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दिल्ली के इस ऑटो ड्राइवर को सलाम, खोये हुए बच्चों को पहुंचाता है उनके घर

दिल्ली का एक ऑटो ड्राइवर,जो पहुंचाता है खोएं बच्चों को उनके घर

दिल्ली के इस ऑटो ड्राइवर को सलाम, खोये हुए बच्चों को पहुंचाता है उनके घर
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नई दिल्ली. एक ऑटो ड्राइवर जो सड़कों पर सवारियां नहीं खोये हुए बच्चों को तलाशता है, खोये हुए नौनिहालों को सही-सलामत उनके घर पहुंचाना ही इसकी जिंदगी का लक्ष्य बन गया है। गरीबी और तंगहाली में दिन गुजारते हुए इस शख्श ने इंसानियत की नजीर पेश की है। इनके इस काम के लिए दिल्ली सरकार ने इन्हें सम्मानित करने का फैसला किया है।
40 वर्षीय अनिल कुमार है जो दो जून की रोटी कमाने के लिए रोज सुबह 8 बजे अपने रिक्शा के साथ दिल्ली की गलियों में घूमते हैं। सवारियों को ताकती नजरें सड़क के इस छोर से उस छोर तक जाती हैं। दिल्ली पुलिस, ट्रैफिक पुलिस और अधिकारी भी अनिल कुमार को अच्छी तरह से जानते हैं। सबको सलाम ठोंकते हुए अनिल कुमार दिल्ली के दक्षिणीपूर्वी एरिया में रोजाना रिक्शा चलाते हैं, लेकिन अब खोये हुए बच्चों को उनके परिवार से मिलवाना ही इनकी जिंदगी का मकसद बन चुका है।
यूं शुरू हुआ सिलसिला- एक दिन संगम विहार में सवारियों को उतारकर जब अनिल कुमार अपने रिक्शा में दिल्ली की तरफ बढ़ रहे थे तभी उनकी नजर सड़क किनारे खड़े बच्चों के झुण्ड पर पड़ी। जिनमें से एक बच्चा सूनी आंखों से भीड़ को देख रहा था। पूछताछ पर पता चला की वह बच्चा अपने परिवार से बिछड़ गया है, तब अनिल कुमार ने उस खोये बच्चे को घर पहुंचाने की सोची। कुमार से उस बच्चे को पुलिस को सौंप दिया और आस-पास लोगों से खोये बच्चे के बारे में पूछताछ करना शुरू कर दिया जिससे कहीं उसके मां-बाप अपने बच्चे को ढूंढते हुए ही मिल जाएं।
अनिल कुमार ने हिंदुस्तान टाइम्स से बात करते हुए कहा कि मैं जानता हूं यह सब मेरे साथ अचानक हुआ है जो किसी के भी साथ हो सकता है। एक खोए हुए बच्चे का मिलना भले एक हादसा हो, लेकिन मैं इसे एक जिम्मेदारी की तरह मानता हूं। मुझे याद है अभी कुछ महीनों पहले मैंने नेहरू प्लेस पर एक 8 साल के बच्चे को रोते हुए देखा। जो खो गया था। पूछने पर उसने बताया कि वह एक बस से यहां आया था और उसका घर बहुत दूर है। ज्यादा पूछने पर पता चला की वह द्वारका से है।
मैंने उससे उसके मां-बाप के फोन नंबर के बारे में पूछा तो उसने एक नंबर दिया जिस पर उसकी मां से बात हुई और वह द्वारका मोड़ पर अपने बच्चे को ढूंढ़ रही थी। मैं उस बच्चे को वहां छोड़ने गया, अपने बेटे को देखकर उसकी मां बहुत खुश हुई और धन्यवाद देने लगी। उस खुशी को देखकर मुझे जो संतुष्टि मिली जिसे मैं बता नहीं सकता। भीड़ की तरह नहीं फेरी आंखे - ऐसे ही एक मामले में 13 मई को जब कुमार कालकाजी से एक यात्री को छोड़कर लौट रहे थे तब उन्होंने देशबंधू कॉलेज के पास सड़क किनारे एक 4 साल के बच्चे को अकेले बैठे हुए देखा। जब उन्होंने उस बच्चे से बात करने कि कोशिश की तो बच्चे ने इनकार दिया।
बच्चा बहुत रो रहा था तो कुमार उसे एक दुकान पर कुछ खिलाने-पिलाने ले गए और बच्चे के मन को बहलाया, जिससे बच्चे से उसके बारे में कुछ जान सके। मैंने आस-पड़ोस के लोगों से बच्चे के बारे में पूछा। मैं उसको लेकर कालकाजी के बी, सी और ई ब्लॉक गया, जहां घर-घर जाकर बच्चे के बारे में जानने कि कोशिश की। कुछ हाथ न लगने पर मैं उसे पुलिस-स्टेशन ले गया। एक पुलिस कॉन्स्टेबल के साथ मिलकर हमने आस-पास के सभी अलग-अलग ब्लॉक्स में बच्चे के बारे में पूछा फिर एक व्यक्ति ने बच्चे को पहचान लिया और उसके घर की ओर इशारा कर के बताया। उस बच्चे के दादा-दादी कई दिनों से उसे ढूंढ़ रहे थे, अचानक अपने पोते को सामने देखकर उनकी आंखे छलक आयीं।

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