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छत्तीसगढ़ समाचार : यहाँ नेत्रहीन बच्चे ब्रेल लिपि से करते हैं रामायण पाठ, सुंदरकाण्ड से मोह लेते हैं सबका मन

ईश्वर की आराधना के लिए जरुरी नहीं कि हमारी आंखे हो। बिना आंखों के भी हम ईश्वर का ध्यान उसकी उपासना कर सकते है। यह बात कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ में संचालित नेत्रहीन विद्यालय में साफ देखी जा सकती है।

छत्तीसगढ़ समाचार : यहाँ नेत्रहीन बच्चे ब्रेल लिपि से करते हैं रामायण पाठ, सुंदरकाण्ड से मोह लेते हैं सबका मन
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रविकांत सिंह राजपूत, कोरिया। ईश्वर की आराधना के लिए जरुरी नहीं कि हमारी आंखे हो। बिना आंखों के भी हम ईश्वर का ध्यान उसकी उपासना कर सकते है। यह बात कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ में संचालित नेत्रहीन विद्यालय में साफ देखी जा सकती है। ईश्वर की आराधना के लिए जरुरी नहीं कि हमारी आंखे हो। बिना आंखों के भी हम ईश्वर का ध्यान उसकी उपासना कर सकते है। यह बात कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ में संचालित नेत्रहीन विद्यालय में साफ देखी जा सकती है। मनेंद्रगढ़ के आमाखेरवा इलाके में बीते कई वर्षों से नेत्रहीन विद्यालय का संचालन किया जा रहा है। इस स्कूल में छत्तीसगढ़ के साथ ही साथ मध्यप्रदेश के कई जिलों के दिव्यांग बच्चे पढ़ाई करते हैं। पढ़ाई के साथ ही साथ बच्चों को संस्कारित करने के लिए इस स्कूल में कई सामाजिक व धार्मिक आयोजन भी समय समय पर किए जाते हैं। इन आयोजनों में दिव्यांग बच्चे पूरे उत्साह के साथ शामिल होते हैं।
कोरे कागज की तरह दिखती है रामचरित मानस
इन आयोजनों में प्रत्येक माह के अंतिम शनिवार को होने वाला रामचरित मानस का पाठ अपने आप में अनूठा होता है। जब ये दिव्यांग बच्चे समूह में बैठकर सु्ंदरकांड का पाठ करते हैं तो ऐसा लगता है कि कोरे कागजों पर ये बच्चे अपनी उंगलियां फेर रहे हों, लेकिन हकीकत में वे कोरे कागज नहीं होते वरन उनमें ब्रेल लिपि में वे श्री राम चरित मानस की चौपाईयां अंकित होती हैं जिन्हें बच्चे अपनी उंगलियों के सहारे तेजी से पढ़ते हैं।
मन की आंखों से करते हैं अनुभव
रामायण को इतनी तेजी से पढ़ने के लिए बच्चों को काफी प्रयास करना पड़ता है और उसके बाद ये दिव्यांग उसे साफ साफ पढ़ पाते है। इन दिव्यांग बच्चों का मानना है भले ही ईश्वर ने उन्हें आंखे न दी हो, लेकिन आम इंसान की तरह उनमे भी अपने ईश्वर, अपने देश, अपने समाज के प्रति सोचने समझने की क्षमता है। ईश्वर का अनुभव करने के लिए भले ही हमारे पास भैतिक रुप से आंखे नहीं हैं, लेकिन हम उन्हें अपने मन की आंखों से जरुर अनुभव करते हैं।

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