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केजरीवाल ने फिर पकड़ी आंदोलन की राह, पूरी सरकार लेकर एलजी हाउस के बाहर बैठे धरने पर

दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के प्रोजेक्ट पर राजनीतिक घमसान बढ़ता जा रहा है। सीएम अरविंद केजरीवाल, सोमवार को उप राज्यपाल के दफ्तर तक पैदल मार्च करते हुए पहुंचे और इसके बाद वहीं धरना पर बैठ गए। सीएम केजरीवाल के साथ तमाम मंत्री और विधायक भी धरने पर बैठ गए हैं।

केजरीवाल ने फिर पकड़ी आंदोलन की राह, पूरी सरकार लेकर एलजी हाउस के बाहर बैठे धरने पर

दिल्ली में सीसीटीवी का मुद्दा अब राजनीतिक घमासान का रूप ले चुका है, इस मुद्दे पर केंद्र और दिल्ली सरकार आमने-सामने आ गए हैं, सीएम केजरीवाल अपने मंत्रियों और विधायकों के साथ सचिवालय के बाद बैठ गए हैं, तो दिल्ली की राजनीति में बिल्कुल नई तरह की हवा चल पड़ी है

दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगवाने के प्रोजेक्ट पर राजनीतिक घमसान बढ़ता जा रहा है। सीएम अरविंद केजरीवाल, सोमवार को उप राज्यपाल के दफ्तर तक पैदल मार्च करते हुए पहु्ंचे और इसके बाद वहीं धरना पर बैठ गए। सीएम केजरीवाल के साथ तमाम मंत्री और विधायक भी धरने पर बैठ गए हैं।

आम आदमी पार्टी का आरोप है कि केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा के दवाब में आकर उप-राज्यपाल अनिल बैजल सीसीटीवी प्रोजक्ट को रोकने की कोशिश कर रहे हैं। दिल्ली के एलजी ने इस प्रोजेक्ट से जुड़ी फाइल को मंजूरी नहीं दी है, जबकि केजरीवाल सरकार इस कदम को महिला सुरक्षा की दिशा में बड़ा फैसला बताती आई है।

भाजपा एलजी के जरिए प्रोजेक्ट में डाल रही अडंगा

दिल्ली सरकार का आरोप है विपक्ष में बैठी भाजपा एलजी के जरिए इस प्रोजक्ट को रोकने का प्रयास कर रही है। आप ने कहा कि ऐसा करने से जाहिर होता है कि महिला सुरक्षा को लेकर भाजपा का क्या रवैया है।

एलजी दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे सभी विधायक उपराज्यपाल से मिलना चाहते हैं जबकि आप के मुताबिक उपराज्यपाल ने सिर्फ सीएम केजरीवाल और कैबिनेट मंत्रियों को ही मुलाकात के लिए वक्त दिया है।

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विपक्षी दल भाजपा और कांग्रेस इस परियोजना में घोटाले का आरोप लगा रहे हैं। इस बाबत दिल्ली में रोज विपक्षी दलों की ओर से केजरीवाल सरकार के खिलाफ धरना और प्रदर्शन किए जा रहे हैं। भाजपा-कांग्रेस की मांग है कि इस परियोजना को निरस्त किया जाए।

इस लिए केजरीवाल ने लिया धरने का निर्णय

दिल्ली कांग्रेस ने रविवार को इस मुद्दे पर केजरीवाल सरकार के खिलाफ कैंडल मार्च किया था। पार्टी का आरोप है कि दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाने के प्रोजेक्ट की शुरुआती लागत 130 करोड़ थी जिसको टेन्डर शर्तों में छूट देकर 571।40 करोड़ कर दिया गया है।

प्रदेश अध्यक्ष अजय माकन ने आरोप लगाया कि इस प्रोजक्ट के जरिए केजरीवाल सरकार जनता की गाढ़ी कमाई को खाने की योजना बना रही है। इससे पैदा हुए दबाव के बाद केजरीवाल ने इस मुद्दे पर |धरना देने का निर्णय लिया। इस बीच दिल्ली में महिलाओं के खिलाफ अपराधों की बाढ़ सी आ गई है।

इसको लेकर केजरीवाल सरकार को निशाना बनाया जा रहा है। जबकि उनका तर्क है कि दिल्ली पुलिस उनके अंडर में नहीं है, इस लिए वह उस तरह से काम नहीं करती, जैसा के वे चाहते हैं।

दिल्ली में सीसीटीवी कैमरे लगाने को लेकर विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है। आम आदमी पार्टी लगातार दिल्ली के उपराज्यपाल पर सीसीटीवी के काम को रोकने का आरोप लगा रही है तो उपराज्यपाल ने साफ कर दिया है कि उनकी तरफ से सीसीटीवी के काम को रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई है उल्टा दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने आज तक उनके पास इस मुद्दे से जुड़ी हुई कोई फाइल ही नहीं भेजी है तो भला काम को रोकने का सवाल ही नहीं उठता है।

इस बीच दिल्ली बीजेपी और दिल्ली कांग्रेस ने भी केजरीवाल सरकार पर सीसीटीवी कैमरे के नाम पर भ्रष्टाचार करने और देश की सुरक्षा के साथ खिलवाड़ करने का आरोप लगाया है। लेकिन आखिर ये पूरा विवाद है क्या, चलिए आपको सिलसिलेवार तौर से बताते हैं

क्या है सीसीटीवी विवाद?

14 फरवरी 2015 को केजरीवाल दिल्ली के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ली और उसके कुछ महीनों के अंदर यानी कि 13-10-2015 को कैबिनेट की बैठक में प्रस्ताव पारित कर दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर सीसीटीवी कैमरा लगाने के फैसले पर मुहर लगा दी गई।

फैसले के मुताबिक दिल्ली में सार्वजनिक जगहों पर सीसीटीवी लगाने अनुमानित लागत करीबन 130 करोड़ रखी गई थी। लेकिन कैबिनेट की तरफ से पास हुए इस फैसले पर अगले 2 सालों तक काम शुरू नहीं हो पाया। इस मुद्दे को लेकर कांग्रेस और बीजेपी दोनों ने ही केजरीवाल सरकार पर निशाना साधा और जनता के साथ धोखा करने का आरोप लगाया।

2017 में जारी हुआ था टेंडर

नवंबर 2017 में दिल्ली सरकार के अधीन आने वाले लोक निर्माण विभाग को मुख्यमंत्री और पीडब्ल्यूडी मंत्री यानी सत्येंद्र जैन की तरफ से लगभग 571 करोड़ों रुपए के टेंडर जारी करने की अनुमति मिल गई। इसके बाद टेंडर जारी किए गए और टेंडर की प्रक्रिया में सिर्फ दो कंपनियों ने हिस्सा लिया पहली कंपनी थी बीईएल यानी की बेल और दूसरी कंपनी थी एलएंडटी।

सरकार को इन दो कंपनियों की तरफ से प्रस्ताव मिला जिसके बाद बेल को दिल्ली में सीसीटीवी लगाने का कांट्रेक्ट दे दिया गया। कांट्रेक्ट के मुताबिक लगभग 321 करोड़ों रुपए सीसीटीवी लगाने के लिए रखे गए थे और लगभग 250 करोड रुपए अगले 5 साल तक इसका रखरखाव करने के लिए।

विपक्ष के निशाने पर केजरीवाल

सरकार के इस फैसले के बाद से सवाल उठने शुरू हो गए, कांग्रेस और बीजेपी दोनों ही दलों ने केजरीवाल सरकार पर घोटाले का आरोप लगाना शुरू कर दिया। दोनों ही दलों की तरफ से दलील देते हुए कहा गया कि आखिर जब केजरीवाल सरकार ने 2015 में 130 करोड़ रुपए का बजट कैबिनेट से पास करवाया था तो फिर बिना कैबिनेट की मंजूरी के बेल कंपनी को 571 करोड़ का कांट्रेक्ट कैसे दे दिया गया?

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आरोप सिर्फ इतना ही नहीं बल्कि कांग्रेस ने तो जिस तरह से ठेका बेल से ज़रिए चीनी कंपनी हिक विज़न को मिला उस पर भी सवाल खड़े किये हैं। माकन ने आरोप लगाया कि चीन की कंपनी को सीसीटीवी लगाने का काम देने के लिए सभी नियम-कानून ताक पर रखे गए। चीनी कंपनी को ठेका देने के लिए दो बार टेंडर दिए गए।

माकन के आरोप लगाया कि नवंबर महीने में बेल की वेंडर सूची में चीनी कंपनी हिकविजन शामिल नहीं थी इसलिए उस दौरान टेंडर जारी नहीं किया गया। इसके बाद जब चीनी कंपनी हिकविज़न बेल की वेंडर सूची में शामिल हुई तो फिर टेंडर जारी किया गया और सीसीटीवी लगाने का टेंडर बेल को दिया गया।

उपराज्यपाल ने केजरीवाल पर उठाये सवाल

सीएम केजरीवाल के आरोपों पर उपराज्यपाल कार्यालय की तरफ से जारी प्रेस रिलीज में अरविंद केजरीवाल और उनकी सरकार के मंत्रियों की तरफ से लगाए जा रहे आरोपों को सिरे से खारिज किया है।

उपराज्यपाल की तरफ से कहा गया कि केजरीवाल और उनके मंत्री सीसीटीवी की फाइल रोकने का जो आरोप उपराज्यपाल पर लगा रहे हैं वह आरोप पूरी तरह बेबुनियाद क्योंकि सीसीटीवी से जुड़ी कोई फाइल उपराज्यपाल के पास भेजी ही नहीं गयी।

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