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छत्तीसगढ़/ 20 साल बाद भी सरकारी स्कूलों के 30 लाख बच्चों को टाट-पट्टी तक नसीब नहीं

गर्मी में तपते, सर्दी में ठिठुरते और बारिश में चिप-चिपाती जमीन पर बैठकर प्रदेश के करीब 30 लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बिलासपुर जिले की बात करें तो 1700 स्कूलों के डेढ़ लाख से अधिक बच्चों को पढ़ाई के लिए टेबल-कुर्सी तक मयस्सर नहीं है।

छत्तीसगढ़/ 20 साल बाद भी सरकारी स्कूलों के 30 लाख बच्चों को टाट-पट्टी तक नसीब नहीं

गर्मी में तपते, सर्दी में ठिठुरते और बारिश में चिप-चिपाती जमीन पर बैठकर प्रदेश के करीब 30 लाख बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ाई कर रहे हैं। बिलासपुर जिले की बात करें तो 1700 स्कूलों के डेढ़ लाख से अधिक बच्चों को पढ़ाई के लिए टेबल-कुर्सी तक मयस्सर नहीं है।

इन बच्चों की हालत यह है कि उनका परिवार निजी स्कूलों की महंगी फीस नहीं दे सकता और सरकारी स्कूलों में सरकार सुविधाएं नहीं दे पा रही। स्कूलों में कमरों का अभाव भी है। सरकारी स्कूलों में बरामदों और पेड़ों के नीचे पढ़ाई करनी पड़ रही है। बारिश में तो कई स्कूलों में अघोषित छुट्टी कर दी जाती है।

राज्य बनने के 18 साल बाद भी प्राइमरी स्कूल के नौनिहाल बच्चे जमीन पर बैठक पढ़ाई करते हुए अपना भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं। इन स्कूलों में बच्चों को बुनियादी सुविधाएं तक नहीं मिल पा रही है। प्रदेश की बात करें तो करीब 20 हजार प्राइमरी स्कूलों के 30 लाख बच्चे अभी भी टेबल कुर्सी पर बैठने को तरस रहे हैं।
पहली से पांचवीं तक के छोटी कक्षाअों के इन बच्चों पर ध्यान सरकार का भी नहीं है। बड़ी कक्षाअों के लिए मंहगे फर्नीचर तो खरीदे जा रहे हैं, लेकिन छोटे बच्चों को स्कूलों में बेहतर माहौल अैार सुविधाअों की तरफ अभी भी ध्यान नहीं है।
बिलासपुर की बात करें तो जिले में कुल 1718 स्कूल हैं जहां एक लाख 54 हजार बच्चे प्राइमरी स्कूल में अध्ययनरत हैं। इनमें से किसी के पास बैठने के लिए फर्नीचर नहीं हैं।
कमरे से लेकर मैदान तक सिर्फ गंदगी
सरकारी स्कूलों में स्कूल भवन से लेकर मैदान तक गंदगी पसरी हुई है। ऐसे में बच्चों और शिक्षकों सभी को परेशानियां हो रही हैं। मैदान में तो गंदा पानी भरा रहता है। सफाई के अभाव में जगह-जगह कचरा फैला हुआ है। ऐसे गंदगी भरे माहौल में बच्चे बैठने को मजबूर हैं।
ऐसे में संक्रामक बीमारियां ज्यादा फैलती है और छोटे बच्चों को इसका खतरा भी ज्यादा होता है। यहां तक कि मध्यान्ह भोजन तक के लिए बच्चों को साफ जगह नहीं मिलती। बारिश के मौसम में इन स्कूलों की हालात और भी खराब हो जाती है।
प्राइमरी स्कूलों के लिए काेई फंड ही नहीं
अधिकारियों के अनुसार शिक्षा विभाग में प्राइमरी स्कूलों के लिए अलग से कोई फंड ही नहीं है। इसके साथ ही इन छोटे बच्चों के लिए फर्नीचर का भी कोई प्रावधान सरकार ने अभी तक नहीं किया है। हालांकि टाट-पट्टी सप्लाई पर सरकार पूरा ध्यान देती है अौर सत्र की शुरूआत में ही इसे स्कूलों के पास भेज दिया जाता है।
दरअसल सर्व शिक्षा अभियान तहत केन्द्र सरकार से जब राशि मिलती थी तो स्कूलों काे शाला अनुदान के तहत कुछ आबंटन मिलता था लेकिन वह भी अब बंद हो गया है।

केस-1

तिफरा स्कूल तो बदहाली का नमूना
शहर से लगे तिफरा मिडिल स्कूल में बच्चे पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई कर रहे हैं। यहीं नहीं क्लासरूम छोटा अैार बच्चों की संख्या अधिक मैदान में पढ़ाई होती है। कमरे अैार उसकी छत इतने जर्जर हैं कि कभी भी गिर सकते हैं। गंदगी अैार बदबू इतनी कि हर 10 मिनट में क्लास से बाहर आना पड़ता है।
1000 के करीब दर्ज संख्या वाले इस स्कूल में बच्चे तमाम अव्यवस्थाअों के बीच जमीन पर अपना भविष्य गढ़ने को मजबूर हैं। इन बच्चों को क्लासरूम में बैठने तक की जगह नहीं है। छोटे से कमरे में मुश्किल से 30 बच्चे बैठ सकते हैं। उसमें भी सटकर बैठना पड़ता है। बच्चों को अपना बैग गोद में रखकर पढ़ाई करनी पड़ती है।
क्लास रूम में इतनी भी जगह नहीं कि शिक्षक के लिए एक कुर्सी तक रखी जा सके। दरवाजे तक छात्र बैठते हैं।
केस-2
जर्जर कमरा, अंधेरे में 500 बच्चों की पढ़ाई
चिंगराजपारा शासकीय प्राथमिक स्कूल जिले का शायद एकमात्र स्कूल होगा जो कि दो पालियों में लगता होगा, ऐसा इसलिए क्योंकि यहां की दर्ज संख्या 500 के करीब है अैार कमरे सिर्फ 5 हैं। उसमें भी दो कमरे काफी जर्जर हैं, इसलिए वहां बच्चों को नहीं बिठाया जाता। पहली से पांचवी तक की कक्षा को 10 सेक्शन में बांटा गया है।
इसमें से पहली से दूसरी सुबह की पाली अैार तीसरी से पांचवी तक की कक्षा दोपहर की पाली में लगती है। स्कूल में असामाजिक तत्वों के आंतक से बच्चों की पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वे स्कूल परिसर में घुसकर बच्चों व शिक्षकों को तंग करते हैं। इससे बच्चों व शिक्षकों में दहशत का माहौल है। स्कूल में शौचालय, पानी, बिजली, पंखे तक की सुविधा नहीं हैं।
अलग से कोई फंड नहीं है
शिक्षा विभाग में प्राइमरी स्कूलों के लिए अलग से कोई फंड ही नहीं है। इसके साथ ही इन छोटे बच्चों के लिए फर्नीचर का भी कोई प्रावधान सरकार ने अभी तक नहीं किया है। हालांकि टाट-पट्टी सप्लाई पर सरकार पूरा ध्यान देती है।
- आरएन हीराधर, जिला शिक्षा अधिकारी
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