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डीयू में ''थर्ड जेंडर'' के विकल्प का फॉर्मूला फेल!

ट्रांसजेंडरों को ''छक्का'' कहके अपमानित करते है कैंपस में।

डीयू में
नई दिल्ली. दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में पढ़ने वाली ट्रांसजेंडर छात्रा रिया शर्मा ने अपने सहपाठियों के भद्दे तानो से तंग आकर क्लास जाना छोड़ दिया। जानकारी के मुताबिक साल 2012 में एक स्नातक पाठ्यक्रम के लिए रिया का नामांकन 'रिया शर्मा' की जगह 'राहुल शर्मा' के नाम से कर दिया गया था। बता दें दो साल पूर्व जब पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने एक ट्रांसजेंडर को मान्यता दी थी तभी से रिया शर्मा ने ओपन स्कूल के साप्ताहिक कक्षाओं में जाना बंद कर दिया था।
ट्रांसजेंडरों को छक्का कहके अपमानित करते हैं कैंपस में
रिया अपनी व्यथा सुनाते हुए कहती है उसके सहपाठी उसे परेशान और अपमानित करते थे। कक्षा में छात्र अक्सर उसका मजाक बनाते और चिढ़ाते रहते थे। वहां के छात्र रिया को अलग-अलग नामों से बुलाकर उसका मजाक बनाया करते थे। रिया यह भी बताती है की उसके सहपाठी उसे कभी छक्का कह कर चिढ़ाते तो कभी उस पर फब्तियां कसते। कक्षा में रिया के अलावा कोई और ट्रांसजेंडर नहीं था इसलिए उनको अपमानित और अकेलापन महसूस होता था।
रिया 9 जून को अपनी अंतिम परीक्षा के समय दिखाई दी थी। रिया ने मेल टुडे को बताते हुए कहा की "परीक्षा के समय मुझे कठिन समय का सामना करना पड़ा था, अधिकारियों को मेल और फीमेल के अलावा अन्य श्रेणियों के बारे में कुछ नहीं पता।"
ज्ञात हो दिल्ली विस्वविद्यालय में पहले भी ऐसे कई मामले सामने आते रहे हैं जहां ट्रांसजेंडर छात्रों को दर्दनाक अनुभव से दो-चार होना पड़ता है।
'थर्ड जेंडर' पर्याप्त प्रगतिशील नहीं ?
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) ने 2014 में अधिसूचित किया था कि 'थर्ड जेंडर' के रूप में ट्रांसजेंडर लोगों को सभी छात्रवृत्ति योजनाओं और उच्च शिक्षा के संस्थानों में फैलोशिप कार्यक्रमों का लाभ दिया जाएगा। साल 2010 में बैंगलोर यूनिवर्सिटी देश का सबसे पहला विश्वविद्यालय बना था, जिसने अपने आवेदन फॉर्म को संशोधित कर उसमें ट्रांसजेंडर श्रेणी को शामिल किया था।
वहीं डीयू ने 2014 में अपने यहां ट्रांसजेंडर को "थर्ड जेंडर" के बतौर स्नातक पाठ्यक्रम के आवेदन फॉर्म में विकल्प के रूप में दे दिया। तो वहीं 2015 में स्नातकोत्तर के लिए ऐसा ही विकल्प दिया गया। लेकिन इस फैसले से ट्रांसजेंडर छात्र आश्वस्त नहीं थे। उन्हें भय था कि यूनिवर्सिटी इन नीयमों को लागू करवा पाने में आने वाली मुसीबतों को झेलने के लिए तैयार नहीं है।
तीन मिलियन ट्रांसजेंडर उत्पीड़न, हिंसा और यौन उत्पीड़न के शिकार
अदालत ने चिन्हित करते हुए बताया था की देश के लगभग 3 लाख ट्रांसजेंडर उत्पीड़न, हिंसा और यौन उत्पीड़न के शिकार हैं।साल 2015 में, विश्वविद्यालय को "अन्य" श्रेणी के अंतर्गत 66 आवेदन प्राप्त हुए हैं, लेकिन "वयस्क, सतत शिक्षा और विस्तार" के डियू के विभाग द्वारा किए गए एक अध्ययन की पुष्टि में पता चला है की किसी भी ट्रांसजेंडर छात्र ने 2015-2016 में प्रवेश नही लिया था। इस साल, विश्वविद्यालय ट्रांसजेंडर श्रेणी में सिर्फ 15 आवेदन पत्र प्राप्त हुए है।
प्रोफेसर राजेश ट्रांसजेडर समुदाय के लोगों पर अध्ययन कर रहे हैं। वे इन लोगों के साथ आउटरीच कार्यक्रम भी करते हैं, उनका कहना है कि "नियमित पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए कोई भी ट्रांसजेडर छात्र नहीं था और लगभग 18 छात्रों ने एसओएल में दाखिला ले लिया। लेकिन फिर भी वे छात्र कॉलेज की बुनियादी सुविधाओं से खुश नहीं हैं। इसलिए भेदभाव विरोधी नीति को संशोधित करने की आवश्यकता है।
कक्षा में भेदभाव
राहुल, एक और ट्रांसजेंडर छात्र है जिसने 2012 में डीयू में दाखिला लिया था। अभी भी उसे अपने साथी छात्रों के द्वारा पुकारे जाने वाले नाम मात्र याद करने से डर लगता है। राहुल बताते हैं की, "जब भी, मैं कक्षा में प्रवेश किया करता तो लड़कें मुझे 'हलवा' कह कर पुकारते थे और बार-बार मुझ पर कागज की गेंद फेंका करते थे। यहां तक कि शिक्षक भी मेरे ऊपर हंसा करते थे। मुझे कभी भी सभी लोगों के साथ समान महसूस नहीं हुआ। कभी-कभी तो मुझे बैठने की अनुमति भी नहीं मिलती थी।
राहुल के मुताबिक एक बार तो उन्हें परीक्षा भवन के बाहर 1 घंटे तक खड़ा रहना पड़ा था। उनके ट्रांसफॉर्म रूप को देख कर निरीक्षक हैरान रह गया था। "मुझे विश्वद्यालय को अपने लिंग में परिवर्तन के बारे में सूचित करने के लिए एक आवेदान दायर करने के लिए बताया गया।" अधिकारियों ने मुझसे सवाल भी किए की तुमने ऐसा क्यों किया और क्या जरूरत पड़ी जो ऐसा किया? उस समय मैने खुद को अपमानित महसूस किया।
इशाना, जिसने 2011 में पुरुष के रूप में एसओएल में दाखिला लिया। उसने मेल टुडे को बताया कि उसे कई कोचिंग केंद्रों पर बड़े पैमाने पर भेदभाव का सामना करना पड़ा है। जिसकी वजह से अभी तक उसे अपने स्नातक पाठ्यक्रम को पूरा करने में तकलीफ हो रही है।
विश्वविद्यालय में ट्रांसजेंडर के लिए सुविधाओं की कमी
विशेषज्ञों के मुताबिक, विश्वविद्यालय में ट्रांसजेंडर लोगों के लिए सुविधाओं की कमी है। इस वजह से इस समुदाय से कम छात्रों ने आवेदन किया है। राजेश ने बाद में और भी जानकारी देते हुए बताया, "छात्रों के लिए कोई समान अवसर सेल नहीं है। इस तरह के छात्रों के लिए शौचालय पर कोई स्पष्टता नहीं है। उन्हें हर स्तर पर भेदभाव का सामना करना पड़ता है और इस डर से, वे खुद दाखिला नहीं लेना चाहतें। कई उम्मीदवार इस तरह के मुद्दों के साथ हमारे पास आते हैं "
विश्वविद्यालय को इस साल स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए अधिक से अधिक 3.6 लाख आवेदन प्राप्त हुआ है। 60,000 से अधिक सीटों के लिए पहली कट ऑफ लिस्ट 30 जून को आ जाएगा। ऐसा पहली बार हुआ है कि विश्वविद्यालय स्नातकीय पाठ्यक्रम में प्रवेश की प्रक्रिया को पूरी तरह से ऑनलाइन कर दिया गया है।
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