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Interview : अंजलि पाटिल ने खोला राज, कहा- जब मैं सोलह साल की हुई तो मुझे...

साउथ की फिल्मों में काम करने के बाद अंजलि पाटिल हिंदी फिल्मों में भी धीरे-धीरे अपनी एक जगह बना रही हैं। अपनी अपकमिंग फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में लीड रोल में नजर आएंगी। फिल्म में क्या है उनका किरदार? क्या है फिल्म का मैसेज? क्या फिल्म महिला हितों की बात करती है? फिल्म से जुड़े कुछ और जरूरी सवाल अंजली पाटिल से।

Interview : अंजलि पाटिल ने खोला राज, कहा- जब मैं सोलह साल की हुई तो मुझे...
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नासिक में जन्मीं अंजली पाटिल ने अपने अभिनय करियर की शुरुआत थिएटर से की थी। 2011 में उन्होंने हिंदी फिल्म ‘दिल्ली इन ए डे’ से बॉलीवुड में कदम रखा। अंजली ने तमिल, तेलुगू, मलयालम,कन्नड़, सिंहली, मराठी और अंग्रेजी भाषा की फिल्मों में काम किया है। वह तेलुगू फिल्म ‘ना बंगारु तल्ली’ के लिए नेशनल अवार्ड भी पा चुकी हैं। ‘चक्रव्यूह’ ‘मिर्जिया’ और ‘न्यूटन’ जैसी बॉलीवुड फिल्में कर चुकीं अंजली डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में लीड रोल में दिखेंगी। इस फिल्म और समाज में महिलाओं की स्थिति से जुड़ी बातचीत अंजली पाटिल से...

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ का ऑफर कैसे मिला?

फिल्म के डायरेक्टर राकेश ओमप्रकाश मेहरा मेरे पसंदीदा डायरेक्टर हैं। उनकी जितनी भी फिल्में हैं, ‘अक्स’, ‘रंग दे बसंती’, ‘दिल्ली- 6’ ने मुझे बहुत इंस्पायर किया है। साल 2013 में मैं उनसे नेशनल अवार्ड सेरेमनी में मिली थी, जहां वो फिल्म ‘भाग मिल्खा भाग’ के लिए आए थे। मुझे तेलुगू फिल्म के लिए नेशनल अवार्ड मिला था। वहीं मैंने उनके साथ काम करने की इच्छा जताई। सो उन्होंने फिल्म ‘मिर्जिया’ में मुझे जन्नत का रोल दिया। हालांकि रोल छोटा था लेकिन मेरे लिए उनके साथ काम करना बहुत बड़ी बात थी। उसी दौरान उन्होंने मुझे फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ की हल्की-सी
कहानी बताई थी। बाद में उन्होंने स्क्रिप्ट दी और मैं फिल्म के लिए तैयार हो गई।

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ में आपका किरदार किस तरह का है?

इस फिल्म में मैं सरगम नाम की महिला का रोल निभा रही हूं। वो जब प्रेग्नेंट होती है, तो मुंबई भागकर आ जाती है। अपने बेटे की परवरिश वो अकेले और बड़ी मुश्किल से करती है। दरअसल, खुले में शौच के दौरान उसके साथ रेप हो जाता है, फिर उसका आठ साल का बेटा प्राइम मिनिस्टर को लैटर लिखता है। वैसे मेरे किरदार की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वो एक स्ट्रॉन्ग और इंडिपेंडेंट वूमेन है। जिस संघर्ष के साथ वो बतौर सिंगल मदर अपने बच्चे की परवरिश करती है, उसे देखकर यही लगता है कि उसके अंदर कंटेंप्ररी वूमेन की भी क्वालिटी है। वो ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं है, लेकिन बहुत ही प्रोग्रेसिव है।

यह फिल्म खुले में शौच पर होने वाली समस्या पर बनी है, असल जिंदगी में क्या कभी आपने इसे फेस किया है?

जी बिल्कुल, मैंने भी यह दिक्कत देखी है। वैसे तो मैं मेट्रोपोलिटन सिटी में पली-बढ़ी हूं, लेकिन मैंने काम के सिलसिले में पब्लिक ट्रांसपोर्ट में बहुत ट्रैवलिंग की है। पांच से छह घंटे मैंने बस में बैठकर सफर किया है। ऐसे में पुरुषों को यूरिनल जाने में कोई प्रॉब्लम नहीं होती थी, लेकिन एक महिला होने के नाते मैंने इस समस्या को कई बार झेला है, कई ढाबे भी रास्ते में आते, लेकिन वहां शौच की सुविधा नहीं होती है। इससे साफ जाहिर है कि हमारे समाज में आज भी ऐसे लोग हैं, जो महिलाओं की दिक्कत के बारे में सोचते तक नहीं हैं, वो चाहते हैं कि महिलाएं यह सब सहना सीखें और इसकी आदी बनें।

फिल्म ‘मेरे प्यारे प्राइम मिनिस्टर’ से आपने क्या सीखा है?

हमने इस फिल्म की शूटिंग मुंबई के घाटकोपर में खंडोबा इलाके में की है। जब हम वहां शूटिंग के लिए पहुंचे थे, तब वहां के लोगों ने बहुत जल्दी हमें अपना लिया था। हम उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गए थे। उनसे मैंने शेयरिंग और गिविंग का लेसन सीखा, मुझे महसूस हुआ कि जो अपनापन इन झुग्गियों में है, वह एक्सपेंसिव फ्लैट्स और बंगलों में भी नहीं है। मैंने वहां की काम-काजी महिलाएं, जो एक बच्चा गोद में लिए और दूसरे की अंगुली पकड़े सामान बेचने निकल जाती थीं, से यह जाना कि महिलाओं का संघर्ष ही उनकी असली खूबसूरती है। मुझे ऐसा लगा कि जो महिलाएं जितना संघर्ष करती हैं, वो उतनी ही खूबसूरत नजर आती हैं।

आप बचपन से एक्टर बनना चाहती थीं या यह लक बाय चांस एक्टर बनीं?

मेरे पिता चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं लेकिन जब मैं सोलह साल की हुई तो मुझे किताबें देखकर लगने लगा कि ये किताबें मेरे लिए नहीं बनी हैं, मुझे कुछ और करना है। मैं बचपन में कहानी लिखती थी, उसे सुनाती और एक्टिंग भी करती थी, इसलिए मुझे लगा कि मुझे इस ओर आगे बढ़ना चाहिए। फिर मैंने तीन साल ड्रामा स्कूल में पढ़ाई की। उस दौरान नाटक पढ़ने से लेकर स्टेज पर झाड़ू लगाना, चाय बनाना, सबको पिलाने जैसे काम भी किए। वहीं मुझे गोल्ड मेडल भी मिला। उसके बाद मैंने तीन साल नेशनल ड्रामा स्कूल में आगे की पढ़ाई की। वहां भी मैं दिन-रात काम करती रही थी। फिर मुझे पहली तेलुगू फिल्म मिली, जिसके लिए मुझे नेशनल अवार्ड मिला और मेरा फिल्मी करियर शुरू हो गया।

आपने तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, मराठी जैसी अलग-अलग भाषाओं की फिल्में की हैं, ऐसा क्यों?

दरअसल, मैंने ऐसा किसी इंटेंशन से नहीं किया, मुझे जब जैसे जो फिल्म मिलती गई, मैं करती गई। जब भी मैंने खुद से कुछ करने की कोशिश की है, मुझसे कुछ गड़बड़ हो जाती है। इसलिए मैंने यही सीखा है कि अपना काम शिद्दत से करो, आगे क्या होगा, मत सोचो। कहते हैं ना कर्म करो फल की चिंता मत करो। बस यही किए जा रही हूं। लोग तो मुझसे यह भी कहते हैं कि मैं एक्ट्रेस की तरह क्यों नहीं रहती, मुझ पर ऐसा प्रेशर भी आता है, लेकिन मैं वही करती हूं, उसी तरह रहती हूं, जो मुझे अच्छा लगता है, जिससे मुझे खुशी मिलती है।

वूमेंस-डे एक रिमाइंडर है

8 मार्च को महिला दिवस है, अंजली पाटिल का इस दिवस के संदर्भ में कहना है, ‘असल में ‘वूमेंस-डे’ एक रिमाइंडर है, जो लोगों में अवेयरनेस लाता है कि सदियों से महिलाओं के साथ बहुत अत्याचार हुआ है, सो अब उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए, इसलिए यह दिन रिमाइंडर का काम करता है। वूमेंस-डे, महिलाओं को भी संदेश देता है कि आपके साथ यदि काम-काज, पढ़ाई या किसी भी मुद्दे को लेकर जेंडर इनइक्वेलिटी हो रही है, तो इसके खिलाफ आवाज उठाएं। वैसे मेरे लिए हर वो दिन वूमेंस-डे होता है, जब मैं किसी महिला के खिलाफ नाइंसाफी होते देखकर सामने वाले को इस बात का
अहसास दिलाती हूं और जब वो अपनी गलती मान लेता है, तो मुझे लगता है कि मेरी कोशिश सफल हुई, एक महिला की जीत हुई।’

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