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होली के गाने: होली आई रे कन्हाई रंग बरसे से लेकर बरसाने की होली के गीत मोह लेंगे मन

होली के गाने हमारी फिल्मों में भी होली गीतों की खूब धूम रही है। आज भी होली के कई फिल्मी गीत बरबस ही हमारी जुबान पर आ जाते हैं।

होली के गाने: होली आई रे कन्हाई रंग बरसे से लेकर बरसाने की होली के गीत मोह लेंगे मन

होली रंग का ही नहीं, राग का भी त्योहार है। हमारे गांव-कस्बों में आज भी होली पर फाग गीत गाए जाते हैं, सब मिलकर रंग खेलते हैं, गीतों पर झूमते हैं। हमारी फिल्मों में भी होली गीतों की खूब धूम रही है। आज भी होली के कई फिल्मी गीत बरबस ही हमारी जुबान पर आ जाते हैं। ऐसे ही कुछ होली गीतों पर एक नजर।

डायरेक्टर-प्रोड्यूसर महबूब खान ने 1940 में फिल्म ‘औरत’ बनाई थी, जिस पर बाद में ‘मदर इंडिया’ बनी। इस फिल्म की कहानी जहां दर्शकों के दिलों को छू गई, वहीं फिल्म में मौजूद होली गीत ने भी सबका मन मोह लिया था। इस गीत के बोल थे ‘होली आई रे कन्हाई रंग बरसे...’। इस फिल्म के बाद हिंदी फिल्मों में होली के गीतों का सिलसिला चल पड़ा, जो आज तक जारी है।

हर रंग के होली गीत

होली पर हिंदी फिल्मों में हर तरह के गीत आए हैं। हर गीत की अपनी अलग बात थी। भजन शैली का एक होली गीत 1950 में आई फिल्म ‘जोगन’ में था। फिल्म में मीरा बाई के एक भजन ‘डारो रे रंग डारो रे रसिया...’ को गीता दत्त की आवाज में रिकॉर्ड किया गया था। इसे हिंदी फिल्मों के सबसे अच्छे भजनों में शामिल किया जा सकता है। यह गीत बहुत सफल हुआ था।

इसके बाद 1953 में एक बार फिर महबूब खान ने अपनी फिल्म ‘आन’ के जरिए एक शानदार होली गीत दिया, ‘खेलो रंग हमारे संग...’। इस गीत को शकील ने लिखा था और नौशाद ने संगीत दिया था, जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि होली देश में हर धर्म के लोगों द्वारा मनाया जाने वाला त्योहार है, इसमें हर कोई एक सी उमंग के साथ शामिल होता है।

इसी के अगले साल आई फिल्म ‘पूजा’(1954) का गीत ‘होली आई प्यारी प्यारी भर पिचकारी...’ दर्शकों के मन पर छा गया। फिर 1956 में फिल्म ‘दुर्गेश नंदिनी’ का हिट गीत ‘मत मारो श्याम पिचकारी’ आया और लोगों को झूमने और नाचने पर मजबूर कर गया। 1959 में फिल्म ‘नवरंग’ आई, इस फिल्म का होली गीत ‘अरे जा रे हट नटखट...’ जबरदस्त हिट रहा। इस गीत की एक खास बात यह रही कि पर्दे पर राधा और श्याम की भूमिका एक्ट्रेस संध्या ने ही अदा की थी।

फिल्मों में आम जनमानस की होली के साथ शाही होली के रंग भी दिखाए जाते रहे हैं। सबसे पहले शाही होली 1960 की फिल्म ‘कोहिनूर’ में दिखाई गई थी, जिसमें ट्रेजडी किंग और क्वीन के रूप में मशहूर दिलीप कुमार और मीना कुमारी अपने गंभीर अभिनय से इतर रंगों की मस्ती में गाते हैं ‘तन रंग लो जी आज मन रंग लो।’

होली के गीतों में कुरीतियों का विरोध

होली के गीतों के जरिए हिंदी फिल्मों ने समाज की कुरीतियों को दूर करने की कोशिश भी की। समाज में पहले एक विधवा को होली के रंगों से दूर रखा जाता था, क्योंकि होली प्रेम और मिलन का प्रतीक है, इसमें विधवा की उपस्थिति को ठीक नहीं समझा जाता था। लेकिन यह एक सामाजिक कुरीति थी, जिस पर विराम लगाना जरूरी था। इस समस्या पर तीन फिल्मों में चोट की गई।

1966 में एक फिल्म ‘फूल और पत्थर’ आई थी, जिसकी सफलता से धर्मेंद्र स्टार बने थे। इस फिल्म में मीना कुमारी विधवा की भूमिका में थीं, जिनसे धर्मेंद्र को प्यार होता है, अपने प्यार का इजहार धर्मेंद्र ‘लाई है हजारों रंग होली...’ के जरिए करते हैं। फिर एक फिल्म ‘कटी पतंग’ 1970 में आई, जिसमें आशा पारेख विधवा की भूमिका में थीं और उनसे राजेश खन्ना अपने प्यार को ‘आज न छोड़ेंगे...’ गीत से व्यक्त करते हैं और इस गीत में ‘बुरा न मानो होली है’ शब्दों को दोहराया जाता है।

इसी सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए 1975 की फिल्म ‘शोले’ का उल्लेख भी जरूरी है, जिसमें गब्बर सिंह की भूमिका कर रहे अमजद खान का एक डायलॉग आज भी लोगों की जुबान पर है, ‘होली कब है...कब है होली’। जैसे ही वह ये डायलॉ‚ग बोलते हैं, अगले ही पल पर्दे पर होली की मस्ती छा जाती है और गांव वालों के साथ मिलकर धर्मेंद्र और हेमा मालिनी ‘होली के दिन...’ गीत गाने लगते हैं। लेकिन इस गीत का मुख्य पहलू यह है कि विधवा की भूमिका में जया भादुड़ी और अमिताभ बच्चन के बीच इशारों ही इशारों में एक-दूसरे के लिए प्रेम की अभिव्यक्ति हो जाती है।

प्रेम-ठिठोली वाले गीत

होली को प्रेम का त्योहार भी कहा जाता है। ऐसे में प्रेम और ठिठोली की बातें भी लाजिमी हैं। 1981 की फिल्म ‘सिलसिला’ में अमिताभ बच्चन को अपनी प्रेमिका रेखा को छोड़कर जया भादुड़ी से विवाह करना पड़ जाता है और रेखा की शादी संजीव कुमार से हो जाती है। संयोग से होली के अवसर पर चारों एक जगह होते हैं और अमिताभ बच्चन सामाजिक लोक लाज को भूलते हुए अपनी पत्नी और पूर्व प्रेमिका के पति के सामने ही अपनी पूर्व प्रेमिका से, ‘रंग बरसे भीगे चूनर वाली...’ गीत गाकर फ्लर्ट करने लगते हैं।

ऐसे ही कई शानदार गीत हिंदी फिल्मों में आए हैं, जो इस मौके पर आज भी बजाए जाते हैं। इसमें प्यार के रंग, हंसी ठिठोली खूब नजर आती है। इनमें से कुछ प्रमुख हैं- ‘फागुन आयो रे...’ (फागुन, 1973), ‘होली आई, होली आई...’ (मशाल, 1984), ‘अंग से अंग लगाना...’ (डर, 1993), ‘होली खेले रघुवीरा अवध में...’ (बागबान, 2003), ‘डू मी अ फेवर लेट्स प्ले होली...’ (वक्त, 2005), ‘बलम पिचकारी...’ (ये जवानी है दीवानी, 2013), ‘लहू मुंह लग गया...’ (रामलीला, 2014)।

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