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छत्तीसगढ़ समाचार : DMF के नाम पर फिजूल खर्च करने वाले कलेक्टरों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, भूपेश सरकार ने लिया रिव्यू कराने का फैसला

डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड के नाम पर फिजूल अनाप-शनाप पैस बहाने वाले कलेक्टरों की मुश्किलेें अब बढ़ सकती हैं। क्योंकि भूपेश सरकार ने अब इसका रिव्यू कराने का फैसला लिया है। उनका मानना है डीएमफ की नियमावली के तहत पैसा खर्च नहीं किया गया है।

छत्तीसगढ़ समाचार : DMF के नाम पर फिजूल खर्च करने वाले कलेक्टरों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, भूपेश सरकार ने लिया रिव्यू कराने का फैसला
अंकुश शर्मा, रायपुर। डिस्ट्रिक्ट माईनिंग फंड के नाम पर फिजूल अनाप-शनाप पैस बहाने वाले कलेक्टरों की मुश्किलेें अब बढ़ सकती हैं। क्योंकि भूपेश सरकार ने अब इसका रिव्यू कराने का फैसला लिया है। उनका मानना है डीएमफ की नियमावली के तहत पैसा खर्च नहीं किया गया है।
बता दें नवंबर 2018 तक डीएमएफ के तहत विभिन्न माईनिंग से 27 जिलों को 3336 करेाड़ रुपए का अंशदान प्राप्त हुआ था। इसमें से कलेक्टरों ने 2400 करोड़ रुपए खर्च कर डाले हैं।

अधिकांश राशि गैर कामों में खर्च की गई हैं। वहीं सरकारी के करीबी अफसरों का कहना है कलेक्टर्स ने अपनी छवी चमकाने के लिए करोड़ों रुपए बहा डाले। डीएमएफ के कामों कमीशन खारेी का खेल भी जमकर हुआ हैं।
27 में से 8 कलेक्टरों के खिलाफ सरकार के पास पुख्ता शिकायत पहुंची है कि डीएमएफ के काम कमीशन लेकर स्वीकृत किए गए हैं। बता दें पर्यावरण को दुरुस्त करने के लिए मिले पैसों से चेन्नई, मुंबई, और बेंगलुरु की आईटी कंपनियों को लाखों रुपए भुगतान किए गए।
वहीं दिल्ली की कई पीआर कंपनियों की इसमें चांदी हो गई। क्योंकि कलेक्टरों की ब्रांडिंग करने के लिए पीआर एजेंसियों ने पैसे लेकर नेशनल मीडिया में कलेक्टरों को हीरो बनाया गया।
गौरतलब है भारत सरकार ने डीएमएफ का प्रावधान ही इसलिए किया था कि माईनिंग इलाके के पर्यावरण और जनता के हितों की रक्षा के लिए इस राशि का उपयोग किया जा सकें... लेकिन, हुआ उल्टा...।
डीएमएफ का जो फंड आया था वह स्थानीय लोगों पर खर्च होना था। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इस पूरे मामले में बढ़ी कार्यवाही देखने को मिल सकती है।दरअसल, राज्य के खनन प्रभावित इलाकों में लोगों की मूलभूत जरूरतों को पूरा करने की बजाय लगातार आरोप लग रहे थे कि इन राशियों का उपयोग शहरों में भौतिक विकास में किया जा रहा है।
वहीं कलेक्टरों पर भी राशि का मनमानी ढंग से उपयोग करने का भी आरोप लग रहे थे। कई जिलों में तो डीएमएफ की राशि कलेक्टरों की पॉकेट मनी बन गई थी। मतलब कलेक्टर जहां चाहे वहां इन राशि का उपयोग अपने मुताबिक कर रहे थे।
बता दें पिछले साल सेंटर फॉर साइंस एंड इनवायरमेंट ने रायपुर में एक कार्यशाला की थी। जिसमें राज्य के खनन प्रभावित इलाकों के प्रतिनिधि भी शामिल हुए थे। जिसके बाद यह निष्कर्ष निकला की डीएमएफ से प्रभावित इलाकों को कोई खास मदद नहीं मिली।
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