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जानें, दिल्ली में क्यों नहीं हो सकती ''कृत्रिम बारिश''

एक्सपर्ट्स का मानना है कि दिल्ली में कृत्रिम बारिश करवाना संभव ही नहीं है।

जानें, दिल्ली में क्यों नहीं हो सकती
नई दिल्ली. दिवाली के बाद से दिल्ली की हवा इतनी जहरीली हो गई है कि अगर इसे गैस चैंबर कहा जाए तो कोई गलत बात नहीं है। दिवाली के बाद से ही दिल्ली की हवा का मिजाज इस कदर बदला है कि लोगों को सांस लेने में परेशानी हो रही है। लोग अपने चेहरे पर मास्क लगाने को मजबूर हैं और आंखों में हो रही जलन को रोकने के लिए चश्मे का उपयोग कर रहे हैं। जहरीली हवा की वजह से स्कूल तक बंद करने पड़ गए हैं।
इस स्मॉग से छुटकारा पाने के लिए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने 'कृत्रिम बारिश' को आखिरी विकल्प बताया है, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि दिल्ली में कृत्रिम बारिश करवाना संभव ही नहीं है।
पुणे में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉपिकल मिटियोरॉलजी के पास कृत्रिम बारिश और वेदर मॉडिफिकेशन प्रोग्राम है। यहां के वैज्ञानिक पूरी दिल्ली में एयरोसोल पार्टिकल्स की दिक्कतों को जानने के लिए टेस्टिंग में जुटे हुए हैं। एक वैज्ञानिक के मुताबिक, 'कृत्रिम बारिश के लिए 80 से 90 प्रतिशत तक नमी का होना जरूरी है, लेकिन यह अकेले काफी नहीं। हमें यह समझने की जरूरत भी है कि दिल्ली में पॉल्यूशन पार्टिकल्स किस तरह के हैं? उनकी केमिकल और फिजिकल प्रॉपर्टीज क्या हैं? हो सकता है कि ये पार्टिकल्स उस तरह की बारिश की बूंदे न बनाएं जैसे असली बादल बनाते हैं।' उन्होंने आगे बताया कि आर्टिफिशियल बारिश से अगर पॉल्यूटेंट्स हट भी जाएं, तो यह थोड़े समय में वापस लौट आएंगे क्योंकि उत्सर्जन लगातार जारी रहेगा।
आइआइटी दिल्ली के सेंटर फॉर एटमॉसफेरिक सायेंसेज के प्रोफेसर मंजू मोहन का कहना है, 'कृत्रिम बारिश के लिए और ज्यादा नमी की जरूरत है। मुझे लगता है कि यह बेहद अव्यवहारिक विचार है क्योंकि इतने बड़े एरिया में कृत्रिम बारिश करवाना संभव नहीं है। स्मॉग एक या दो दिन में फिर लौट आएगा क्योंकि उत्सर्जन जारी रहेगा, ऊपर से कृत्रिम बारिश में इस्तेमाल होने वाले एयरक्राफ्ट भी उत्सर्जन करेंगे।'
बता दें कि कृत्रिम बारिश पर कुल खर्च करीब 10 से 12 करोड़ रुपए के बीच आता है। इसके लिए एयरक्राफ्ट, रडार टेक्नॉलजी और कई दूसरे इंस्ट्रूमेंट्स की जरूरत पड़ती है। कृत्रिम बारिश मौसम बदलने की तकनीक है जो कि सूखाग्रस्त इलाकों में बारिश करवाने में मदद करती है। चीन ने कई बार इस तकनीक का इस्तेमाल किया है।
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