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सात राज्यों ने कहा ''फेल ना करो'' की नीति को वापस ले सरकार

सात राज्यों ने लिखित रूप से केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपनी राय भेजी है।

सात राज्यों ने कहा
नई दिल्ली. शिक्षा का अधिकार (आरटीई) कानून 2009 के मुताबिक स्कूलों में पहली से आठवीं कक्षा तक बच्चों को फेल ना करने की नीति को लेकर सात राज्यों ने साफ तौर पर केंद्र से कहा है कि वो इस नीति को वापस लिए जाने के पक्ष में हैं। इसमें हरियाणा, बिहार, राजस्थान, उत्तर-प्रदेश, उत्तराखंड, केरल, पश्चिम-बंगाल ने लिखित रूप से केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय को अपनी राय भेजी है। यह जानकारी केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में दी।
नीति को हटाने के पक्ष में ये राज्यें
गौरतलब है कि इस मामले को लेकर अब तक कुल 22 राज्य केंद्र को अपनी राय बता चुके हैं। इसमें सात राज्य नीति को पूरी तरह से वापस लेने के पक्ष में हैं, तीन राज्य कुछ बदलाव करना चाहते हैं, छह राज्य समीक्षा के पक्ष में हैं और 3 राज्य नीति को लागू रहने देने के पक्ष में हैं, एक राज्य चरणबद्ध ढंग से नीति को हटाने का पक्षधर है। एक राज्य कुछ वर्षों तक नीति पर रोक चाहता है। महाराष्ट्र कुछ बदलावों के साथ नीति को लागू रहने देना चाहता है। बाकी 14 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों से राय प्राप्त नहीं हुई है। इस बाबत हरियाणा की कांग्रेस सरकार में शिक्षा मंत्री रही गीता भुक्कल की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया था। उसमें 2015 में कैब की बैठक में अपनी रिपोर्ट दी थी। इसके बाद मंत्रालय ने राज्यों से लिखित में राय भेजने को कहा है।
राज्यों द्वारा केंद्र को भेजी गई राय
हरियाणा- नीति को वापस लिया जाना चाहिए। क्योंकि इससे तमाम हितधारकों में प्रतिबद्धता के स्तर पर हो रही गिरावट से शिक्षा की गुणवत्ता में गिरावट आई है। नीति के कारण छात्रों और शिक्षकों का रवैया लापरवाहीपूर्ण हो गया है। नीति को सफल बनाने के लिए शिक्षक-छात्र अनुपात अनुकूल होना चाहिए। अनिवार्य उपस्थिति और सतत व्यापक मूल्याकंन (सीसीई) का प्रभावी क्रियान्वयन किया जाना चाहिए। परीक्षाआे, जांच से छात्रों में प्रतिस्पर्धा की भावना आती है तथा उन्हें अध्ययन करने की प्रेरणा मिलती है।
मध्य-प्रदेश- फेल ना करने की नीति की वजह से छात्रों के अकादमिक निष्पादन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इसलिए कक्षा 5 और 8वीं में बोर्ड परीक्षा कराई जाएं।
दिल्ली- नीति में संशोधन करना आवश्यक है। इसके कारण पढ़ाई जा रही कक्षा में अपेक्षित स्तर प्राप्त न करने और पढ़ाए गए विषय को न समझने पर भी छात्रों को अगली कक्षा में भेजा जा रहा है। इससे छात्रों का व्यवहार असंगत और अनुशासनहीन होता जा रहा है। इससे वे पढ़ाई को बीच में भी छोड़ रहे हैं। इस नीति को जूनियर प्राथमिक कक्षा यानि कक्षा 3 तक सीमित किया जाना चाहिए।
गुजरात- नीति की समीक्षा की जानी चाहिए और उसमें जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए।
नीति को लागू रखने के पक्षधर
कर्नाटक- नीति को वर्तमान रूप में जारी रखना चाहिए ताकि बच्चों की शिक्षा में रूचि बने रहे और उन्हें 8वीं कक्षा तक की शिक्षा मिले। सीसीई में सतत और व्यापक सुधार किए जाने चाहिए और इसकी निगरानी की जानी चाहिए। कुछ कक्षाआें के लिए वर्ष के अंत में मूल्याकंन किया जाना चाहिए और कम स्कोर करने वाले छात्रों को विशेष शिक्षण के माध्यम से सुधार में मदद करनी चाहिए।
आंध्र-प्रदेश- नीति को जारी रखना चाहिए, नहीं तो पढ़ाई बीच में छोड़ने की दर बढ़ जाएगी और प्रारंभिक शिक्षा के सर्व-सुलभीकरण के लक्ष्य को पूरा करना मुश्किल होगा। छात्रों को उसी कक्षा में बनाए रखने से वे हत्तोत्साहित होंगे और इससे वे केवल रट करना पढ़ना सीखेंगे। उनमें परीक्षा का डर बैठ जाएगा तथा कदाचार को प्रोत्साहन मिलेगा। कक्षा 3, 5 और 8वीं के छात्रों के स्तरों के मूल्याकंन को सुदृढ़ किया जाना चाहिए।
तेलंगाना- तेलंगाना का कहना है कि नीति बनाए रखने से बच्चों में अनुत्तीर्ण होने, उसी कक्षा में रहने और कलंक के भय से दूर अध्ययन कर सकेंगे।
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