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वोट बैंक के लिए टिफिन तो बाँट रहे हैं पर नहीं बताया कि उसमें खाना कहाँ से आएगा- डॉ महंत

छत्तीसगढ़ काँग्रेस कमेटी के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ चरणदास महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल में मजदूर ही नहीं बल्कि आदिवासी, किसान, महिला, पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग, युवा सभी की स्थिति जर्जर हो चुकी है और रमन सरकार झूठे विकास का दावा कर रही है।

वोट बैंक के लिए टिफिन तो बाँट रहे हैं पर नहीं बताया कि उसमें खाना कहाँ से आएगा- डॉ महंत

छत्तीसगढ़ काँग्रेस कमेटी के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ चरणदास महंत ने कहा कि छत्तीसगढ़ में पिछले 15 साल में मजदूर ही नहीं बल्कि आदिवासी, किसान, महिला, पुरुष, बच्चे, बुजुर्ग, युवा सभी की स्थिति जर्जर हो चुकी है और रमन सरकार झूठे विकास का दावा कर रही है। विकास जरूर हुआ है पर केवल भारतीय जनता पार्टी के लोगों का।

लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ की जनता भाजपा को उनके झूठे विकास की परिभाषा जरूर बताएगी। उन्होंने सरकार की टिफ़िन बाँटने की योजना पर कडा प्रहार करते हुए कहा कि डब्बा तो दे दिया है पर उसमे खाना कैसे आएगा ये नहीं बताया जा रहा है, सरकार सिर्फ वोट बैंक की राजनीति कर रही है.

छत्तीसगढ़ काँग्रेस कमेटी के चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ चरणदास महंत ने छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार को आड़े हाथों लेते हुए मीडिया रिपोर्टों के हवाले से कुछ आंकड़ों का हवाला दिया है।
डॉ महंत ने बताया कि छत्तीसगढ़ में मनरेगा की स्थिति काफी दयनीय है। 2014-15 में मनरेगा का खर्च 220 करोड़ से घटकर जहां 166 करोड़ हो गया वहीं एक साल में 100 दिन के रोज़गार का औसत भी घटकर 40 दिन रह गया है। यही कारण है कि ग्रामीण रोज़गार मंत्रालय के संयुक्त सचिव ने छत्तीसगढ़ सरकार को भेजे पत्र में न सिर्फ गहरी नाराज़गी जताई है बल्कि काम में सुधार करने कहा है।
संयुक्त सचिव ने 13 बिंदुओं के पत्र में रेखांकित किए थे और सिलसिलेवार तरीके से राज्य को यह बताया है कि कहां-कहां राज्य पिछड़ा हुआ है -
छत्तीसगढ़ में कार्य दिवस यानि रोज़गार पैदा करने का औसत महज 68 प्रतिशत है जबकि काम पूरा करने का औसत केवल 3 प्रतिशत है।
राज्य में मज़दूरों को समय पर मज़दूरी देने का औसत भी महज 14 प्रतिशत है जबकि 86 प्रतिशत लोगों को मज़दूरी 15 दिन या उससे भी देर से मिलती है।
मोदी की सरकार के गठन के बाद मनरेगा पर 40 हजार करोड़ रुपए से अधिक खर्च हुआ फिर भी कार्य दिवसों की संख्या में भारी कमी आ गई।
2007-08 में योजना की शुरुआत के बाद कार्यदिवसों की मांग महज 143 करोड़ थी, इसके बाद इसमें लगातार बढ़ोत्तरी होती रही। 2011-12 में कुल कार्य दिवसों की संख्या का अनुमान 200 करोड़ दिन लगाया था जबकि मांग 219 करोड़ रही। इस मांग को देखते हुए 2012-13 में सरकार ने 278 करोड़ कार्य दिवस का अनुमान लगाया था गया जबकि वास्तविक मांग 230 करोड़ की रही। 2013-14 में यह मांग 220 करोड़ थी लेकिन 2014-15 यह संख्या घटकर सीधे 166 करोड़ हो गई।
यही हाल एक मज़दूर का सालाना काम करने के दिनों की संख्या में भी हुआ है। नरेगा कानून में एक परिवार को साल में 100 दिन का और सूखा या बाढ़ प्रभावित इलाकों में 150 दिनों का रोज़गार देने का प्रावधान है। लेकिन जब से यह योजना लागू हुई है तभी से ही यह औसत 46 दिन प्रतिवर्ष से अधिक नहीं गया। 2014-15 में तो यह औसत भी घटकर 40 दिन पर आ गया।
इन स्थितियों को देखने के बाद ही सुमित्रा महाजन की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में मनरेगा में अनेक ख़ामियों को उजागर किया था और 28 ऐसी सिफ़ारिशें की थीं जिनसे इस योजना में सुधार हो सके। केंद्र के निर्देशों के बाद अब इसमें सुधार की गुंजाईश है। क्योंकि जब कांग्रेस ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि वह संप्रग सरकार की मनरेगा समेत कुछ फ्लैगशिप योजनाओं को बंद करने जा रही है। इस पर स्वयं मोदी ने कांग्रेस के आरोपों का जवाब देते हुए कहा था कि मनरेगा कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के खंडहर के तौर पर जीवित रखा जाएगा।
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