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छत्तीसगढ़ समाचार: 8 साल बाद राजीव दीक्षित की मौत से उठेगा पर्दा, PMO से दुर्ग पुलिस को मिला ​नए सिरे से जांच का आदेश

स्वदेशी उत्पादों के प्रणेता रहे भारत स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव दीक्षित की मौत के रहस्य पर से अब बहुत जल्दी पर्दा उठ सकता। भिलाई में 8 साल पहले हुई मौत की जांच के नए सिरे से जांच के प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश जारी हुए हैं।

छत्तीसगढ़ समाचार: 8 साल बाद राजीव दीक्षित की मौत से उठेगा पर्दा, PMO से दुर्ग पुलिस को मिला ​नए सिरे से जांच का आदेश

आनंद ओझा, दुर्ग। स्वदेशी उत्पादों के प्रणेता रहे भारत स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राजीव दीक्षित की मौत के रहस्य पर से अब बहुत जल्दी पर्दा उठ सकता। भिलाई में 8 साल पहले हुई मौत की जांच के नए सिरे से जांच के प्रधानमंत्री कार्यालय से आदेश जारी हुए हैं।

उस वक्त दीक्षित की मौत को हृदयघात की वजह से होना बताया गया था। भारत स्वाभिमान आंदोलन के राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे राजीव दीक्षित की 29-30 नवंबर 2010 की दरम्यानी रात को भिलाई के बीएसआर अपोलो अस्पताल में मौत हो गई थी।

बता दें श्री दीक्षित स्वदेशी उत्पादों के प्रणेता थे और देश भर में घूम-घूम कर इस विषय पर अपना व्याख्यान देते थे। विदेशी कम्पनियों के उत्पादों के उपयोग का विरोध करने की बजह से उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान कायम हुई थी।

बावजूद इसके भिलाई में प्रवास के दौरान हुई उनकी अचानक मौत पर तत्कालीन जिला प्रशासन ने उनका पोस्टमार्टम कराए बिना ही अंतिम संस्कार हेतु गृहनगर भेज दिया था। जाँच की दिशा में इसे गंभीर चूक मानी जा रही है।

अब जब प्रधानमंत्री कार्यालय से दुर्ग पुलिस को मामले की नये सिरे से जाँच का आदेश मिल गया है तो मौत के रहस्य से किसी न किसी नये खुलासे की संभावना उभर आयी है।

गौरतलब है कि, राजीव दीक्षित का व्याख्यान 29 नवंबर 2010 को अविभाजित दुर्ग जिले के बेमेतरा तससील प्रांगण में सुबह 10 से दोपहर 1 बजे तक आयोजित था। यहां पर व्याख्यान खत्म करने के बाद वे भारत स्वाभिमान आंदोलन के दुर्ग निवासी पदाधिकारी दया सागर के साथ भिलाई के लिए कार से रवाना हुये।

कार कन्हैया नामक ड्रायवर चला रहा था। रास्ते में राजीव दीक्षित को पसीने के साथ बेचैनी महसूस हुई। एलोपैथी चिकित्सा के धुर विरोधी रहे दीक्षित ने अस्पताल जाने के बजाय स्वदेशी दवाइयों से उपचार पर जोर दिया।

भिलाई में अक्षय पात्र फाउंडेशन के पास उसी दिन शाम 4 बजे से उनका व्याख्यान होना था। लेकिन तबियत ठीक नहीं होने से वे दया सागर के दुर्ग स्थित निवास पहुँचे। यहाँ पर बाथरूम में वे गिर गये। लेकिन अस्पताल नही जाने की जिद पर अड़े रहे।

बात बाबा रामदेव तक पहुँची और उन्होंने राजीव दीक्षित से फोन पर चर्चा करते हुए अस्पताल में भर्ती हो जाने के लिए राजी कर लिया। उन्हें तत्काल सेेक्टर 9 अस्पताल ले जाया गाय। यहाँ पर डॉ.शशिकांत सक्सेना ने उनका प्रारंभिक उपचार तो किया लेकिन हृदयरोग से संबंधित बेहतर ईलाज की सुविधा नहीं होने की चलते उन्हें बीएसआर अपोलो अस्पताल रिफर कर दिया गया।

यहाँ डॉ.दिलीप रत्नानी के देख-रेख में उपचार शुरू हुआ। लेकिन रात 1 से 2 बजे के बीच राजीव दीक्षित की मौत हो गई। उस वक्त डॉ.रत्नानी ने उन्हें गंभीर हृदयाघात होने की जानकारी प्रशासन और मीडिया को दी थी। बाद में बिना पोस्टमार्टम कराये ही 1 दिसंबर 2010 को दीक्षित का शव हवाई मार्ग से गृह नगर भेज दिया गया।

बताते हैं राजीव दीक्षित का जन्म 30 नवंबर 1967 को हुआ था और वर्ष 2010 में जन्मदिन के दिन ही उनकी मौत हो गई। उन्होंने 5 जनवरी 2009 को भारत स्वाभिमान आंदोलन का गठन किया था। इस आंदोलन के जरिये उन्होंने देश के लोगों में स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग करने लगातार प्रेरित किया।

बाद में उन्होंने बाबा रामदेव के साथ मिलकर विदेशी कम्पनियों के खिलाफ अभियान तेज कर दिया था। जिससे वे मल्टीनेशनल कम्पनियों के अघोषित तौर पर निशाने में आ गये थे। बावजूद इसके उनकी मौत को सामान्य हृदयाघात बताकर शव का पोस्टमार्टम नहीं कराये जाने को गंभीर चूक मानी जा रही है। जबकि उनका शव नीला पड़ जाने की अंदरूनी स्तर पर चर्चा उस वक्त सुनी गई थी।

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