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मूवी रिव्यूः 'चोक्ड' का हीरो हताश है, बेरोजगार है, नाखुश है

चोक्ड में कुछ रोचक ट्विस्ट एंड टर्न हैं। हालांकि कहीं-कहीं कुछ स्थितियां स्पष्ट नहीं हो पाती हैं और अंत में अपनी कहानियों को रियलिस्टक ट्रीटमेंट देने वाले अनुराग चोक्ड को सुखद अंत में ढाल देते हैं।

मूवी रिव्यूः

हम लोग कितने किस्मतवाले हैं ना आत्या (बुआ)… जीते जी मोदी जी का राज देख रहे हैं। पहले घर छोड़ा, बनवास गए, हिमालय… ताकि हमारे अच्छे दिन आ सकें। यह संवाद निर्देशक अनुराग कश्यप की फिल्म चोक्डः पैसा बोलता है का एक किरदार बोलता है। 2014 में देश में नोटबंदी लागू होने के बाद हालात में जबर्दस्त हलचल है और बैंकों में पुराने नोटों के बदले नए नोटों को पाने के लिए लंबी कतारे हैं। झूमा-झटकी है। शोर-शराबा है। असंतोष-हताशा है। इसके बावजूद अगर कोई किरदार यह संवाद बोलता है तो साफ है कि बहुत सारे लोग नोटबंदी से खुश भी हैं। उन्हें विश्वास है कि अब कालाधन बाहर आएगा। आतंकियों-नक्सलियों की कमर टूटेगी। धनपशु नंगे होंगे। भ्रष्टाचारी सड़क पर आ जाएंगे। क्या सचमुच ऐसा हुआॽ नोटबंदी के परिणामों पर निष्कर्षहीन-अंतहीन चर्चा आज भी जारी है परंतु यह तय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीतियों की समय-समय पर खुल कर आलोचना करने वाले अनुराग कश्यप ने चोक्डः पैसा बोलता है के रूप में एक रोचक फिल्म बनाई है। इसमें अनुराग की पिछली फिल्मों तरह न तो गालियां हैं और ही सेक्स सीन। क्या अनुराग कश्यप अपने सिनेमा का नया व्याकरण गढ़ रहे हैंॽ वह बॉलीवुड के चुनिंदा फिल्माकारों में हैं जिनका सिनेमा एक स्पष्ट राजनीतिक और सामाजिक समझ को रेखांकित करता हैं। अपने किरदारों पर अनुराग की पकड़ रहती है। वह अपनी बात कहने में डरते नहीं हैं।

चोक्ड का हीरो हताश है, बेरोजगार है, नाखुश है परंतु वह अनुराग की पिछली फिल्मों की तरह शराब या नशे में नहीं डूबता। गालियां नहीं देता। अपराध की दुनिया में नहीं उतर जाता। चोक्ड की नायिका भी ग्लैमर की दुनिया दरवाजे पर दस्तक दे चुकी है मगर वह ड्रग्स नहीं लेती। मर्दों का शिकार नहीं करती। उसके विवाहेतर संबंध नहीं हैं। अनुराग का यह नया सिने-संसार है। चोक्ड में अनुराग मोदी के प्रसिद्ध एट पीएम संबोधन में नोटबंदी की घोषणा के बाद देश के हालात पर अपने अंदाज में तंज कसते हैं। जिस इमारत में नायक-नायिका रहते हैं, वहां उनके ऊपर वाले फ्लैट में किसी मंत्री का पीए थोड़े-थोड़े दिनों में आकर पांच सौ-हजार के नोटों के बंडल बना, सिंक की पाइप लाइन में जाली लगा कर भरता जाता है। यह ब्लैक मनी है। क्या सचमुच ही देश का काला धन गटर की गंदगी जैसा नहीं होताॽ नायिका बैंक में कैशियर है और गृहस्थी की गाड़ी जैसे-तैसी खींच रही है। पति कमाता नहीं। बच्चा स्कूल जाता है। इनके किचन का सिंक हमेशा बहता रहता है और एक रात अचानक नायिका पाती है कि सिंक में गंदे पानी के साथ नोटों के बंडल बह कर आ रहे हैं। इन नोटों से नायिका खुल कर खर्च करने लगती है और अचानक नोटबंदी की घोषणा हो जाती है। बिना हिसाब के पांच सौ-हजार के नोटों का अब वह किसको क्या हिसाब-किताब देगीॽ ऊपर के फ्लैट में रखे हुए काले धन का क्या होगाॽ

चोक्ड में कुछ रोचक ट्विस्ट एंड टर्न हैं। हालांकि कहीं-कहीं कुछ स्थितियां स्पष्ट नहीं हो पाती हैं और अंत में अपनी कहानियों को रियलिस्टक ट्रीटमेंट देने वाले अनुराग चोक्ड को सुखद अंत में ढाल देते हैं। नोटबंदी के बाद भले ही अभी तक सबका सब कुछ ठीक नहीं हो पाया परंतु चोक्ड के नायक-नायिका की जिंदगी पटरी पर आ जाती है। तब आप प्रार्थना करने लगते हैं कि हे प्रभु जैसे उनके अच्छे दिन आ गए, सबके आ जाएं। फिल्म को संयमी खेर ने अपने कंधों पर आगे बढ़ाया है और साबित किया है कि भले ही उनकी डेब्यू फिल्म मिर्जिया एक गलत फैसला थी, परंतु सही मौके मिलने पर वह खुद को स्थापित कर सकती हैं। संयमी का अभिनय गौर करने लायक है। वह ठेठ मिडिलक्लास नौकरी पेशा, परेशान हाल मराठी महिला लगी हैं। रोशन मैथ्यू और अमृता सुभाष भी अपनी भूमिकाओं से न्याय करते हैं। अनुराग चोक्ड से नई उम्मीदें जगाते हैं।

प्लेटफॉर्मः नेटफ्लिक्स ओरीजनल फिल्म

निर्माताः अजय जी.राय, अक्षय ठक्कर, ध्रुव जगासिया

निर्देशकः अनुराग कश्यप

लेखकः निहित भावे

अवधिः एक घंटे 54 मिनिट

सितारेः संयमी खेर, रोशन मैथ्यू, अमृता सुभाष, उपेंद्र लिमये

रेटिंग ***

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