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कश्मीर में राजनीतिक समाधान निकालने का राष्ट्रपति से अनुरोध

उमर अब्दुल्ला ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात कर किया अनुरोध

कश्मीर में राजनीतिक समाधान निकालने का राष्ट्रपति से अनुरोध
नई दिल्ली. कश्मीर में बदस्तूर जारी हिंसक प्रदर्शन, कर्फ्यू और अलगाववादियों द्वारा बुलाए गए बंद के चलते जनजीवन पंगु बना हुआ है। वहीं शनिवार को सरकार ने घाटी में लोगों से टकराव की स्थिति को छोड़कर विकास का रास्ता अपनाने की अपील की। इसी संदर्भ में जम्मू एवं कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में विपक्षी विधायकों के एक प्रतिनिधिमंडल ने शनिवार को राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी से मुलाकात की और राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वे केंद्र सरकार से जम्मू एवं कश्मीर की समस्या का प्रशासनिक की बजाय राजनीतिक समाधान निकालने के लिए कहें। कश्मीर में जारी अशांति के इन 43 दिनों में अब तक सुरक्षा बलों के साथ टकराव में 65 लोगों की मौत हो चुकी है।
शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में एक जनसभा के दौरान कश्मीर घाटी के लोगों से अनुरोध करते हुए कहा, हम न सिर्फ कश्मीर की धरती से प्रेम करते हैं बल्कि वहां के लोगों से भी हमें प्यार है। मैं आपसे अपील करता हूं कि आप टकराव का रास्ता छोड़कर विकास का पथ अपनाएं। हम आपके हाथों में ईंट-पत्थर और हथियार नहीं देखना चाहते बल्कि उनकी जगह कलम, कंप्यूटर और नौकरियां देखना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि आपको रोजगार मिले।
उन्होंने यह भी कहा कि हिंसक विरोध प्रदर्शन से किसी भी मुद्दे को हल नहीं किया जा सकता। राजनाथ सिंह ने कहा, सबसे पहले शांति कायम होनी चाहिए, उसके बाद मुद्दों को बातचीत के जरिए सुलझाया जा सकता है। राजनाथ सिंह इस मौके पर पाकिस्तान पर जमकर बरसे और कश्मीर पर हिंसा भड़काने का आरोप लगाया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने इस अवसर पर कहा कि स्थिति के सामान्य बनाने के लिए केंद्र और भाजपा-पीडीपी की गठबंधन सरकारें मिलकर हरसंभव काम कर रही हैं।
नायडू ने समाज के सभी वर्ग के लोगों और मीडिया के एक हिस्से को भी संवेदनशील मुद्दों पर बोलने में संयम बरतने का अनुरोध भी किया। उन्होंने कहा कि मीडिया को भी ऐसे वीडियो या तस्वीरें प्रकाशित/प्रसारित नहीं करनी चाहिए 'जिनका उपयोग हमारे विपक्षी हमारे ही खिलाफ कर सकें।' उधर राष्ट्रपति से मुलाकात करने के बाद उमर ने कहा कि हिंसाग्रस्त राज्य राजनीतिक समस्या से जूझ रहा है, जिससे प्रशासनिक तरीके से नहीं निपटा जा सकता।
उमर ने राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद कहा, प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से अनुरोध किया कि वे केंद्र सरकार पर बिना विलंब किए सभी साझेदारों को साथ लेकर घाटी की राजनीतिक समस्याओं के समाधान के लिए एक विश्वसनीय और अर्थपूर्ण राजनीतिक बातचीत की प्रक्रिया शुरू करने का दबाव डालें। उमर ने बताया कि प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से यह भी अनुरोध किया कि वह केंद्र और राज्य सरकारों पर घाटी में आम नागरिकों के खिलाफ घातक हथियारों का इस्तेमाल रोकने के लिए कहें।
उमर ने कहा, जम्मू एवं कश्मीर की समस्या उसकी राजनीति से उपजी है। इससे प्रशासनिक तरीके से नहीं निपटा जा सकता और न ही बल प्रयोग से निपटा जा सकता है। इसे मानवीय संकट पैदा करके नहीं संभाला जा सकता। नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) के नेता ने कहा कि प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से आग्रह किया है कि वह अपने पद का इस्तेमाल कर केंद्र सरकार को यह बताएं कि आज जो हो रहा है उसका मूल कारण जम्मू एवं कश्मीर की राजनीति है और इसका समाधान भी राजनीतिक रूप से ही निकाला जाना चाहिए, प्रशासनिक तरीके से नहीं। उमर ने घाटी में जारी हिंसा की स्थिति से निपटने के लिए राज्य में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के गठबंधन की भी आलोचना की।
नेकां नेता ने कहा, पिछले कुछ दिनों से हमने देखा है कि लोगों को और अधिक कष्ट पहुंचाकर जम्मू एवं कश्मीर में जारी आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया जा रहा है। आठ जुलाई को बुरहान वानी के मारे जाने के बाद 'हमारी अपनी गलतियों के कारण' स्थिति नियंत्रण से बाहर हुई है। इससे पहले, जम्मू एवं कश्मीर के एक प्रतिनिधिमंडल ने उमर के नेतृत्व में राष्ट्रपति से मुलाकात की और उन्हें घाटी की स्थिति से अवगत कराया, जहां पिछले 43 दिनों से कर्फ्यू जारी है। प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति को एक ज्ञापन भी सौंपा।
उमर ने कहा, पाकिस्तान पिछले 25 सालों से घाटी में शांति भंग करने की कोशिश कर रहा है। लेकिन अगर आप मुझसे पूछें कि वानी के मारे जाने के बाद उत्पन्न हुई स्थिति क्या पाकिस्तान के कारण है, तो मैं कहूंगा, नहीं। उमर ने कहा पाकिस्तान ने निश्चित तौर पर स्थिति को भड़काने की कोशिश की है और कुछ हद तक वह उसमें सफल भी हुआ है। उमर ने कहा, लेकिन तात्कालिक तनाव का कारण हमारी अपनी गलतियां हैं। उमर ने कहा कि पहली बार ऐसा हो रहा है कि जो पहल सरकार को करनी चाहिए थी, वह विपक्ष कर रहा है। चाहे केंद्र के स्तर पर हो, संसद में कोई भी चर्चा विपक्ष ने ही शुरू की है। इसी प्रकार अगर राज्य सरकार ने कोई भी कदम उठाया है, जो वह केवल विपक्ष के दबाव में ही उठाया है न कि सरकार की पहल के रूप में।
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