Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

ग्राउंड रिपोर्ट: नक्सलियों के हार्टलैंड में जवानों की धमक, ऐसे करते हैं नक्सलियों का सफाया Watch Video

वो इलाका जहां बंदूकें दहाड़ती हैं, बॉम्ब्स दिवालियों में पटाखों की तरह फूटते हैं.. बस्तर। यहां नक्सलवाद सांसें ले रहा है। यहां जवान अम्न और खुशहाली लाना चाहते हैं और हम जा रहे हैं आज जवानों के साथ नक्सलियों के हार्टलैंड में.. आपको वो सच दिखाने जो आप जानते ज़रूर हैं लेकिन ये सच देखना भी आपके लिए उतना ही ज़रूरी भी है...

वो इलाका जहां बंदूकें दहाड़ती हैं, बॉम्ब्स दिवालियों में पटाखों की तरह फूटते हैं.. बस्तर। यहां नक्सलवाद सांसें ले रहा है। यहां जवान अम्न और खुशहाली लाना चाहते हैं और हम जा रहे हैं आज जवानों के साथ नक्सलियों के हार्टलैंड में.. आपको वो सच दिखाने जो आप जानते ज़रूर हैं लेकिन ये सच देखना भी आपके लिए उतना ही ज़रूरी भी है...

ये जवान हैं कोबरा और CRPF के और वक्त है जून की गर्मी की सुबह का। इन्हें इस समय एरिया डोमिनेशन और ऑपरेशन के लिए ब्रीफ कर रहे हैं कोबरा 204 बटालियन के असिस्टेंट कमांडेंट कामेश्वर साहू। जवान तैयार हैं। ऑफिसर का हर लफ्ज़ अपने ज़ेहन में ऐसे सेट हो रहा है जैसे ज़िन्दगी का आखरी मकसद यही हो। जवान अब पूरी तरह तैयार हैं और इस तैयारी से जुड़ी आईएनएच रिपोर्टर यूकेश चंद्राकर की ग्राउंड रिपोर्ट।

अब जवानों के कदम तैयार हैं, हम भी जोश में ही हैं । सेवा और निष्ठा के दरवाजे से हथियार उठाए, सीना ताने एक लाइन में कोबरा और दूसरे लाइन में सी आर पी ऍफ़ के जवान अब खूंखार नक्सलियों के इलाके में ये दस्तक देंगे। हम भी जवानों के साथ ही चल रहे हैं। थोड़ी दूर पहुंचे ही थे कि जवानों ने हमें रुकने को कहा.. क्यों रुकने कहा गया बता रहे हैं इलाके का जायज़ा लेते हुए यूकेश।

खतरा है लेकिन हमें हमारे जवानों पर भी पूरा यकीन है बस हमें ये नहीं मालूम है कि बंदूक से निकली बुलेट पर आखिर नाम लिखा है तो किसका? हो सकता है हमारा या हो सकता है हमें बचा रहे जवानों का.. लेकिन ये खबर इसलिए जरूरी है क्योंकि ये एक मैसेज है हम सभी के लिये ताकि हम यकीं कर सकें ये जवान हमारे दुश्मन नहीं.. दोस्त हैं ।

जंगली इलाका, दोपहर की उमस भरी गर्मी और ये खतरनाक सफर तय करके जवानों का दल कैम्प से दूर पहुंचा। यहां जवानों ने दोबारा खतरा महसूस किया। इस दौरान हमारे सहयोगी यूकेश कोबरा के असिस्टेंट कमांडेंट कामेश्वर से बात कर रहे थे लेकिन तब जो कुछ हुआ.. वो आप खुद देख लीजिए..

रात हो गयी और खतरा बढ़ता चला गया। खतरे को देखते हुए प्लान चेंज किया गया और जवानों के साथ हम कैम्प वापस लौट आए लेकिन जवान जब बीहड़ों में जाते हैं तब वे आदिवासी ग्रामीणों की मदद किये बिना लौटते नहीं.. चाहे ग्रामीण नक्सल आतंक से घबराकर मना कर दें मगर जवान जबरन घायल आदिवासी को चारपाई पर उठाकर कैम्प लाते हैं यहां उसका प्राइमरी ट्रीटमेन्ट करते हैं और स्थिति ज़्यादा गंभीर दिखे तो एम्बुलेंश बुलाकर हॉस्पिटल भी पहुंचाते हैं। चलते चलते ये सबूत देखिये..

Next Story
Share it
Top