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कोल इंडिया के इस खदान में है भूतों का डेरा, यहां से गुजरते वक्त कांप उठती है लोगों की रूह

जिले के चिरमिरी निगम क्षेत्र के ग्राम साजापहाड़ की कोल माइंस भूतो के बसेरे के नाम से पहचाना जाता है। अक्सर यहां के मांइस को लेकर कई किस्से चर्चा में रहे हैं।

कोल इंडिया के इस खदान में है भूतों का डेरा, यहां से गुजरते वक्त कांप उठती है लोगों की रूह

रविकांत राजपूत, कोरिया: जिले के चिरमिरी निगम क्षेत्र के ग्राम साजापहाड़ की कोल माइंस भूतो के बसेरे के नाम से पहचाना जाता है। अक्सर यहां के मांइस को लेकर कई किस्से चर्चा में रहे हैं। आज भी लोग इस माइंस के सामने से गुजरते वक्त सहम जाते हैं। यह मांइस अकसर किसी न किसी कारण विवाद और लोगों के डर का कारण बना रहा है।

लोगों का मानना है कि दशकों पहले यहां के खान दुर्घटना हुई थी, एक पल्ली (शिफ्ट) के सारे मजदूर यहां दब गए थे, जिन्हें बाहर नहीं निकाला गया। जिनकी चिखें और काम करने की आवाजें आज भी यहां आती है। देर रात माइंस के करीब से अजीब आवाजें आती है, जो लोग बाइक से जाते हैं उन्हें भी डर लगता है बाइक को भी आकर्षित (खींचता) है ।जो लोगों के डर का कारण है।
मांइस के अंदर से आती है भयानक आवाज
आज विज्ञान का शोर है। विज्ञान तरक्की पर तरक्की किए जा रहा लेकिन कई जगह ऐसी भी है जहां के रहस्य का पता अभी तक नहीं चल पाया है। ऐसी ही एक कहानी चिरमिरी नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली गांव साजापहाड़ की है। रोजगार की कमी और जंगली जानवरों के साथ भूतों के खौफ से धीरे-धीरे पूरा गांव खाली हो चला है।
हालांकि मांइस में अब पानी भर चुका है, इसके मुहाने को भी दिवार से बंद कर दिया गया है। गांव वालों के मुताबिक, यहां काम करने वाले मजदूर उत्तर प्रदेश के गाजीपुर बलिया मऊ गोरखपुरजिले तरफ के थे, ठेकेदार और मैनेजर के बीच किसी बात को लेकर झगड़ा हुआ था, जिसका खामियाजा यहां काम करने वालें मजदूरों को भूगतना पड़ा। एक खान दुर्घटना में यहां एक पल्ली के सारे मजदूर दब गए, ऐसा आरोप है कि दोनों के अनबन के कारण ब्लास्ट कर मजदूरों को दबा कर मार डाला गया।
ग्रामीणों ने बताया कि कुछ मजदूरों की शव को निकाला गया, लेकिन 30 से 35 मजदूर मांइस में ही फंस गए। मांइस की छत बैठने के बाद ठेकेदार द्वारा मांइस का दरवाजा भी बंद कर दिया गया। अब ग्रामिणों का कहना है कि उन्हें वहां हरपल ऐसा अनुभव होता है कि आज भी खदानों में काम कर रहें है, लेकिन वह किसी को यह बात बताने में डरते है।
मिर्जापूर के रहने वाले है बुजूर्ग ग्रामिण ननकूराम ने बताया कि वह 1968 में यहां मालकट्टा का काम करते थे, एक गाड़ी भरने पर 9 रुपए मिलता था। मैनेजर सैगल साहेब और शहडोल के धोड़ी ठेकेदार कोयला निकलवाने का काम करते थे।
ग्रामीण मनोज यादव ने बताया कि आज भी डर लगता है, ऐसा लगता है मजदूर काम करें हो, रात में उनके काम करने की आवाजें सुनाई देती है, शाम ढलते ही गाय भैंसो का सहारा लेकर आ जाते है, उसके बाद कोई भी उस ओर नहीं जाता।
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