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देखिए पेट पालने के लिए इन बच्चियों की तिरंगा यात्रा

रेशमा और आकाश झंडे बेचने के लिए पूरी कोशिश करती हैं,और लोगों से झंडे खरीदने के लिए विनती करती हैं।

देखिए पेट पालने के लिए इन बच्चियों की तिरंगा यात्रा
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नई दिल्ली. बाबूजी जी तिरंगा ले लो। ले लीजिए न बस सौ रुपिए का ही तो है। यह आवाज उन दो मासूम बच्चियों की है जो रोज सुबह साउथ दिल्ली के कोटला फ्लाईओवर पर तिरंगा झंडा बेचती हैं।
फ्लाईओवर पर महरूम और काली स्कर्ट में नजर आने वाली इन दोनों मासूम बच्चियों के चहरे उतरे हुए हैं क्योंकि इस बार तिरंगों की बिक्री कुछ ख़ास नहीं हुई हैं। आकाश बार-बार बड़ी-बड़ी कारों के पीछे भागते हुए झंडे खरीदने के लिए कहती है, लेकिन कोई भी तिरंगा नहीं खरीदता। इन दोनों के चहरे पर मायूसी है। बिक्री न होने पर आकाश रोने लग जाती है कि सुबह से वह एक भी झंडा नहीं बेच पाई है। इसलिए उनके घर में कुछ खाने-पीने का इंतजाम नहीं हो पाएगा।
दक्षिण दिल्ली के मूलचंद फ्लाईओवर के नीचे अपने 4 छोटे भाइयों और माता-पिता के साथ रहने वाली आकाश और रेशमा रोजाना सुबह 8 बजे अपने घर से स्वतंत्रता दिवस और गणतंत्र दिवस के अवसर पर लगभग चार-पांच दिन पहले से ही झंडे बेचना शुरू कर देती हैं। हालांकि बाकि दिनों में यह पूरा परिवार घड़ियां, चैन, खिलौैने जैसे हल्के-फुल्के सामान बेच कर अपना पेट पालता है।
आकाश बताती है कि कई बार कुछ कस्टमर्स हमें डांटते हैं तो कुछ कोई जबाब नहीं देते। मेरे पापा पिछले हफ्ते ही सदर बाजार से कपड़े के बने करीब दो हजार झंडे लाए थे। इस बार हमने कपड़े के बने झंडे मंगवाएं है क्योंकि प्लास्टिक बैन हो गया है। लेकिन प्लास्टिक के झंडों की बजाय कपड़े के झंडों की बिक्री बहुत कम हुई हैं। हमें इन दो दिनों में ही कैसे भी करके इन झंडों को बेचना है वरना यह हमारे लिए नुकसान होगा।
रेशमा और आकाश दोनों झंडों को बेचने जाने से पहले उनके महत्त्व और पूजने को लेकर बात करती हैं। रेशमा कहती है कि लोगों को पूजने के लिए तो झंडे चाहिए होंगे न ? तभी आकाश उसे टोकती है कि यह पूजने के लिए नहीं बल्कि स्वतंत्रा दिवस के लिए हैं फिर दोनों खिल-खिलाती हैं। दोनों बहनें देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की झंडा-यात्रा का भी जिक्र करती हैं कि मोदी जी ने आजादी दिवस पर झंडा-यात्रा निकालने को कहा है फिर भी लोग झंडे नहीं खरीद रहे हैं।
जब दोनों बहनों आकाश और रेशमा की बिक्री ज्यादा नहीं हो पाती है तो वह बोलती हैं कि अब हमें मूलचंद फ्लाईओवर के पास अपने स्कूल जाना है। हमें बताया गया है कि 15 अगस्त पर हमें कोलगेट (टूथपेस्ट), फ्रूटी और बिस्कुट मिलेंगे। तभी रेशमा कहती है कि हम चिड़िया भी तो खेलेंगे।दोनों के इशारों से लगता है कि वह बैडमिंटन के बारे में बात कर रही थी शायद।
रेशमा और आकाश झंडे बेचने के लिए पूरी कोशिश करती हैं यहां तक की बीच सड़क पर हाइवे पर वे दोनों बड़ी चतुराई से गाड़ियों के बीच से गुजरती हैं और लोगों से झंडे खरीदने के लिए विनती करती हैं। तीन झंडे बिक जाने के बाद रेशमा के चेहरे पर थोड़ी ख़ुशी दिखाई देती है और वह कहती है कि, "अब मां हमारे लिए नए कपड़े ला सकती है।"
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