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छत्तीसगढ़ : विलुप्त होने के कगार पर उरांव जनजाति

छत्तीसगढ़ अंचल में ओरांव जनजातियां मुख्यत: सरगुजा, कोरिया, जशपुर और निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करती हैं। इन जातियों के उत्पत्ति के संबंध में अलग अलग मान्यताएं प्रचलित हैं।

छत्तीसगढ़ : विलुप्त होने के कगार पर उरांव जनजाति

छत्तीसगढ़ अंचल में ओरांव जनजातियां मुख्यत: सरगुजा, कोरिया, जशपुर और निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करती हैं। इन जातियों के उत्पत्ति के संबंध में अलग अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। आज भी यह जनजातियां अभावों और अंधविश्वासों के बीच अपना जीवनयापन करते नजर आते हैं।

छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले अंतर्गत ओरांव जनजातियां निवास करती हैं जो द्रविडि़यन मूल के हैैं। इस जाति के लोग जिस भाषा का प्रयोग करते हैं द्रविड़ जनों जैसी है।

अपने पड़ोसियों की बोली को भी इन्होंने अपनाई है। परिणामस्वरूप इनकी भाषा में उडि़या, बंगाली तथा हिन्दी का प्रभाव दृष्टिगत होता है। इस जनजाति को पूर्वी द्रविड़ या आस्ट्रेलायड श्रेणी का माना जाता है।

मान्यताएं

ओरांव शब्द की उत्पत्ति के संबंध में अनेक मान्यताएं हैं। एक मान्यता के अनुसार इन्हें ओड़ वंश के कीर्तवीर्य के रूप में जाना जाता है वहीं दूसरी ओर वैदिक क्षत्रिय वर्ण से इनकी उत्पत्ति मानी जाती है। इसी तरह शोधकर्ता बल्देव उपाध्याय ने कहा कि-पुराण विमर्श में उल्लेख है कि सूर्य वंश मनु के दत्त पुत्रों में से करूष ने बिहार के दक्षिण पश्चिम तथा रांची राज्य के पूर्व सोननदी के तट पर एक राज्य स्थापित किया। कालांतर में इस राज्य का नाम करूष पड़ा तथा करूष पुत्रों ने कुदरव नाम से प्रसिदिध प्राप्त की। आगे कहते हैं कि यहउंराव कुरूख के वंशज थे, इनकी प्रमाणिकता में उन्होंने स्पष्ट किया है कि इनकी बोली उंराव की बोली है।

रहन-सहन

यह जनजातियां मुख्यत: सरगुजा रियासत, कोरिया रियासत व जशपुर और निकटवर्ती क्षेत्रों में निवास करते हैं। कोरिया जिले के मनेन्द्रगढ़ में हसिया नदी के किनारे लगभग 200 ओरावों का घर है। इस जाति के लोग साधारणत: हष्ट पुष्ट होने के साथ ही मेहनतकश होते हैं। अधिकांश लोग कृषि कार्यो से अपनी जीविका चलाते हैं और मजदूरी का काम भी करते हैं। मजदूरी के लिए ठेका से काम करना ज्यादा पसंद करते हैं। महिलाएं भी जंगलों से लकड़ी लाने का काम करती हैं। इन्होंने अधिकतर इसाई धर्म को अपना लिया है फिर भी हिन्दूओं के समस्त त्योहारों को मनाते हैं। वैसे इन लोग मूल रूप से प्रकृति के पुजारी होते हैं जिसमें सूर्य, बादल और वृक्षों में सरना देव की पूजा करते हैं। खेती किसानी के कार्यो में महिलाओं को हल छूने की मनाही होती है। कहा जाता है कि स्त्रियां हल छूने पर अकाल पड़ने की संभावना रहती है। लेकिन यदि स्त्रियां खेत में बीज डालती हैं तो उसे शुभ माना जाता है।

जीवन यापन

अपने जीवन यापन के लिए वनोपज पर आधारित रहते हैं। विशेष रूप से महुआ तथा इसकी डोरी सरई बीज, चिरौंजी, गुल्ली आदि संकलित करने का काम करते हैं। इसके अतिरिक्त मछली व केकड़ा इनके प्रिय भोजन हैं। पूरा परिवार औरतें और बच्चे सहित नदी और नालों में मछली पकड़ते हैं। दैनिक खानपान में विशेषकर गोंदली, कोदो भात और पेज पसंद करते हैं।

विवाह प्रथा

इनके समाज में तीन तरह का विवाह होता है। एक विवाह ढुकु प्रथा के अंतर्गत वधू के लिए मूल्य में चावल, पशु, वस्त्र, नगद व शराब भेट की जाती है। इसी तरह दूसरा बंदवा विवाह मेंं लड़के और लड़कियों के आपसी सहमति से विवाह किया जाता है जिसमें एक जोड़ी कपड़े में भी लड़की शादी के लिए राजी हो जाती है। ढुकु प्रथा में लड़की अपने पसंद के लड़के के घर जाकर रहने लगती है बाद में समाज के लोगों द्वारा सामूहिक भोज देकर राजी कर विवाह को वैध मान लेते हैं।

धार्मिक अनुष्ठान

यह जनजातियां प्राय: अंधविश्वासी होते हैं। इनके धार्मिक अनुष्ठानों का काम बैगा करते हैं। यह जादू टोना में भी पूरा विश्वास करते हैं। बीमार होने पर इलाज की जगह झाड़ फूंक पर विश्वास करते हैं। धार्मिक क्रियाकलापों के अवसरों पर लोग मूर्गे की बलि भी देते हैं।

दिनचर्या

इस समाज की महिलाएं शरीर के विभिन्न भागों में कलात्मक गुदना गुदवाती हैं। इनका प्रिय खेल शिकार होता है जिसके लिए तीर-धनुष, भाला, गुलेल और कुल्हाड़ी का उपयोग करते हैं। इसके साथ ही लोहे की बरछी का भी उपयोग करते हैं। पक्षियों को शिकार के लिए मिट्टी का गोल बाटी बनाकर गुलेल से मारते हैं। इनमें इनका निशाना भी बहुत सटीक होता है।

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