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CG Elections 2018: ''सक्ती'' में ये बनेगा मुख्य मुद्दा

राजशाही शासनकाल के रियासत और अंग्रेजी हुकूमत के समय के सबसे पुरानी तहसील सक्ती को जिला बनाने की मांग तब जोर पकड़ी जब प्रदेश में थोक में नए जिलों का गठन हुआ।

CG Elections 2018:

राजशाही शासनकाल के रियासत और अंग्रेजी हुकूमत के समय के सबसे पुरानी तहसील सक्ती को जिला बनाने की मांग तब जोर पकड़ी जब प्रदेश में थोक में नए जिलों का गठन हुआ।

सक्ती क्षेत्र के रहवासी तब से लेकर आज तक सक्ती को जिला बनाने की मांग करते आ रहे हैं। नए राज्य गठन के बाद 2013 के चुनाव के पहले राज्य सरकार ने छत्तीसगढ़ के 16 जिलों का विस्तार करते हुए 11 नए जिले बनाए तो सक्तीवासियों को भी सक्ती के जिला बनने की उम्मीद जगी।

लेकिन, तब यहां कांग्रेस की विधायक थी, परन्तु इसके बाद 2013 के चुनाव में भाजपा की जीत हुई और डॉ. खिलावन साहू विधायक बने, जिनसे लोगों की उम्मीद और बढ़ गई, परन्तु उनका कार्यकाल समाप्त होने को है और सक्ती को शिक्षा जिला का दर्जा दिलाने के अलावा और कोई बड़ी उपलब्धि नहीं मिली।

वर्तमान में यहां वन क्षेत्र के गांवों के अलावा आसपास के गांव भी सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाओं से वंचित है। सक्ती नगरपालिका का भी नगर के अनुरुप विकास नहीं हो पाया है। ये सभी मुद्दे चुनाव में प्रमुख होंगे।

शिक्षा जिला का दर्जा मिलना बड़ी उपलब्धि

यहां 55 साल तक जिन्होंने राज किया है, वे अब विकास देख रहे हैं। पहले यहां एकमात्र सड़क थी, जो आज 125 हो चुकी हैं। पिछले साढ़े 14 सालों में इस विधानसभा की तस्वीर और तकदीर बदल चुकी है। सबसे बड़ी उपलब्धि सक्ती को शिक्षा जिला का दर्जा दिलाना है। राजधानी छोड़ 90 विधानसभा में सर्वाधिक विकास सक्ती में हुआ।
डॉ़. खिलावन साहू (विधायक)

पाम्पलेट छपवाकर दिखा रहे विकास

वर्तमान विधायक की निक्रिष्यता से क्षेत्र का समुचित िवकास नहीं हो पाया है। विधायक भले ही पाम्पलेट छपवाकर विकास दिखा रहे हो, लेकिन सिंचाई की सुविधा से कई गांव वंचित है, तो कई गांव में अभी पक्की सड़क नहीं बनी है। पूर्व कार्यकाल में विपक्षी विधायक होने के बावजूद हमने जो कार्य कराए, वह इस पर भारी है।
सरोजा मनहरण राठौर (पूर्व विधायक)

ये हैं प्रमुख पार्टियों के प्रबल उम्मीदवार

  • भाजपा: वर्तमान विधायक खिलावन साहू के साथ पूर्व मंत्री मेघाराम साहू, और उनके बेटे घनश्याम साहू, प्रीतम गबेल, अन्नपूर्णा राठौर और ओमप्रकाश राठौर प्रमुख दावेदार हैं।
  • कांग्रेस: पूर्व विधायक सरोजा राठौर, नपा अध्यक्ष श्यामसुंदर अग्रवाल, मनहरण राठौर, जिपं उपाध्यक्ष अजीत साहू, जिला पंचायत सदस्य अमित राठौर के नामों की चर्चा है।

राजा से बने मंत्री फिर .....

रियासत काल के सक्ती राजघराने के राजा सुरेन्द्र बहादुर सिंह अविभाजित मध्यप्रदेश शासनकाल में विधानसभा का चुनाव जीतकर न केवल सक्ती के विधायक बने, बल्कि उन्हें मंत्री भी बनाया गया, लेकिन इसके बाद 1998 के चुनाव में लवसरा गांव के सरपंच रहे मेघाराम साहू से पराजित होना पड़ा। इस हार के बाद रियासतकाल में सक्ती राजा रहे सुरेन्द्र बहादुर मंत्री तो दूर विधायक भी नहीं बन सके और अब वे सामान्य जन की तरह हैं।

2008 समीकरण:  कांग्रेस का दबदबा, राज परिवार से अलग चेहरे को चुन

प्रत्याशी पार्टी मत जीत का

सरोजा राठौर कांग्रेस 47368 अंतर
मेघाराम साहू भाजपा 37976 9392

8.4% से वोट से जीती कांग्रेस

हो रहा है विकास, कमी है तो भरपाई हो सकती है

सक्ती विधानसभा में लगातार विकास कार्य हो रहे हैं। मेरे कार्यकाल में भी अनेकों कार्य हुए थे और इस बार भी मुख्यमंत्री ने युवा चेहरे को मौका देकर खिलावन साहू को मैदान में उतारा था और वे विधायक बने।
मुख्यमंत्री ने सहृदयता से विधायक के हर आवेदन पर स्वीकृति दी है और यहां अनेक विकास कार्य हुए हैं। कहीं कोई कमी हो तो उसकी भरपाई हो सकती है।
मेघाराम साहू, पूर्व मंत्री एवं जिलाध्यक्ष भाजपा

जनता जनार्दन

जनता से विधायक की दूरियां परेशानी का सबब

सक्ती विधायक खिलावन साहू सरल, सहज और स्वयं स्वभाव के लिए जाने जाते हैं, लेकिन इसके बाद भी क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों और जनता से उनकी बढ़ती दूरी चिंता का विषय है।
अधिकतर गांव के पंचायत प्रतिनिधि उनसे रुठे हुए है, वहीं अपनी समस्या और काम लेकर आने वाली जनता भी उनसे निराश हो चुकी है। विधानसभा क्षेत्र में स्कूल, सड़क, स्वास्थ्य की परेशानियों जस की तस बनी हुई है। दूर-दराज के गांवों में तकलीफें और अधिक है। बारिश के मौसम में जहां सड़कें, गलियां पानी से भर जाती हैं वहीं बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है।

केवल अपने गांव के विधायक

सक्ती विधानसभा क्षेत्र की जनता इस बार विधायक चुनकर पछता रही है। यहां के विधायक नगरदा गांव से आगे विकास की नहीं सोच पाए है। वे हर काम अपने गांव में ही कराना चाहते है, जिससे क्षेत्र का विकास सिमटकर रह गया है।
अजीत साहू

प्रशासनिक कसावट की कमी

क्षेत्र में विकास कार्य तो जैसे-तैसे हो रहे हैं, लेकिन सत्तारुढ़ दल के विधायक होने के बावजूद यहां प्रशासनिक कसावट नहीं होना विधायक की सबसे बड़ी कमजोरी है। इसके कारण जनता की समस्याओं का समाधान नहीं होता और शिकायतें बढ़ी हैं।
देवेंद्रनाथ अग्निहोत्री

2013 समीकरण: विकास की लचर स्थिति को देखते हुए जनता ने बदलाव किया

प्रत्याशी पार्टी मत जीत का

खिलावन साहू भाजपा 51577 अंतर
सरोजा राठौर कांग्रेस 42544 9033
6.6% वोट से जीती भाजपा

रियासत के बाद पांच दशक राजघराने ने किया राज

यह विधानसभा क्षेत्र सक्ती रियासत की कर्मभूमि रही है। यहां के राज परिवार ने आजादी के बाद से लगातार 50 सालों तक राज किया है। इस दौरान 1952 के पहले चुनाव में कांग्रेस से टिकट नहीं मिलने पर भी सक्ती महाराज लीलाधर सिंह चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
इसके बाद से 1998 तक यहां राज परिवार के सदस्य विधायक बनते आए, जिनमें सर्वाधिक कार्यकाल सक्ती राजा सुरेन्द्र बहादुर का रहा। हालांकि इसके बाद 1998 के चुनाव में लवसरा गांव के सरपंच रहे भाजपा उम्मीदवार मेघाराम साहू से कांग्रेस प्रत्याशी सक्ती राजा को पराजित होना पड़ा।
इसके बाद मेघाराम लगातार दो बार विधायक बने और 2008 के चुनाव में उन्हें कांग्रेस प्रत्याशी श्रीमती सरोजा राठौर से पराजित होना पड़ा। इसके बाद 2013 के चुनाव में जनता ने फिर से बाजी पलटी और तत्कालीन विधायक सरोजा राठौर भाजपा के नए चेहरे के रूप सामने डॉ. खिलावन साहू से पराजित हुई।
इस तरह से 1998 तक राजा-रजवाड़ा के हाथों में रही सक्ती विधानसभा की कमान दो दशक से भाजपा और कांग्रेस के अलग-अलग लोगों के पास चली गई।

महंत के नाम की चर्चा

सक्ती विधानसभा क्षेत्र में इस बार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष डॉ. चरणदास महंत के चुनाव लड़ने की भी चर्चा है। चूंकि इसी विधानसभा क्षेत्र में डॉ. महंत का गृहग्राम सारागांव भी आता है इसलिए उनके चुनाव लड़ने की संभावना भी जताई जा रही है। ऐसे में डॉ. महंत यदि चुनावी समर में उतरते हैं तो यह क्षेत्र हाईप्रोफाइल हो जाएगा।
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