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''FCI'' के लखपति मजदूरों को केंद्र करेगा बाहर

सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने बताया कि सरकार धीरे-धीरे संविदा मजदूरों को एफसीआइ से हटा देगी।

नई दिल्ली. फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (FCI) के मजदूरों की तनख्वाह तकरीबन चार लाख रूपए प्रतिमाह है। मजदूरों को मिलने वाली तनख्वाह पर केंद्र सरकार ने फैसला लिया है कि एफसीआइ के 63 डिपो, गोदाम और रेलहेड्स के कॉन्ट्रैक्ट मजदूरों की दोबारा भर्ती की जाए।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक 9 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने एफसीआइ में गड़बड़ी की आशंका जताते हुए कहा कि एफसीआइ के 370 विभागों के सभी मजदूरों को जिस तरह हर महीने लाखों वेतन दिए जा रहे हैं वह राष्ट्रपति से भी अधिक है।
शुक्रवार को सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने चीफ जस्टिस टी एस ठाकुर, जस्टिस ए एम खांविलकर और जस्टिस धनंजय चंद्रचूड़ की बेंच को बताया कि केंद्र ने 6 जुलाई को एक अधिसूचना जारी की है जिसमें एफसीआइ डिपो में बोरियों को उतारने और चढ़ाने वाले मजदूरों की दोबारा भर्ती की जाएगी।
सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार ने बताया कि सरकार धीरे-धीरे संविदा मजदूरों को एफसीआइ से हटा देगी। इससे पहले भी 1970 में ठेका मजदूरों को एफसीआइ से हटा दिया गया था। इसका मतलब यह है कि अब 46 साल के बाद इन मजदूरों को फिर से हटाया जाएगा।
कोर्ट ने उच्च स्तरीय समिति की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि एफसीआइ में मजदूरों का 1,800 करोड़ रुपये का वेतन बिल अस्वीकार किया था। समिति ने यह भी कहा कि इन 370 मजदूरों के अलावा और विभागों में ठेके पर मजदूर काम करते हैं, जिनकी औसत सैलरी 80 हजार है। उन्होने यह भी कहा कि कई ऐसे मजदूर भी हैं जो दस हजार की सैलरी पर काम कर रहे हैं।
वकील विकास सिंह जंगरा ने एफसीआइ की तरफ से कहा कि एफसीआइ को प्रति मजदूर 80 हजार रूपए की लागत आती है। इस बात पर बेंच ने कहा कि इन मजदूरों का काम सिर्फ बोरियों को चढ़ाना और उतारना है। इतने से काम के लिए उन्हे इतने ज्यादा वेतन कैसे दिए जा रहे हैं जबकि ठेके पर काम कर रहे मजदूर भी 10 हजार के वेतन पर यही काम करते हैं। इसका मतलब यह है कि कई ऐसे लोग होंगे जो अपना काम ठेका मजदूर से करवा रहे होंगे और बिना काम किए इतने सारे पैसे भी उठा रहे हैं।
बता दें कि कोर्ट ने एफसीआइ पर जो आशंका जताई थी वह सही निकली। बताया जा रहा है कि जो भी लाखों की सैलरी उठा रहे हैं वह अपना काम खुद करने की बजाय ठेका मजदूरों से करवाते है। कोर्ट ने एफसीआइ में चल रही इस लूट का खुद ही जांच की गई। जिसमें एफसीआइ में एक्सट्रा इंसेंटिव को कम करने के साथ डिपोज को खत्म करना और विभिन्न चरणों में विभागीय मजदूरों की प्रणाली को समाप्त करना।
सिब्बल ने कहा कि विभागीय मजदूरों को हटाने के लिए सरकारी की निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया है। सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट द्वारा की गई आशंकाओं के आधार पर ही यह फैसला किया गया है। अदालत ने उन्हें बताया कि मजदूर यूनियन अलग से सरकार के फैसले को चुनौती दे सकता है। एक्सपर्ट का कहना है कि अधिक सैलरी पाने वाले लोग अक्सर अपना काम करवाने के लिए 7 हजार से 8 हजार रूपए पर मजदूर रखकर अपना काम उनसे करवाते हैं। उन्होंने बताया कि ऐसा बहुत पहले से हो रहा है।
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