जाने लगा है, इस पर क्या कहेंगे? एक खास मुलाकाल में फिल्म ‘ठाकरे’ और करियर से जुड़ी बातें साझा कर रहे हैं, नवाजुद्दीन सिद्दीकी...

बाला साहब ठाकरे महाराष्ट्र के सबसे लोकप्रिय नेता थे। ऐसे नेता का किरदार पर्दे पर निभाना कितना मुश्किल रहा?

बाला साहब ठाकरे पब्लिक के लीडर थे, उन्होंने खुद कभी इलेक्शन नहीं लड़ा, न उन्हें किसी पद की लालसा थी। पूरे 82 साल तक लोगों की आंखों के सामने रहे, जनता के दिलों पर राज किया। ऐसे लोकप्रिय नेता की हर बात, उनकी बोल-चाल की शैली, उनकी आदतें पब्लिक डोमेन में रहती हैं, इसलिए मेरे लिए बाला साहब बनना चैलेंजिंग था। लेकिन फिल्म के टीजर और ट्रेलर को जिस तरह का रेस्पॉन्स मिला है, उससे मैं खुश हूं। अगर बाला साहब के किरदार को कुछ हद तक भी निभाने में कामयाब रहा तो खुद को धन्य मानूंगा।

आपने बाला साहब के रोल को निभाने के लिए किस तरह की तैयारियां कीं?

फिल्म ‘ठाकरे’ का ऑफर मुझे संजय राउत की तरफ से आया था। मेरे लिए बाला साहब को जानना-समझना, राउत जी की नजरों से ही संभव था। बाला साहब के साथ राउत जी ने 25 साल से ज्यादा समय बिताया है। वह ‘सामना’ अखबार के कार्यकारी संपादक भी हैं। मुझे राउत जी ने बाला साहब के किरदार की हर डिटेल बताई। साथ ही बाला साहब के बेटे उद्धव ठाकरे से भी मेरी मुलाकात हुई, मैंने उनसे भी ठाकरे साहब के बारे में काफी कुछ जाना। उद्धव जी के साथ मैं बाला साहब के निवास स्थान ‘मातोश्री’ पर भी गया। मुझे उद्धव जी बाला साहब के कमरे में ले गए, मैं वहां कुछ देर तक बैठा रहा। वह एक पारिवारिक इंसान थे। उन्हें कला और फिल्मों से लगाव था और कलाकारों के लिए वह आदरभाव रखते थे। बाला साहब के कमरे में मैंने गौर किया कि वहां बहुत सादगी थी। उनका पलंग भी सादा, कम हाइट वाला, कमरे में छोटी-छोटी अलमारी थीं। महंगा फर्नीचर कहीं नहीं था। बेड के बगल में एक फुट दूरी पर उनकी अलार्म घड़ी आज भी ज्यों की त्यों रखी है। देश की राजनीति में बाला साहब का बड़ा नाम है लेकिन घर पर वह एक आम इंसान थे। वह जमीन से जुड़े हुए इंसान थे।

बाला साहब के भाषण सुनना बेहतरीन अनुभव हुआ करता था। उनकी तरह स्पीच देने के लिए आपने क्या किया?

2017 में फिल्म ‘ठाकरे’ मुझे ऑफर हुई थी। लेकिन सच्चाई यह है कि मैं बाला साहब के भाषण 2012 से सुनता आया हूं। अफसोस है कि उन्हें मिलने का मौका मुझे नहीं मिला। हमने फिल्म में उनकी पॉलिटिकल इमेज से ज्यादा पर्सनल लाइफ को, स्पेस को कवर किया है। मैं मेंटली, फिजिकली दोनों तरह से बाला साहब के जितना करीब जा सकता था, उतना जाने की कोशिश की है। यह कोशिश ऑडियंस को रियल लगे, मिमिक्री नहीं इस बात का भी ख्याल रखा है। उनकी तरह स्पीच देने के लिए खूब तैयारी की।

यह फिल्म मराठी और हिंदी दो भाषाओं में बनी है। क्या आपने फिल्म के लिए मराठी भाषा पर भी काम किया?

मैंने अपना पूरा एक महीना मराठी भाषा सीखने में लगा दिया। एनएसडी का मेरा एक साथी है आशीष पाटोले, उसने मुझे मराठी सीखने में मदद की। इसके अलावा बाला साहब की तरह हाथों में ब्रश कैसे होल्ड करना है और कार्टून कैसे बनाया जाता है, इसकी भी ट्रेनिंग ली। हम सभी जानते हैं कि वह एक बेहतरीन कार्टूनिस्ट भी थे। लेकिन मराठी फिल्म के एक बड़े हिस्से के लिए सचिन खेड़ेकर डबिंग करेंगे या हो सकता है श्रीधर करें।

आपके लिए फिल्म में सबसे मुश्किल सीन कौन-सा रहा?

ठाकरे साहब पर उनके भाषणों के लिए कई मुकदमे दायर हुए, लेकिन वह डरे नहीं। जनता से जो बात कहनी है वह बिना लाग-लपेट कहते रहे। उन पर जब कोर्ट केस हुआ था, वह सीन फिल्माना मेरे लिए चैलेंजिंग था। यह सीन 40 मिनट का है, जिसे एक ही समय पर शूट करना था लेकिन ऑनस्क्रीन इसे पीसेस में दिखाया जाएगा।

बाला साहब के लुक को अपनाने के लिए आपने क्या किया?

मेरे फोरहेड पर एक बालों का पैच लगाया गया क्योंकि बाला साहब के हेयर स्टाइल से मेरी हेयर स्टाइल अलग है। प्रोस्थेटिक मेकअप आर्टिस्ट प्रीतिशील सिंह ने मेरी नाक को बाला साहब जैसा बनाया।

आपको अब बायोपिक किंग कहा जाने लगा है, इस बात को आप कैसे लेते हैं?

अगर मुझे बायोपिक किंग माना जा रहा है तो मैं इसे कॉम्प्लिमेंट के रूप में लेता हूं। लेकिन मैं खुद को बायोपिक किंग नहीं मानता हूं। ‘मंटो’, ‘ठाकरे’ और ‘मांझी: द माउंटेन मैन’ जैसी फिल्में करना एक एक्टर के तौर पर मेरे लिए बेहतरीन एक्सपीरियंस रहा। लेकिन मैंने गैंगस्टर, पुलिस ऑफिसर जैसे किरदार भी अच्छे से निभाए हैं। मैं अपनी कोई इमेज नहीं चाहता, मैं किरदार की लंबाई नहीं गहराई मापता हूं।

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