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जीबी रोड: देह व्यापार के अलावा जिंदगियां भी बस्ती हैं यहां

यहां करीब 5 हजार से ज्यादा महिलाएं अपने परिवार के साथ रहती हैं।

जीबी रोड: देह व्यापार के अलावा जिंदगियां भी बस्ती हैं यहां
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नई दिल्ली. दिल्ली को देश की राजधानी के साथ ही कि कुछ खास जगहों के लिए भी जाना जाता है। इस शहर में रोजाना हजारों लोग आते हैं जिनमें से कई अपनी मर्जी से आते हैं तो वहीं कुछ को जबरन लाया जाता है। जबरन लाए जाने वाले लोगों मे मजदूर और अधिकतर संख्या लड़कियों की होती है। इन लड़कियों को दिल्ली में वेश्यावृत्ति के लिए लाया जाता है, जिन्हें दिल्ली की रेड लाइट जीबी रोड पर बेच दिया जाता है। जीबी रोड पर हाल में पड़ी रेड और पूरा मामला खुलने के बाद किसी ने भी वहां पर रहने वाली महिलाओं के रहने, खाने-पीने और गुजर-बसर की चिंता नहीं जताई। वहां सिर्फ देह-व्यापार ही नहीं होता बल्कि जिंदगियां बसती हैं। महिलाएं अपने पूरे परिवार के साथ रहती हैं। जो सुप्रीम कोर्ट द्वारा बन्द किए गए तीन कोठों की वजह से आज सड़क पर हैं। इसी पर आधारित
सुष्मिता मुखर्जी
की एक रिपोर्ट इंडिया टाइम्स में प्रकाशित की गई है, जिसे हिंदी में हम अपने पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रहे हैं...
दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेनों के गुजरने की आवाज और मेरे अंदर बढ़ती खामोशी ने मेरे अंदर एक आतंक सा मचा रखा था। पिछले तीन घंटे से कोई महिला भी मुझसे जीबी रोड के बारे में बात करने के लिए तैयार नहीं हुई। इससे बुरा और क्या हो सकता है कि कोई जीबी रोड या वहां पर रहने वाली महिलाओं के बारे में बात तक करना पसंद नहीं करता। लोगों को यह बात पचाना मुश्किल होगा कि जीबी रोड पर देह व्यापार के कारोबार की बात यहां की वास्तविकता नहीं है।
मेरे कदम उस बदनाम गली की ओर बढ़ रहे थे। मैंने एक महिला को उस गली में अंधेरे में बैठे हुए देखा। दिन के उजाले में भी मैं उसको बहुत मुश्किल से देख पा रही थी। वह सीढ़ियों पर ऊपर बैठी थी, उसने मुझे अपने साथ चलने का इशारा किया। मैं जीबी रोड की देह-व्यापार की उस बदनाम दुनिया में कदम रख चुकी थी जिससे हजारों वेश्याओं का वास्ता है। उस बिल्डिंग से भयानक पेशाब की बदबू आ रही थी, पान के छींटे और सड़न की दुर्गंध।
एक महिला नीले रंग के नाईट गाउन में बैठी हुई। उसने कहा कि मेरा नाम शानों हैं। उसने अपनी फोटो क्लीक करने से मना कर दिया। मज़बूरी और बेचारी उसकी आंखों में साफ़ झलक रही थी। उसकी आंखों में चमक थी। उसने बताया कि वह करीब 25 सालों से यहां है। जब कोर्ट ने इस धंधे को बंद करवाने को कहा तो मैंने सोचा की मैं वापस ग्वालियर अपने घर चली जाउंगी, और वहां खेती या मुर्गी फॉर्म खोलकर काम कर लूंगी। उसकी बातों से लग रहा था कि शायद वह कोर्ट के फैसले से खुश नहीं है जिसने उन्हें बेरोजगार के साथ ही सड़क छाप बना दिया। इतने सालों से वह जिस शहर में रह रही थी, वह उसे छोड़ना नहीं चाहती थी।
उसने बताया कि इतने सालों में कोर्ट द्वारा कई नियम लागू किये गये, पुलिस रेड पड़ना हमारे लिए कोई नई बात नहीं है। यहां तक की सरकार ने 'सेक्स लाइसेंस' तक की बात कही लेकिन क्या हुआ ? कुछ नहीं। सब हवा में ही रहा। जब से मैं यहां आई हूं तब से आज तक लड़कियां यहां रह रही हैं। यहां करीब 5 हजार से ज्यादा महिलाएं अपने परिवार के साथ रहती हैं।
रेड पड़ने के बाद से अब हमारे पास कोई काम नहीं है। हम बस अंधेरों में भीड़ का हिस्सा हैं। हम बाजार में घूमते हैं, बच्चों को स्कूल ले जाते हैं, बाजार से सामान आदि खरीदते हैं, लेकिन हमारी जिंदगी बदली नहीं है। मेरे पूरे परिवार ने मुझे छोड़ दिया है। वह लोग बात करने तक को राजी नहीं। इतने बड़े शहर में हमारा कोई अपना नहीं है। बताइए ये भी कोई जिंदगी है ?
मैंने उससे पूछा कि अगर सरकार उसकी मदद करें तो क्या वह अपनी जिंदगी एक नए सिरे से शुरू करना चाहेगी। इस बात पर उसने एक बड़ा ठहाका लगाया, सरकार और हमारी मदद करेगी? क्या तब तक कोई होगा यहां? सरकारें मदद करने के लिए होतीं बल्कि किसी गलत काम को बढ़ावा देने के लिए होती हैं। कोई सरकार हमारी मदद तब करेगी, जब हम यहां नहीं होंगे। सिर्फ कुछ एनजीओ ही हमारी मदद के लिए हाथ बढ़ाते हैं। एनजीओ हमारे लिए दवाइयां, सैनेटरी नैपकिन और गर्भ निरोधक लेकर आते हैं। यहां न कुछ बदला है, न ही कभी बदलेगा।
वहां से बहार आने के बाद मुझे अहसास हुआ शायद हम से कोई उस बदनाम गली के लिए कुछ नहीं कर सकता। आस पास के क्षेत्र की तस्वीर बिलकुल नहीं बदली नहीं , मुझे इस बात पर भी आश्चर्य है कि मटिया महल निर्वाचन क्षेत्र के अंतर्गत आने के बावजूद भी 1993 के बाद से जीबी रोड में एक भी महिला विधायक का नाम नहीं है।
इसके अलावा, 2013 में दिल्ली हाई कोर्ट द्वारा वेश्याओं के लिए पुनर्वास योजनाओं की जानकारी मांगने के बावजूद भी सरकार के पास अभी भी इस संबंध में दिखाने के लिए कुछ भी नहीं है। कुछ गैर सरकारी संगठनों ने यहां से लड़कियों को निकालकर जिंदगी फिर से शुरू करने का मौका दिया है। साथ ही उन्हें जीविकोपार्जन के लिए केंद्रों में काम भी दिया है। लेकिन लड़कियां वापस वेश्यालयों को इसलिए चली जाती हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनके परिवार को उनकी जरुरत है, या फिर वही उनकी दुनिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने जब जीबी रोड के तीन कोठों को बंद करने का आदेश दिया था तब यह सवाल क्यों नहीं उठाया गया कि उनमें रहने वाली महिलाएं कहां जाएंगी क्या करेंगी कैसे जिंदगी बिताएंगी ? यह सवाल हमेशा सोचनीय बना रहेगा।
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