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पुरस्कार लौटाने के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, जलाईं गई किताब की 500 प्रतियां

बब्बर की पुस्तक में दंगों से जुड़े तमाम प्रसंग दिये गये हैं और वह हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी और उर्दू चार भाषाओं में उपलब्ध है।

पुरस्कार लौटाने के खिलाफ जंतर-मंतर पर प्रदर्शन, जलाईं गई किताब की 500 प्रतियां
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नई दिल्ली. देश में असहिष्णुता के वातावरण के चलते पर अपने पुरस्कार वापस लौटा रहे लेखकों के खिलाफ गुस्सा जताते हुए सिख प्रदर्शनकारियों के एक समूह ने शुक्रवार को पुस्तकें जलाईं और 1984 में सिख विरोधी दंगों पर लेखकों की चुप्पी पर सवाल खड़े किए।
1984 के सिख विरोधी दंगों पर सरकारी कत्ल-ए-आम नामक पुस्तक के लेखक गुरचरन सिंह बब्बर के नेतृत्व में प्रदर्शनकारियों ने जंतर-मंतर पर किताब की 500 से ज्यादा प्रतियां जलाईं और 1984 के दंगों के लंबित मामलों में न्याय में हो रही देरी पर गुस्सा और हताशा जतायी। बब्बर ने कहा कि समाज में असहिष्णुता के वातावरण के खिलाफ अपने पुरस्कार लौटा रहे लेखक समुदाय से हम सवाल करना चाहते हैं कि पिछले 32 वर्षों से वे कहां थे? 1984 में सिख विरोधी दंगों के बाद ऐसा नागरिक आक्रोश देखने को क्यों नहीं मिला जबकि पीड़ितों को अभी तक न्याय नहीं मिला है?
बब्बर की पुस्तक में दंगों से जुड़े तमाम प्रसंग दिये गये हैं और वह हिन्दी, अंग्रेजी, पंजाबी और उर्दू चार भाषाओं में उपलब्ध है। 1998 में, सुरेश चौहान नामक एक व्यक्ति की याचिका के आधार पर पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया गया था, लेकिन बाद में प्रतिबंध को हटा लिया गया। मुंबई में जन्मे संगीतकार जुबिन मेहता ने शुक्रवार को कहा कि वह समझ नहीं पा रहे कि कलाकार, लेखक, फिल्म निर्माता और अन्य बुद्धिजीवी अपने पुरस्कार क्यों लौटा रहे हैं।
उन्होंने सुझाव दिया कि जो लोग सरकार का विरोध कर रहे हैं उन्हें सरकार से वार्ता करनी चाहिए। उन्होंने कहा कि बुद्धिजीवी अपने पुरस्कार लौटा रहे हैं चाहे वे लेखक हों या फिल्म निर्माता। उन्हें खुद को मजबूत महसूस करना चाहिए और वे जो भी कर रहे उसके लिए मैं उनका सम्मान करता हूं। दूसरी तरफ सरकार के मंत्रियों की बातें मैं पढ़ रहा हूं। मेरा मानना है कि दोनों पक्षों को बैठकर अपनी शिकायतों पर बात करनी चाहिए।

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