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नामकरण: प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने की पहल

महेश का यह सीरियल स्टार प्लस पर 12 सितंबर से शुरू होगा।

नामकरण: प्रचलित मान्यताओं को तोड़ने की पहल
मुंबई. फिल्मकार महेश भट्ट जो भी विषय चुनते हैं, उसे वह बदले दौर के हिसाब से देखते हैं, उसकी नई व्याख्या का भी जोखिम उठाते हैं। स्टार प्लस पर आने वाले अपने सीरियल ‘नामकरण’ की कहानी का ताना-बाना भी उन्होंने प्रचलित मान्यताओं को तोड़ते हुए बुना है, समाज के सामने सवाल रखे हैं। सीरियल से जुड़ी कुछ अहम बातें महेश भट्ट से।
आमतौर पर रिश्तों का ताना-बाना लोग परंपरागत ढांचे में ही देखते हैं, लेकिन फिल्मकार महेश भट्ट रिश्तों को परंपरागत रूप में न देखकर बदले दौर के हिसाब से देखते रहे हैं और इसे अपनी फिल्मों में दिखाते रहे हैं। छोटे पर्दे के लिए भी उन्होंने जो सीरियल बनाया है, उसकी कहानी भी उन्होंने इस तरह की बुनी है, जो समाज की प्रचलित मान्यताओं को तोड़ती है, नई परिपाटी बनाने की पहल है। महेश का यह सीरियल स्टार प्लस पर 12 सितंबर से शुरू होगा।
ंमहेश भट्ट के अनुसार इस सीरियल की कहानी एक दस साल की बच्ची की है। वह अपनी सिंगल मदर के साथ रह रही है। बच्ची बेहद जिज्ञासु है, ऐसे सवाल करती है, जो समाज की प्रचलित मान्यताओं को चुनौती देते हैं। महेश बताते हैं, ‘असल में ‘नामकरण’ की दास्तां एक दस साल की बच्ची की नजर से दिखाई देगी, जो एक बहुत ही अहम सवाल पूछती है कि क्या यह जरूरी है कि एक औरत या तो अपने पिता के नाम से जुड़ी रहे या फिर शादी के बाद अपने पति के नाम से जुड़ी रहे? क्या वह अपने आप में पूरी नहीं है?’
सुनने में आया था कि इस सीरियल की कहानी महेश भट्ट की पर्सनल लाइफ पर बेस्ड है। इस बात में कितनी सच्चाई है? इस सवाल पर वह बेहिचक जवाब देते हैं, ‘कहा जा सकता है कि इस सीरियल की बुनियाद कहीं न कहीं मेरी आपबीती से जुड़ी है। लेकिन मेरी आत्मकथा नहीं है। जिस तरह हर लेखक अपनी ही जिंदगी से कुछ हासिल करता है। हर क्रिएशन में अपने रंग भरता है। ‘नामकरण’ में भी हमने कुछ ऐसा ही किया है। जिंदगी की जो सच्चाइयां जी हैं, देखी-सुनी और महसूस की हैं, सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि आस-पास के लोगों की भी, उन कहानियों का निचोड़ है ‘नामकरण’।’
बिना पूछे महेश यह भी स्पष्ट कर देते हैं, ‘कई लोग यह भी कह रहे हैं कि यह सीरियल मेरी फिल्म ‘जख्म’ से प्रेरित है, जबकि ऐसा बिल्कुल नहीं है। ‘जख्म’ जहां खत्म होती है, यह सीरियल वहां से शुरू होता है।’ इस सीरियल के जरिए क्या मैसेज देने की कोशिश है? पूछने पर महेश भट्ट बताते हैं, ‘सीरियल की रुह में हिंदुस्तान की बदलती हुई नारी का अहसास है। यह सीरियल महिलाओं को मैसेज देगा कि हीरो का इंतजार करना छोड़ दीजिए, खुद के हीरो बनिए। अपनी खुद की ही गुलामी से मुक्त होइए। कभी भी अपने आपको लाचार-बेबस महसूस न करिए।’
‘नामकरण’ जैसी कहानी को छोटे पर्दे पर पेश करने के पीछे क्या उद्देश्य है? इस सवाल के जवाब में महेश कहते हैं, ‘छोटा पर्दा लोगों की विचारधारा पर असर डालता है, इसलिए हम लोगों ने इस कहानी के लिए टीवी का माध्यम चुना है। हम टीवी के नियमित दर्शकों से रूबरू होकर अपने इस विचार को फैलाएंगे। ‘नामकरण’ मेरा अब तक सबसे इंपॉर्टेट और इंस्प्रेशनल प्रोजेक्ट है।’
सीरियल में लीड कैरेक्टर में आरशीन नामदार एक साहसी और बेबाक
बच्ची अवनि का किरदार निभा रही है। एक बच्ची को लीड रोल में लेने का कारण क्या है? महेश बताते हैं, ‘एज ए सीरियल मेकर्स हम ऐसा कैरेक्टर ढूंढ़ते हैं, जिससे ऑडियंस आसानी से जुड़ सकें। एक बच्ची के साथ ऑडियंस बहुत आसानी से कनेक्ट हो जाएगी, इसलिए हमने लीड रोल के लिए एक बच्ची को चुना है। वैसे भी आरशीन एक मिरैकल्ड चाइल्ड है। वह है तो आठ साल की, लेकिन उसकी खामोशी, उसका अंदाज-ए-बयां और उसकी परफॉर्मेंस कमाल की है। वह अपनी एक्टिंग से सबको चौंका देगी।’
सीरियल में बरखा बिष्ट अवनि की मां आशा का किरदार निभा रही हैं। महेश उनके बारे में भी बताते हैं, ‘बरखा ऑलरेडी एक स्टैब्लिश्ड आर्टिस्ट हैं। मुझे बरखा के अंदर स्मिता पाटिल की झलक दिखाई देती है। वह आशा के किरदार में ऑडियंस को जरूर प्रभावित करेंगी।’ क्या महेश भट्ट को पूरी उम्मीद है कि इस सीरियल को ऑडियंस का पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिलेगा? उनका तुरंत जवाब होता है, ‘जी बिल्कुल, अगर विश्वास नहीं होता, तो यह पॉसिबल ही नहीं था कि तीन घंटे की फिल्म बनाने वाला मुझ जैसा इंसान इस सीरियल के बारे में सोचता। जब मुझे खुद ही विश्वास नहीं होता, तो फिर मेरे लिए ऑडियंस को रोज तीस मिनट का कंटेंट देना पॉसिबल ही नहीं है। इस सीरियल का कंटेंट आजकल के सीरियल से एकदम अलग होगा। मेरा मानना है कि महिलाएं इमोशनली ‘नामकरण’ से खुद को कनेक्ट करेंगी।’
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