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102 नॉट ऑउट: अमिताभ बच्चन-ऋषि कपूर ने खोले यादों के ऐसे पन्ने, याद करेगा जमाना

मौका फिल्म ‘102 नॉट आउट’ के प्रमोशन का था। फिल्म के लीड एक्टर्स अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर जब मीडिया के सामने फिल्म से जुड़ी बातें करने बैठे तो दोनों को अपना बीता जमाना याद आ गया। फिर तो यादों के ऐसे पन्ने खुले, जिनमें अमिताभ और ऋषि ने साथ-साथ सफर तय किया था। दोनों ने मीडिया के सामने जो बातें कीं।

102 नॉट ऑउट: अमिताभ बच्चन-ऋषि कपूर ने खोले यादों के ऐसे पन्ने, याद करेगा जमाना

डायरेक्टर उमेश शुक्ला की फिल्म ‘102 नॉट आउट’ दो दिन पहले ही रिलीज हुई है। फिल्म की कहानी 102 साल के पिता (अमिताभ बच्चन) और 75 साल के बेटे (ऋषि कपूर) की है। फिल्म में इन दो दिग्गज अभिनेताओं की जुगलबंदी देखने लायक है। पिछले दिनों फिल्म ‘102 नॉट आउट’ के सिलसिले में अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर मुंबई के रॉयल ऑपेरा हाउस में आए थे। रॉयल ऑपेरा हाउस के स्टेज पर दोनों अभिनेताओं ने आमने-सामने बैठकर एक-दूसरे से दोस्ताना बातचीत की। पुरानी यादें साझा कीं। इस बातचीत में बदलते बॉलीवुड की भी बातें हुईं। पेश है, अमिताभ बच्चन और ऋषि कपूर के बीच हुई बातचीत के चुनिंदा अंश-

जब पहली बार किया साथ-साथ काम

अमिताभ बच्चन : याद है चिंटू, हम दोनों ने पहली बार कब एकसाथ काम किया था?

ऋषि कपूर : यस, यश चोपड़ा की फिल्म ‘कभी कभी’ में हमने पहली बार साथ काम किया था। मुझे अच्छी तरह याद है, फिल्म ‘कभी कभी’ की आउटडोर शूटिंग में ज्यादातर लोग अपने परिवार के साथ आए थे। इसके बाद हमने कई फिल्में कीं। अब ‘102 नॉट ऑउट’ में आप मेरे पापा बने हैं। मेरा किरदार फिल्म में बाबूलाल का है, जो बोरिंग है, चिढ़चिढ़ा किस्म का है। वहीं आप मेरे पापा, जो 102 साल के हैं, उत्साह से लबरेज हैं।

अमिताभ बच्चन : हां, अब इतने सालों बाद हम दोनों को फिल्म ‘102 नॉट ऑउट’ में साथ एक्टिंग करने का मौका मिला। हां, मुझे अच्छी तरह याद है, हमने कब साथ में पहली बार काम किया था। मैं उन दिनों ‘दीवार’ फिल्म की शूटिंग करके आया था, उस फिल्म में मेरा रोल रफ-टफ था, जबकि ‘कभी कभी’ में बिलकुल अलग किस्म का किरदार था। इसमें शायरी, खूबसूरत लोकेशंस थीं। यश चोपड़ा जैसे मेकर ‘दीवार’ की शूटिंग खत्म करने के बाद दूसरे दिन ही मुझे हरियाली वाले माहौल में ले आए। वाकई शानदार अनुभव था ‘कभी कभी’ फिल्म का। इस फिल्म में आप मेरे जमाई बने थे। इसके बाद हमने ‘अमर अकबर एंथनी’, ‘कुली’, ‘नसीब’ में साथ काम किया था। आखिरी बार ‘अजूबा’ में साथ काम किया था। सच में कितना लंबा वक्त गुजर गया है, हमें इडस्ट्री में काम करते-करते।

ऐसे शुरू हुआ हमारा फिल्मी सफर

ऋषि कपूर : ओह! मेमोरीज डाउन द लेन। ढेरों यादें हैं। मुझे याद आता है, अपना बचपन। हम तब मुंबई के चेंबूर में रहा करते थे। पापा (राज कपूर) उन दिनों ‘मेरा नाम जोकर’ फिल्म की प्लानिंग कर रहे थे। वे चाहते थे कि फिल्म में उनके किरदार के बचपन का रोल मुझसे करवाएं, जिससे आगे चलकर मुझे बतौर हीरो लॉन्च कर सकें। पापा ने यह बात मेरी मम्मी से डाइनिंग टेबल पर कही। लेकिन मम्मी को यह बात जमी नहीं। वह बोलीं, ‘आप एक्टिंग में हैं। आपके भाई, पूरा परिवार इस इंडस्ट्री में है। यह समय चिंटू के पढ़ने का है, उसे पढ़ने दीजिए। मैंने उनकी बातें सुन लीं। लेकिन ऐसा दिखाया कि मुझे कुछ पता ही नहीं है। खाना खाकर मैं अपने रूम में चला गया। मैंने अपनी ड्रॉइंग की कॉपी निकाली, कुछ पन्ने निकाल लिए और उन पर अपना साइन करने लगा। मैं देखना चाहता था कि हीरो बनने के बाद मैं अपने फैंस को ऑटोग्राफ दे पाऊंगा या नहीं। दरअसल, मैंने स्टार से फैंस को ऑटोग्राफ मांगते देखा था।

अमिताभ बच्चन : मेरा एक्टिंग का सफर अलग तरह से शुरू हुआ। मैंने मां से बात की। उनसे कहा, ‘मैं कोलकाता वाली नौकरी छोड़कर अभिनय में खुद को आजमाना चाहता हूं। उन्होंने सहमति दी। फिर मेरा संघर्ष शुरू हुआ। रेडियो स्टेशन ने मुझे नकार दिया, इससे आत्मविश्वास डगमगा गया। फिर ख्वाजा अहमद अब्बास की ‘7 हिंदुस्तानी’ से बॉलीवुड में डेब्यू किया। इसके बाद की कई फिल्में फ्लॉप रहीं, समझ में नहीं आ रहा था कि आगे क्या होगा? लेकिन फिल्म ‘आनंद’ के रिलीज होने के बाद करिश्मा हो गया। एक परिचित की गाड़ी लेकर पेट्रोल पंप पहुंचा, तब सुबह का वक्त था। शाम को फिर पेट्रोल डलवाने वहीं पहुंचा, तो पेट्रोल पंप पर मौजूद शख्स ने कहा-‘आप तो फिल्म ‘आनंद’ के डॉक्टर भास्कर हैं न?’ मैं तो चकरा गया। उसने मुझसे पैसे लेने से इंकार किया और कहा, ‘बाबू मोशाय, पैसे कहां भागे जा रहे हैं?’ एक लंबे इंतजार के बाद यह खुशी का पल मुझे मिला था, इसे कभी नहीं भूल पाऊंगा। अब चार दशक हो गए हैं, काम करते हुए इंडस्ट्री में। इस सफर में कभी निराश हुआ, कभी खुशी मिली, लेकिन मैं चलता रहा। सच में बहुत लंबा वक्त गुजर गया और वक्त के साथ इंडस्ट्री भी बहुत बदल गई है।

बहुत बदल गई इंडस्ट्री

अमिताभ बच्चन : सच कह रहा हूं, चिंटू जी। फिल्म इंडस्ट्री बहुत बदल गई है। अब सब डिजिटल हो चुका है। साथ ही फिल्मों के हर डिपार्टमेंट में महिलाओं की संख्या बहुत ज्यादा हो गई है। यह बात काबिल-ए-तारीफ है। नई जनरेशन को पता है की उन्हें आगे क्या करना है। मैंने पिछले दिनों कॉस्ट्यूम डिपार्टमेंट में काम करने वाली एक लड़की से उसकी क्वालिफिकेशन पूछी। मुझे ताज्जुब हुआ कि वो इतनी पढ़ी-लिखी थी, फिर भी असिस्टेंट का काम कर रही थी। वह मुझसे बोली, ‘मैं यहां हर डिपार्टमेंट में काम करने का एक्सपीरियंस ले रही हूं। आगे चलकर मुझे फिल्म डायरेक्टर बनना है। इस तरह पिछले दिनों एक यंग डायरेक्टर के साथ मैं काम कर रहा था। शॉट चल रहा था, मैं अपने डायलॉग भूल गया। मैं ठहरा एक्टिंग के ओल्ड स्कूल का स्टूडेंट। बस कह बैठा-कट! कट! अब यंग डायरेक्टर साहब मेरे पास आए और बोले, ‘इट्स माय ड्यूटी टू से कट। आपने क्यों कहा, कट?’ देखिए, आज की जनरेशन अपने काम को लेकर कितनी क्लीयर है, कितनी कॉन्फिडेंट है। जबकि इस उम्र में किसी दोस्त के बहकावे में आकर मैं अपने बाबूजी से आवेश में आकर पूछ बैठा था, ‘आपने मुझे क्यों पैदा किया? नौकरी नहीं मिल रही है।’

ऋषि कपूर : अमित जी, आपकी तरह मैं भी एक्टिंग के ओल्ड स्कूल से हूं। डिजिटल कैमरे में काम करने की आदत अब लगी है। लेकिन बार-बार रीटेक का माजरा मुझे समझ नहीं आता है। कुछ साल पहले मैं फिल्म ‘कपूर एंड संस’ की शूटिंग कुन्नूर में कर रहा था। वहां हिल स्टेशन होने के कारण अंधेरा जल्दी हो जाता है। सुबह 5 बजे का अलार्म लगाकर मैं उठकर अपने प्रोस्थेटिक मेकअप के लिए बैठ जाता था, शूटिंग 8 बजे से शुरू हो जाती थी। 2 घंटे मेकअप में देने पड़ते थे। इसके बाद रात 9 बजे तक लगातार शूटिंग करते-करते मैं थक जाता था। ऊपर से डायरेक्टर न जाने क्यों हर बार ओवर द टॉप कहते-कहते हर एंगल से वही सीन शूट किया करते थे। उनका कहना था, 100 बार सीन टेक करने के बाद जो बेस्ट होगा उसे फिल्म में एडिट करके रखेंगे। इससे मुझे लगता है कि मैं मैकेनिकल हो गया हूं। मुझमें काम करते समय कोई इमोशंस नहीं रहे हैं, क्योंकि सीनियर एक्टर्स का भी लिहाज न करते हुए उनसे कई रीटेक करवाए जाते हैं, यह बात मुझे खलती है। वैसे इंडस्ट्री में आए बदलावों से मैं भी काफी खुश हूं।

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