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15 साल बाद Munnabhai को लेकर हुआ खुसाला, संजय से पहले इन्हें मिला था मुन्ना का ऑफर

इन दिनों सीरियल ‘विक्रम-बेताल की रहस्य गाथा’ में अहम शर्मा राजा विक्रमादित्य का किरदार निभा रहे हैं, जिन्हें बेताल (एक प्रेत) को पकड़ना है। बेताल के रोल में एक्टर मकरंद देशपांडे हैं।

15 साल बाद Munnabhai को लेकर हुआ खुसाला, संजय से पहले इन्हें मिला था मुन्ना का ऑफर
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इन दिनों सीरियल ‘विक्रम-बेताल की रहस्य गाथा’ में अहम शर्मा राजा विक्रमादित्य का किरदार निभा रहे हैं, जिन्हें बेताल (एक प्रेत) को पकड़ना है। बेताल के रोल में एक्टर मकरंद देशपांडे हैं।

बेताल के किरदार को निभाकर वह खुश हैं। उनका मानना है कि यह किरदार निभाना बहुत चैलेंजिंग है। हाल ही में मकरंद देशपांडे से सीरियल ‘विक्रम-बेताल की रहस्य गाथा’ और करियर से जुड़ी लंबी बातचीत हुई।

सीरियल ‘विक्रम-बेताल की रहस्य गाथा’ के जरिए एक बार फिर दर्शकों को मनोरंजक और सीख देने वाली कहानियां देखने को मिलेंगी, आपका क्या कहना है?

शुरुआत में ही हमें बहुत अच्छा रेस्पॉन्स मिला है। कई लोगों ने मुझसे कहा कि लंबे गैप के बाद ऐसा सीरियल आया है, जिसे हम परिवार के साथ बैठकर देख सकते हैं। कुछ लोगों ने यहां तक कहा कि बचपन की यादें ताजा हो गईं।

इस बार बेताल के रोल में क्या कुछ अलग दर्शकों को देखने को मिलेगा?

हां, इस बार सीरियल ‘विक्रम-बेताल की रहस्य गाथा’ में काफी कुछ अलग और नया है। बेताल के किरदार को बहुत डिटेल में दिखाया गया है। इस बार बेताल हर वक्त विक्रमादित्य के कंधे पर नहीं रहता है, वह एक प्रेत है तो कहीं भी आ या जा सकता है। सबसे बड़ी बात सीरियल के विजुएल इफेक्ट्स बहुत उम्दा हैं।

बेताल का किरदार निभाना आसान है या मुश्किल?

बेताल का मेकअप करवाने में बहुत समय लगता है। बेताल एक प्रेत है, वह हवा में उड़ता नजर आता है, इसके लिए मुझे केबल से लटके रहना पड़ता है। इसके अलावा सीरियल में मेरे डायलॉग बहुत ज्यादा हैं, इस वजह से खूब प्रैक्टिस करनी पड़ती है। इस तरह बेताल के किरदार को निभाने के लिए मुझे काफी मेहनत करनी पड़ रही है।

बेताल के अलावा इस सीरियल में आपको कोई किरदार चुनने को कहा जाता तो किसे चुनते?

मुझे भद्रकाल का किरदार भी बहुत पंसद आया था। भद्रकाल के किरदार में काफी सारे शेड्स और उतार-चढ़ाव हैं, जो करने में बहुत मजा आता।

लंबे गैप के बाद टीवी वर्ल्ड में वापस आए हैं, पहले और आज के टीवी में क्या फर्क पाते हैं?

मैंने 1994 में ‘फिल्मी चक्कर’ से टीवी पर शुरुआत की थी, इसके बाद ‘रफ्तार’, ‘सैलाब’, ‘साराभाई वर्सेज साराभाई’ जैसे उम्दा सीरियल किए। समय के साथ टीवी पर बहुत बदलाव आया है।

अब तो टीवी पर अमिताभ बच्चन, सलमान खान और शाहरुख खान जैसे स्टार्स भी शो करते हैं। इस तरह देखा जाए तो अब छोटा पर्दा, बहुत बड़ा हो गया है। मैं भी इस मीडियम को बहुत खास मानता हूं। मेरे लिए थिएटर, फिल्म और टीवी, सभी एक्टिंग करने के बेहतरीन मीडियम हैं।

आप फिल्मों से ज्यादा थिएटर में बिजी रहते हैं, सुना है कि इस वजह से कुछ बड़ी फिल्में भी आपने छोड़ी थीं?

मुझे थिएटर से प्यार है, मैंने अब तक करीबन पचास से ज्यादा प्लेज किए हैं। जहां तक थिएटर की वजह से फिल्में छोड़ने का सवाल है तो यह सच है। फिल्म ‘लगान’ मुझे ऑफर हुई थी, इसकी शूटिंग साठ दिनों तक गांव में होने वाली थी, इतने दिन तक मैं थिएटर से दूर नहीं रह सकता था, इसलिए मैंने ‘लगान’ छोड़ दी।

उस दौरान आमिर ने मुझसे कहा भी कि मैं इस फिल्म को रिजेक्ट ना करूं। इसी तरह ‘मुन्नाभाई’ सीरीज में मुझे अरशद वारसी वाला सर्किट का रोल ऑफर हुआ था। पहले इसमें शाहरुख खान मुन्ना का रोल करने वाले थे।

बाद में स्टार कास्ट बदली और संजय दत्त आ गए। उस वक्त भी मैं फिल्म में बना हुआ था। बाद में पता चला कि इस फिल्म की शूटिंग के लिए भी मुझे कम से कम चालीस दिनों तक थिएटर से दूर रहना होगा, लिहाजा मैंने सर्किट वाला रोल भी छोड़ दिया। लेकिन अरशद ने सर्किट का किरदार बहुत ही अच्छे से निभाया है।

फिल्मों में आपने नेगेटिव किरदार ज्यादा किए हैं, इसकी क्या वजह है?

मुझे नेगेटिव किरदार ज्यादा ऑफर हुए। शुरुआती दौर में हमारे पास रोल सेलेक्ट करने का ऑप्शन नहीं होता है। लेकिन आज मैं इस लेवल पर हूं कि अपने किरदार खुद चुन सकता हूं। ऐसा नहीं है कि मैंने पॉजिटिव रोल नहीं किए हैं, महेश भट्ट की फिल्म ‘सर’ में और ‘स्वदेस’ में पॉजिटिव किरदार निभाए थे, उन किरदारों में दर्शकों ने मुझे खूब सराहा था।

बतौर एक्टर मकरंद देशपांडे को कई लोगों से तारीफ मिली है। लेकिन कोई ऐसी तारीफ भी किसी से मिली है, जिसे वह भूल नहीं पाए हैं?

‘एक बार गुलजार साहब मेरा नाटक देखने आए थे। उन्हें मेरा नाटक देखकर बहुत खुशी हुई।वह मेरे पास आकर बोले, ‘मैं तुम्हें गले लगा कर बधाई देना चाहता हूं।’ इसके बाद उन्होंने मुझे बहुत प्यार से गले लगाया। उनकी तारीफ मैं आज तक नहीं भूला हूं। सच, गुलजार साहब का प्यार भरा स्पर्श मेरे लिए सबसे नायाब तारीफ थी।’

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