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मुकदमों का ऐसा बोझ कि रो पड़े चीफ जस्टिस

भर्राए गले से पीएम से कहा-जजों की कमी के मुद्दे पर सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डालें

मुकदमों का ऐसा बोझ कि रो पड़े चीफ जस्टिस
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नई दिल्ली. देशभर की अदालतों में मुकदमों का पहाड़ जैसा बोझ एक दर्द बनकर फूट पड़ा। जजों और मुख्यमंत्री के एक संयुक्त सम्मेलन में भारत के प्रधान न्यायाधीश टीएस ठाकुर अपनी बात कहते-कहते रो पड़े। इस घटना के बाद पीएम ने बंद कमरे में जजों की एक बैठक बुलाई।

मुख्यमंत्रियों एवं उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के एक संयुक्त सम्मेलन के उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रधान न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने सरकार की 'निष्क्रियता' पर अफसोस जताते हुए कहा, आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते। बेहद भावुक नजर आ रहे न्यायमूर्ति ठाकुर ने नम आंखों से कहा कि 1987 में विधि आयोग ने जजों की संख्या प्रति 10 लाख लोगों पर 10 से बढ़ाकर 50 करने की सिफारिश की थी, लेकिन उस वक्त से लेकर अब तक इस पर कुछ नहीं हुआ। ठाकुर ने कहा, 'इसके बाद सरकार की अकर्मण्यता आती है जजों की संख्या में बढ़ोतरी नहीं हुई।

प्रधान न्यायाधीश जब ये बातें कह रहे थे, उस वक्त उन्हें अपने आंसू पोंछते देखा जा सकता था। उस वक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वहां मौजूद थे और पूरी गंभीरता से उनकी बातें सुन रहे थे। न्यायमूर्ति ठाकुर ने आगे कहा, मुकदमा लड़ रहे लोगों या जेलों में बंद लोगों के नाम पर नहीं है, बल्कि देश के विकास के लिए भी है। इसकी तरक्की के लिए मैं आपसे हाथ जोड़कर विनती करता हूं कि इस स्थिति को समझें और महसूस करें कि केवल आलोचना करना काफी नहीं है। आप सारा बोझ न्यायपालिका पर नहीं डाल सकते।

केंद्र-राज्य में रस्साकशी

प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि केंद्र सरकार कहती है कि जजों एवं अन्य कर्मियों की संख्या बढ़ाना राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है। राज्य सरकारें चाहती हैं कि केंद्र सरकार इसके लिए धन आवंटित करे। सीजेआई ने कहा, ये रस्साकशी चलती रहती है, लेकिन जजों की संख्या जस की तस बनी हुई है।

मामले बढ़े पर जज नहीं

आंकड़े पेश करते हुए न्यायमूर्ति ठाकुर ने बताया कि 1950 में जब उच्चतम न्यायालय अस्तित्व में आया था तो इस शीर्ष अदालत में सीजेआई समेत आठ जज थे और 1215 मामले लंबित थे। उस समय प्रति जज 100 मामले लंबित थे। उन्होंने कहा कि 1960 में जजों की संख्या 14 हो गई और लंबित मामले बढ़कर 3,247 हो गए। साल 1977 में जजों की संख्या 18 और मामलों की संख्या 14,501 हो गई। साल 2009 आते-आते शीर्ष अदालत में जजों की संख्या 31 हुई और लंबित मामले 77,181 हो गए। सीजेआई ने कहा कि 2014 में मामलों की संख्या 81,582 थी जिसे 60,260 किया गया। दो दिसंबर को जब मैंने सीजेआई का पदभार संभाला तो तब से लेकर अब तक 17,482 मामले दाखिल किए गए जिसमें 16,474 मामले निपटाए गए।

दस लाख पर 15 जज

लोगों और जजों के अनुपात की बात करें तो यह प्रति दस लाख लोगों पर 15 है। यह स्थिति अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और कनाडा से काफी कम है।

एक जज 26 सौ केस

भारत में एक मुंसिफ से लेकर उच्चतम न्यायालय तक के एक जज तक हर साल औसतन 2600 मामले निपटाए जाते हैं जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा प्रति वर्ष 81 का है।

खास बातें

-सीएम-मुख्य न्यायाधीशों का सम्मेलन

-देश में बढ़ते मुकदमों की स्थिति बताई

-केस कई पर नहीं बढ़े जज

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