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Corona : संकट में छत्तीसगढ़ी सिनेमा, हर माथे पर चिंता की लकीरें

प्रोड्यूसर्स करोड़ों रुपए दांव पर लगाकर स्तब्ध हुए, कलाकारों को रोजगार छीनने की फिक्र, पढ़िए पूरी खबर-

Corona : संकट में छत्तीसगढ़ी सिनेमा, हर माथे पर चिंता की लकीरें
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रायपुर। कोरोना के कोहराम से छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री भी अछूती नहीं रह सकती। साल 2020 में लगभग 3 करोड़ रूपए का दांव छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री ने लगा तो दिया है, लेकिन कोरोना के कारण लॉकडाउन के चलते इन करोड़ों रुपयों के डूबने की आशंका है। बैनर, पोस्टर, पब्लिसिटी, वगैरह तामझाम की झांकी दिखाकर कमाई करा देने का दावा करने वाले फिल्मी पंडितों का ब्रेन भी काम करना बंद कर दिया है।

प्रोड्यूसर्स ने फिल्में तो बना लीं हैं, लेकिन उन्हें रिलीज करने के लिए बाजार को ध्यान में रखते हुए जैसी प्लानिंग बनाई थी, सारी धरी की धरी रह गई हैं। लॉकडाउन खत्म होने के बाद भी फिल्मों के बीच गलाकाट प्रतिस्पर्धा होंगी। छत्तीसगढ़ी फिल्में ना केवल आपस में टकराएंगीं, बल्कि हिंदी फिल्में भी क्षेत्रीय फिल्मों को टक्कर देंगी, जिसका असर छत्तीसगढ़ी सिनेमा पर भी पड़ेगा।

बॉलीवुड की जिन फिल्मों की रिलीजिंग डेट टल गई है, वे भी आने वाले साल में ही रीलिज होंगी। ऐसे में छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री एक बार फिर बेहद आर्थिक संकट के दौर से गुजर सकती है।

कोरोना के कहर ने कई प्रोड्यूसर्स के कदम रोक दिए हैं। जो फ्लोर पर थे, उन्हें वहीं ठिठकना पड़ा है, आगे शूटिंग बढ़ाने जैसी कोई स्थिति नहीं दिख रही है। जो शूटिंग पर जाने वाले थे, उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा कि क्या करें। ऐसे में जानकारों का अनुमान है कि लॉकडाउन खत्म भी हुआ तो बमुश्किल 10 फिल्में ही फ्लोर पर नजर आएंगी।



फिलहाल, नई फिल्में फ्लोर पर आने से रहीं, ऐसे में जो अधूरी बनीं हैं, या बनकर तैयार हैं, वही फिल्में सिनेमाघरों तक पहुंचेंगी। अनुमान है कि हीरो मन कुरैशी के खाते में सबसे ज्यादा फिल्में होंगी। लव लेटर, मिस्टर मजनू, इश्क म रिस्क हे और एक लव स्टोरी समेत उनके पास चार फिल्में हैं। इन फिल्मों के रीलिज होने की संभावना है।



इसी तरह हीरोइन अनीकृति चौहान के नाम ऐसा रिकॉर्ड होगा, कि लॉकडाउन के बाद बतौर नायिका उनके खाते में दूसरी नायिकाओं की तुलना में ज्यादा फिल्में होंगीं। डायरेक्टर्स के संदर्भ में उत्तम तिवारी होंगे, जो बाकी डायरेक्टर्स की तुलना में ज्यादा फिल्मों को डायरेक्ट करेंगे।

जिन्होंने मुहुर्त ही टाल दिया, वे बड़े नुकसान से 'बाल-बाल बचने' वाली फीलिंग के साथ चुपचाप अपने घरों में रहकर अब सही वक्त का इंतजार कर रहे हैं। लॉकडाउन के दौरान बनीं स्थिति के बाद नए प्रोड्यूसर्स दिलचस्पी छत्तीसगढ़ी सिनेमा जगत की तरफ नहीं दिख रही है, जो पुराने हैं वे तो अपनी लग चुकी लागत को ही जैसे-तैसे निकाल लेने के गुणाभाग में मास्क लगाकर चिंतापूर्ण चहल-कदमी कर रहे हैं। हालात ऐसे हो गए हैं कि अब हड़बड़ी तो किसी को नहीं है, पर चिंता की लकीरें छत्तीसगढ़ी सिनेमा से जुड़े हरेक के माथे पर दिख रही है।

जो फिल्में रीलिज होंगी, उनकी कमाई की आखिर संभावना कितनी है? इस पर छत्तीसगढ़ी सिनेमा जगत के जानकारों का मानना है कि कोरोना के डर के कारण दर्शक सिनेमाघरों तक शायद कम आएं। उसके पहले यह देखना होगा कि थिएटर्स खूल कब रहे हैं, फिलहाल तो लॉकडाउन के कारण बंद ही हैं। अभी सबसे पहले तो उनके ओपन होने का इंतजार करना होगा।

छत्तीसगढ़ी सिनेमा में कई फिल्में फ्लोर पर अटकी हुई हैं, जिनमें सेल्फी बेबो, पटी तो पटी नई तो…, इश्क म रिस्क हे… आदि हैं।

इसी प्रकार अगर रीलिज के लिए तैयार फिल्मों की फेहरिश्त देखें तो जय भोले मया म डोल, अतरंगी, लव लेटर, एक और लव स्टोरी, सुन सुन मया के धुन, संगी जनम जनम के, मार डारे मया मं, दीया आऊ बाती, रंग रंगीली, अंगार, प्रेम के रंग, मिस्टर चंदनिया, तु जान है रे पगली, बारात ले जा, डेढ़ होशियार, मिस्टर मजनू, मोर जोड़ीदार 2, तीन ठन भोकवा 2, मोर यार सुपर स्टार जैसी कई फिल्में हैं।

आने वाली छत्तीसगढ़ी फिल्मों को बॉलीवुड के बड़े स्टार अक्षय कुमार, रणवीर सिंह, वरूण धवन, सलमान खान, कार्तिक आर्यन, रणबीर कपूर आदि की फिल्मों से कॉम्पीटिशन करना पड़ेगा। यानी कुल मिलाकर, हाल फिलहाल में छत्तीसगढ़ी सिनेमा की आर्थिक सेहत सुधरने वाली नहीं है।



अपनी दूसरी फिल्म 'तू मेरा हीरो' की तमाम तैयारियां पूरी करने के बाद कास्टिंग में भिंड़े डायरेक्टर अनुपम वर्मा को भी लॉकडाउन ने रोक दिया है। वे कहते हैं, कि कोरोना वैश्विक आपदा के चलते छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री को बहुत नुकसान उठाना पड़ा है। कई फिल्मों की चलती शूटिंग रुक गई है। बहुत सारे टेक्नीशियंस, स्पॉट बॉय, आर्टिस्ट, सारे के सारे अचानक काम बंद कर घर बैठ गए। इस घटना के चलते निश्चित तौर पर हमारी फिल्मों को प्रभाव पड़ता दिख रहा है।



छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जाने-माने डायरेक्टर सतीश जैन कहते हैं कि कोविड-19 के चलते जून के बाद हिंदी फिल्मों का फ्लो रहेगा। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को थिएटर पाने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। जून के बाद स्थिति थोड़ी ठीक हो सकती है, लेकिन यह भी सिर्फ संभावना है, निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता।



छत्तीसगढ़ी फिल्मों के नामचीन अभिनेता करण खान कहते हैं कि उनकी नई फिल्म तू मेरा हीरो की शूटिंग स्थगित हो गई है। अगली तारीख कब मिलेगी, इस संबंध में अभी कोई पता नहीं है।

कुल जमा यह कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा के सामने अपने आर्थिक भविष्य को लेकर दृश्य अंधकारमय दिख रहा है। बावजूद स्थिति पर नियंत्रण के प्रयास किए जा रहे हैं।

छत्तीसगढ़ी फिल्मों के दो सफल डिस्ट्रीब्यूटर माने जाने वाले तरूण सोनी और लकी रंगशाही भी लगभग इन बातों से इत्तफाक रखते हैं।



लकी रंगशाही कहते हैं कि कोरोना के कारण छत्तीसगढ़ी सिनेमा बुरी तरह प्रभावित होगी। आने वाले दिनों में मेकर्स को अच्छे कंटेंट पर काम तो करना ही होगा, इसके अलावा फिल्मों की प्रॉपर मार्केटिंग और पब्लिसिटी पर भी फोकस करना होगा, तब कहीं जाकर स्थिति थोड़ी बहुत सुधरेगी।



छत्तीसगढ़ी सिनेमा जगत में बेहद सक्रिय और जानकार माने जाने वाले डिस्ट्रीब्यूटर तरूण सोनी ने बड़ी सटीक राय दी है। उनका कहना है कि बाकी औद्योगिक सेक्टर की तरह निश्चित रूप से छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री को भी लॉकडाउन ने प्रभावित किया है। तमाम फिल्ममेकर्स जो रुपए लगा चुके हैं, वे चिंतित हैं कि उनकी फिल्में कब मार्केट में आएगी। प्रोड्यूसर्स की हालत ये है कि उन्हें लागत तक लौट जाए तो बड़ी बात है। वे चीन का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि वहां कोरोना संक्रमण की स्थिति नियंत्रित होने के बाद थिएटर्स खोल दिए गए हैं, लेकिन ऑडियंश में कोरोना का खौफ इस कदर हावी है कि वे थिएटर आकर सिनेमा नहीं देख रहे हैं। तरूण सोनी कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में तो अभी तक यही नहीं पता कि बंद पड़े मल्टीप्लेक्स और सिंगल स्क्रिन थिएटर कब चालू होंगे। अगर चालू हो भी गए, तो ऑडियंश अपनी लाइफ का रिस्क लेकर फिल्म देखने के लिए मल्टीप्लेक्स और थिएटर क्यों पहुंचेंगे? चीन, इटली, स्पेन आदि के हालात सभी के सामने हैं।



छत्तीसगढ़ी फिल्म प्रोड्यूसर एसोसिएशन के उपाध्यक्ष और आलाप आर्टिस्ट एसोसिएशन के महासचिव अनुमोद राजवैद्य ने इस संबंध में ऐसी बातें कही है, जो पूरी सिनेमा इंडस्ट्री को जायज रूप से चिंतित कर सकती है। अनुमोद कहते हैं, छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री पहले भी स्थापित नहीं थी, वह संघर्षशील थी। अब भी यह इंडस्ट्री आर्थिक रूप से स्थापित होने के लिए संघर्ष ही कर रही थी। तमाम ऐसी फिल्में बनीं, जो कमाई नहीं कर पाईं, दर्शकों ने उन्हें पसंद भी नहीं किया। इसके बावजूद, कम ही सही, लेकिन ऐसी फिल्में आईं, जिन्होंने दर्शकों को निराशा से उबार लिया। मसलन, हाल ही में सतीश जैन कृत "हंस झन पगली फंस जबे" आई थी। उस फिल्म ने तो कमाई के सारे मापदंडों को पार करते हुए अनुमान से अधिक रूपए बटोर लिए थे।

यानी, तमाम विकट परिस्थितियों के बावजूद "हंस झन पगली फंस जबे" ने छत्तीसगढ़ी सिनेमा को उम्मीद दी थी, लेकिन कोरोना के चलते लॉकडाउन ने उस उम्मीद पर पानी फेर दिया।

अनुमोद राजवैद्य कहते हैं कि लॉकडाउन एकाएक समाप्त नहीं होगा। बहुत धीरे से होगा और कई चरणों में होगा। मल्टीप्लेक्सेस और थिएटर्स के ओपन होने की बारी बहुत बाद में आएगी, क्योंकि अभी इतनी राहत भरी स्थिति नहीं है। अगर एक-दो हफ्ते में लॉकडाउन समाप्त होता तो अनुमान लगा लेते कि छह माह या साल भर में इंडस्ट्री फिर खड़ी तो नहीं होगी, हां कम से कम लुढ़क-लुढ़ककर चलने की स्थिति में आ जाएगी।

लेकिन…फिलहाल तो लॉकडाउन समाप्त होता नहीं दिख रहा है। लंबे लॉकडाउन को झेलने के बाद छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री में इतनी हिम्मत नहीं रहेगी कि वह जहां थी, वहां से चलना शुरू करेगी, बल्कि लॉकडाउन ने इस पर ऐसा प्रभाव डाला है कि उसे जीरो से शुरूआत करनी पड़ेगी।

अनुमोद राजवैद्य कहते हैं कि सिनेमा एक टीम वर्क है। टीम में काम करने वाले तमाम लोगों के आगे अभी आजीविका की संकट आने वाला है। ऐसे में वे कम पैसों में फिल्में करने की बजाय ज्यादा मेहनत करके खुद को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में ज्यादा पैसे के लिए काम करेंगे। कुल मिलाकर, छत्तीसगढ़ी सिनेमा इंडस्ट्री इस लॉकडाउन के कारण इस बार तकरीबन डाउन होने की ही कगार पर आ गई है। लेकिन, एक और बात पर भी ध्यान देने की जरूरत है कि छत्तीसगढ़ी सिनेमा शुरू से ही चामत्कारिक रूप से खड़ी होती रही है। अपने दम पर खुद को साबित किया है। इस बार भी कोरोना के संकट से उबरकर छत्तीसगढ़ी सिनेमा जरूर खड़ी होगी, ऐसी उम्मीद के साथ कलाकारों को अपना हौसला कायम रखना होगा। फिलहाल, कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई में लॉकडाउन का पालन करते हुए सभी कलाकारों को अपने साथ साथ सभी की जान की परवाह करनी होगी। जान है, तो जहान है। संकट के बादल भी छंटेंगे और खुशहाली के दिन भी आएंगे।

विनोद डोंगरे



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