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Chhattisgarh: सपनों में जान, हौसलों से उड़ान...मिसाल बना दिव्यांग परमेश्वर

''मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके हौसलों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।'' ये लाइनें कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ में संचालित नेत्रहीन विद्यालय में पढ़ने वाले 14 वर्षीय परमेश्वर पर पूरी तरह खरी उतरती है।

Chhattisgarh: सपनों में जान, हौसलों से उड़ान...मिसाल बना दिव्यांग परमेश्वर

रविकांत सिंह राजपूत, कोरिया। 'मंजिले उन्हीं को मिलती है जिनके हौसलों में जान होती है। पंखों से कुछ नहीं होता हौसलों से उड़ान होती है।' ये लाइनें कोरिया जिले के मनेंद्रगढ़ में संचालित नेत्रहीन विद्यालय में पढ़ने वाले 14 वर्षीय परमेश्वर पर पूरी तरह खरी उतरती है।

परमेश्वर के जन्म से ही दोनों हाथ नहीं है। एक आंख से थोड़ा थोड़ा दिखाई देता है। इतना होने के बावजूद भी परमेश्वर किसी का सहारा लिए बिना वह खुद अपने जरुरी कामों को ऐसे पूरा करता है जिसे देखकर लोगों को सहसा यकीन नहीं होता।

मनेंद्रगढ़ के आमाखेरवा इलाके में बीते 20 वर्षों से नेत्रहीन विद्यालय संचालित है। इस स्कूल में लगभग 50 दिव्यांग बच्चे रहते है। इन दिव्यांग बच्चों के हाथ पैर सही सलामत है, लेकिन इन्हें दिखाई नहीं देता। वहीं इन सबके पीछे एक ऐसा भी छात्र है जिसके दोनों हाथ भी नहीं है।

लेकिन हाथों के बिना ही परमेश्वर अपने पैरों से ही भोजन कर लेता है, और पैरों से ही वह अपनी पढ़ाई भी करता है। इसके अलावा कपड़े पहनने से लेकर उसे अपनी दिनचर्या के लिए किसी दूसरे का सहारा नहीं लेना पड़ता।

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करता है भजन र्कीतन

भले ही कुदरत ने परमेश्वर के साथ्र बहुत नाइंसाफी की है, लेकिन उसके चेहरे पर कभी भी स्कूल के लोगो ने सिकन नहीं देखी। उससे पूछने पर कि बिना हाथों के वह कैसा महसूस करता है तो उसका जवाब था कि दूसरे लोग जो काम हाथों से करते है वह उन्हीं कामों को अपने पैरो से कर लेता है। वहीं पढ़ाई के साथ ही वह सांस्कृतिक गतिविधियों में भी बढ़ चढ़ कर शामिल होता है। हाथ नहीं होने के बावजूद भी वह झांझ को किसी अच्छे कलाकार की तरह बजाता है, जिसे देखकर लोग हैरत में पड जाते हैं।

हर काम खुद करता है

इस स्कूल के शिक्षक बताते है कि जब परमेश्वर स्कूल में दाखिले के लिए आया तो उन्हें लगा कि वह यहां रहने वाले अन्य बच्चों के साथ कैसे रह पाएगा। तब उन्होंने परमेश्वर की परीक्षा ली तो उन्होंने पाया कि बिना हाथों के ही अपने मुंह में चाभी फंसाकर ताला खोल लेता है। शौचालय में भी उसे कोई दिक्कत नहीं होती और खाना खाने के लिए भी जिस तरह लोग अपने हाथों का इस्तेमाल करते है। वह अपने पैरों में ही चम्मच फंसाकर बड़ी आसानी से खाना खा लेता है।

बनना चाहता है कलेक्टर

बहरहाल परमेश्वर का यह जज्बा उन लोगो के लिए मिसाल है जो हाथ पैर सही सलामत होने के बाद भी दूसरों का सहारा खोजते रहते हैं। परमेश्वर न केवल लोगों के लिए एक मिसाल है वरन वह पढ़ लिखकर कलेक्टर बनकर देश की सेवा करना चाहता है। उसके अरमानों को कब पंख लगेंगे उसमें तो काफी वक्त है, लेकिन इतना जरुर है कि जिस प्रकार परमेश्वर अपनी मंजिल की ओर कदम बढ़ा दिए है तो एक न एक दिन उसे उसकी मंजिल जरुर मिलेगी।

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