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Dadasaheb Phalke Birthday: जानिए धुंडीराज से कैसे बने दादासाहेब 'फाल्के'

दादासाहेब एक भारतीय निर्माता-निर्देशक-पटकथा लेखक थे, जिन्हें भारतीय सिनेमा के पिता के रूप में जाना जाता है। भारतीय सिनमा की पहली फिल्म 'राजा हरिश्चंद्र' का निर्माण दादासाहेब फाल्के ने ही किया था। आज उनके जन्मदिवस पर जानिए उनकी जिन्दगी के कुछ रोचक बातें।

Dadasaheb Phalke Birthday: जानिए धुंडीराज से कैसे बने दादासाहेब

धुंडीराज फाल्के का जन्म 30 अप्रैल 1870 को महाराष्ट्र के त्र्यंबक (तब बॉम्बे प्रेसिडेंसी) में एक मराठी भाषी चितपावन ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पिता गोविंद सदाशिव उर्फ ​​दाजिस्त्री संस्कृत के विद्वान थे और धार्मिक अनुष्ठान करने वाले पुजारी के रूप में काम करते थे। और उनकी माँ, द्वारिकाबाई एक गृहिणी थीं। दादासाहेब सात भाई बहन थे, तीन भाई और चार बहने। दादासाहेब के सबसे बड़े भाई शिवरामपंत, दादासाहेब से बारह साल बड़े थे और बड़ौदा में काम करते थे।

उन्होंने जौहर रियासत के दीवान के रूप में काम किया और साल 1921 में उनका निधन हो गया था। फाल्के के दूसरे भाई, रघुनाथराव, ने भी पुजारी के रूप में काम किया और 21 वर्ष की कम उम्र में उनकी मृत्यु हो गई। जब दादासाहेब ने विल्सन कॉलेज मुंबई में संस्कृत के प्रोफेसर के रूप में काम शुरू किया तो उनका परिवार मुंबई में शिफ्ट हो गया था। फाल्के ने अपनी प्राथमिक शिक्षा त्रयंबकेश्वर में पूरी की और बाकि पढ़ाई मुंबई में पूरी की।


साल 1890 में फाल्के ने ऑयल पेंटिंग और वाटर कलर पेंटिंग में एक कोर्स पूरा किया। उन्होंने वास्तुकला और मॉडलिंग में भी दक्षता हासिल की। उसी वर्ष, फाल्के ने एक फिल्म कैमरा खरीदा और फोटोग्राफी, एडिटिंग में हाथ आजमाना शुरू कर दिया। अहमदाबाद की 1892 की औद्योगिक प्रदर्शनी में एक आदर्श थिएटर का मॉडल बनाने के लिए उन्हें गोल्ड मैडल से सम्मानित किया गया।

दादासाहेब के एक प्रशंसक ने उन्हें "महंगा" कैमरा भेंट किया, जिसका उपयोग अभी भी फोटोग्राफी के लिए किया जाता है। 1891 में, फाल्के ने हाफ-टोन ब्लॉक, फोटो-लिथियो और तीन-रंग सिरेमिक फोटोग्राफी की तकनीक सीखने के लिए छह महीने का कोर्स किया। कला भवन के प्रिंसिपल गज्जर ने फाल्के को बाबूलाल वरुवलकर के मार्गदर्शन में तीन-रंग ब्लॉकिंग, फोटोलिथो ट्रांसफर, कॉलोटाइप और डार्करूम प्रिंटिंग तकनीक सीखने के लिए रतलाम भेजा।

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