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एक सीट का मुकाबला नहीं, दिल्ली पाने या खोने की जंग है बवाना की टक्कर

करीब तीन महीने पहले दिल्ली नगर निगम के चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद भाजपा को पहली बार लगा कि दिल्ली में केजरीवाल को पटकनी देने का माहौल बन गया है।

एक सीट का मुकाबला नहीं, दिल्ली पाने या खोने की जंग है बवाना की टक्कर
क्या बवाना उपचुनाव में आम आदमी पार्टी की पराजय केजरीवाल सरकार की विदाई का सबब बन सकती है? यह ऐसा सवाल है जिसका जवाब 11 अशोक रोड के भाजपा मुख्यालय में बैठे निर्णय निर्धारक नेतागण हल्की मुस्कराहट के रूप में देते हैं। जाहिर है अभी कुछ दिन पहले ही बिहार में मिशन इंपॉसिबल को पॉसिबल को बनाने के बाद भाजपा के लिए भला असंभव क्या हो सकता है।

चुनावी समीकरणों पर आनंद राणा की खास रिपोर्ट:

थोड़ा कुरेदने पर भाजपा के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं आखिर हम कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। मतलब? मतलब यह कि दिल्ली के लोग परेशान हैं और सरकारी तंत्र फेल हो गया है। केजरीवाल और उनके मंत्री सिर्फ गाल बजाए जा रहे हैं, विज्ञापनों में सरकारी योजनाओं का प्रचार हो रहा है और जमीनी हकीकत सबके सामने है, लोग परेशान है। तो भाजपा का क्या करने का इरादा है? अब क्या होता है यह तो समय बताएगा। केजरीवाल के विधायक ही विद्रोह की तैयारी में हैं, हमें उम्मीद है संसदीय सचिवों के मामले में चुनाव आयोग जल्द फैसला देगा।
उत्तराखंड में कुछ महीने पहले रावत सरकार के खिलाफ नाकाम रहने के बावजूद भाजपा गोवा और बिहार में अपनी ‘बोल्ड पॉलिटिक्स’ का जलवा दिखाने में सफल रही है। कुछ इस तरीके से कि सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे। तो क्या दिल्ली में भी कोई बड़ा राजनैतिक घटनाक्रम अपने मंचन का इंतजार कर रहा है। लगता तो है। दिल्ली की केजरीवाल सरकार भाजपा की ऐड़ी में चुभ रही शूल है। इस शूल को निकाल फेंकने की कोशिशें अपने नतीजे की तरफ पिछले कुछ समय से धीरे-धीरे ही सही बढ़ती जा रही हैं।
भाजपा और संघ के करीबी एक दक्षिणपंथी विचारक कहते हैं कि बिहार में भाजपा ने नीतीश के साथ सरकार बनाने में देर नहीं की। राजनीति अब बदल रही है। पहले इस प्रकार के मामलों में भाजपा हाथ डालने से बचती थी। ऐसा होना भी चाहिए आखिर पांच साल का इंतजार क्यों किया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार में रहकर ही भाजपा राज्यों में अपनी विकासपरक नीतियों को आगे बढ़ा सकती है और संगठन को मजबूती प्रदान कर सकती है।

तो नतीजे का इंतजार क्यों?

करीब तीन महीने पहले दिल्ली नगर निगम के चुनाव में जीत दर्ज करने के बाद भाजपा को पहली बार लगा कि दिल्ली में केजरीवाल को पटकनी देने का माहौल बन गया है। लेकिन भाजपा हाईकमान के कुछ नेता आरएसएस से मिले फीडबैक के आधार पर विधानसभा चुनाव के नजरिये से अभी केजरीवाल को बहुत कमजोर समझने की भूल नहीं करने की बात कह रहे हैं। भाजपा को युमनापार और मध्य दिल्ली की अपेक्षा दिल्ली देहात से ज्यादा उम्मीद है।
नरेला से लेकर बदरपुर की बाहरी दिल्ली की पट्टी में अभी केजरीवाल का दबदबा है और भाजपा जमीनी तौर पर यहां अपना असर साबित होते देखना चाहती है। पार्टी के रणनीतिकारों का मानना है कि बवाना उपचुनाव इसका फैसला कर देगा। अगर यहां केजरीवाल को शिकस्त मिलती है तो भाजपा दिल्ली विधानसभा के मध्यावधि चुनाव के मिशन की तरफ बढ़ चलेगी। लेकिन अगर केजरीवाल बवाना जीत गये तो इसका सीधा मतलब होगा कि देहात में आम आदमी पार्टी कमजोर नहीं है लिहाजा भाजपा को ‘दिल्ली मिशन’ से पीछे हटना पड़ जाएगा। इसलिए बवाना का उपचुनाव एक सीट का चुनाव नहीं है बल्कि ये दिल्ली पाने या खोने का चुनाव है।

क्या होगा भाजपा का ‘दिल्ली मिशन’

केजरीवाल सरकार की विदाई की रणनीति इस तरीके से बनाई जा रही है कि कहीं से भी यह ना लगे की भाजपा की इसमें कोई भूमिका है। बवाना में अगर आप हार जाती है तो भाजपा का दिल्ली मिशन शुरू हो जाएगा। सूत्रों के अनुसार संसदीय सचिव मामले में 20 विधायकों के अयोग्य ठहराए जाने का चुनाव आयोग का फैसला तभी तक पेंडिग है जब तक चोट करने के लिए लोहा गरम नहीं हो जाता। 20 विधायकों की सदस्यता जाने के बाद केजरीवाल के पास 45 विधायक रह जाएंगे। जाहिर है सरकार चलाने के लिए ये संख्या भी बहुमत के नजरिये से पर्याप्त होगी। ऐसे में आम आदमी पार्टी के भीतर से विद्रोह की शुरूआत होगी और करीब 15 से 20 विधायकों को साधने का काम शुरू होगा ताकि सरकार अल्पमत में आ जाए।
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