Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

''गली गुलियां'' के डायरेक्टर ने बताई फिल्म की कहानी, कहा- मां-बाप की वह बात आज आती है याद

फिल्म ''गली गुलियां'' 7सितंबर को रिलीज होगी। लेकिन रिलीज से पहले ही फिल्म डायरेक्टर दीपेश जैन ने कहानी को बताया।

अब तक बुसान, लंदन, मेलबर्न के अलावा कई इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल्स में साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म ‘गली गुलियां’ धूम मचा चुकी है। इस फिल्म और फिल्म के लीड कलाकार मनोज बाजपेयी को कई इंटरनेशनल अवार्ड भी मिल चुके हैं।

फिल्म को डायरेक्ट किया है दीपेश जैन ने। वह भारतीय हैं, लेकिन अमेरिका के लॉस एंजेल्स शहर में रहते हैं। उन्होंने इस फिल्म को भारतीय परिवेश में भारतीय कलाकारों के साथ दिल्ली में फिल्माया है। फिल्म ‘गली गुलियां’ से जुड़ी बातें डिटेल में बता रहे हैं डायरेक्टर दीपेश जैन।

डाक्यूमेंट्री बनाने का था प्लान

मेरे नाना-नानी पुरानी दिल्ली में रहा करते थे। मैं बचपन में गर्मियों की छुट्टियों में जब दिल्ली आता था तो मुझे वहां पर चाइल्ड एब्यूज की तमाम घटनाएं सुनने को मिलती थीं। मैं बड़ा हुआ तो इसी सब्जेक्ट पर डाक्यूमेंट्री बनानी चाही।

मैं ऐसे लोगों से मिला, जो चाइल्ड एब्यूज के शिकार थे और बाद में वह पूरी जिंदगी हिंसात्मक गतिविधि में ही लिप्त रहे। डॉक्यूमेंट्री के लिए रिसर्च करते-करते मुझे इतनी कहानियां मिल गईं कि मुझे अंदर से अहसास हुआ कि अब डॉक्यूमेंट्री बनाने की बजाय मुझे बच्चों के साथ जो कुछ घटित हो रहा है, उसको लेकर फीचर फिल्म बनानी चाहिए।

तब मैंने चाइल्ड एब्यूज, बच्चों के साथ हिंसा और चाइल्ड पैरेंटिंग के साथ-साथ पुरानी दिल्ली के एक मकान में अकेलेपन की जिंदगी जीने वाले खुद्दोस की कहानी को मिलाकर ‘गली गुलियां’ की कहानी लिखी।

फिल्म की कहानी

खुद्दोस (मनोज बाजपेयी) अपनी ही रहस्यमयी दुनिया में अकेलेपन की जिंदगी जी रहा है। उसने आस-पास के घरों के बाहर और अंदर कैमरे लगा रखे हैं। इनके जरिए वह दूसरों के घरों के अंदर या सामने क्या हो रहा है, यह जानने की कोशिश करता है।

खुद्दोस का दोस्त गणेशी (रणवीर शौरी) कई बार उसे वहां से निकलने के लिए कहता रहता है। अचानक खुद्दोस को एक दिन एक बच्चे इदरीस (ओम सिंह) के पीटे जाने और उसके रोने की आवाजें आती हैं तो वह विचलित हो उठता है।

खुद्दोस उस बच्चे को बचाना चाहता है, लेकिन उसने जितने कैमरे लगा रखे हैं, उनमें से किसी भी घर के अंदर वह बच्चा नहीं है। अब खुद्दोस उस बच्चे की तलाश शुरू करता है।

उधर इदरीस के क्रूर स्वभाव के पिता लियाकत (नीरज काबी) बूचड़ खाना चलाते हैं, वह चाहते हैं कि इदरीस भी बूचड़खाने पर बैठे, लेकिन वह नहीं बैठना चाहता। इसीलिए लियाकत अपने बेटे इदरीस की पिटाई करता रहता है।

पिता की पिटाई से तंग आकर इदरीस जब अपने पिता का पीछा करता है तो उसे पता चलता है कि उसके पिता के एक अन्य औरत से संबंध हैं। अब इदरीस अपनी मां से कहता है कि हमें यह जगह छोड़कर कहीं दूर चले जाना चाहिए। खुद्दोस जब इदरीस तक पहुंचता है तो सच जानकर उसके होश उड़ जाते हैं।

फिल्म का मैसेज

हमने फिल्म के जरिए बच्चों के साथ होने वाली हिंसा को सिर्फ दिखाया ही नहीं है, इसकी कई वजहें भी बताई हैं। लेकिन सभी वजहों को दूर किया जा सकता है, हल किया जा सकता है।

मेरी समझ में आया कि अगर लोग थोड़ा-सा जागरूक हो जाएं, तो चीजें बदल सकती हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बच्चा बहुत सेंसिटिव होता है। आप बच्चे को प्यार दिए बिना उसकी जिंदगी संवार नहीं सकते।

बच्चे को मारपीट कर नहीं, बल्कि प्यार से ही उनकी सही परवरिश की जा सकती है। उनका भविष्य संवारा जा सकता है। लेकिन कई मां-बाप अपने छोटे-छोटे बच्चे को पीटते हैं। हमारे माता-पिता एक ही बात कहते हैं कि हमने अगर बच्चे की पिटाई न की होती तो यह इतना सफल इंसान ना होता।

लेकिन बचपन में मारपीट सहन करने वाले ज्यादातर बच्चे बड़े होकर दिमागी रूप से बीमार रहते हैं। उनके दिमाग में बचपन में हुई पिटाई हमेशा याद रहती है। मैंने अपनी फिल्म में इस मुद्दे को ही उकेरा गया है। हमने अपनी फिल्म में तमाम सत्य घटनाओं को लिया है, लेकिन हमारी फिल्म पूरी तरह से काल्पनिक है।

Next Story
Top