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CG Cinema : जब संतोष जैन एक साथ बने राम और रावण, पुष्पेंद्र भी हुए अपमानित

'विश्व रंगमंच दिवस' पर कलाकारों ने ताजा की पुरानी यादें, चौंकाने वाले वाकयों और दुर्लभ तस्वीरों के साथ पेश है यह खास रिपोर्ट-

CG Cinema : जब संतोष जैन एक साथ बने राम और रावण, पुष्पेंद्र भी हुए अपमानित
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रायपुर। छत्तीसगढ़ी सिनेमा के लिए काम करने वाले कलाकारों के एक बड़े हिस्से की पृष्ठभूमि रंगमंच वाली रही है। इसीलिए, कोरोना वायरस के खौफनाक माहौल के बावजूद छत्तीसगढ़ी कला और संस्कृति के प्रति समर्पित भाव से काम करने वालों ने 'विश्व रंगमंच दिवस' को प्रासंगिक तरीके से सेलिब्रेट करना नहीं भूला। छत्तीसगढ़ी सिनेमा के जाने-माने चेहरों ने आज इस मौके पर रंगकर्म के अपने संस्मरणों को अभिव्यक्त किया है। 'हरिभूमि' ने सोशल मीडिया पर शेयर किए गए उन्हीं संस्मरणों और तस्वीरों को पाठकों के लिए सहेजने की कोशिश की है। जितनी सामग्री 'हरिभूमि' तक पहुंच सकी हैं, वे बेहद दिलचस्प हैं। पुरानी बातें और उन बातों की प्रामाणिक गवाही देने वाली तस्वीरें निश्चित ही पाठकों को रूचिकर लगेंगी। पेश है इस मौके पर एक खास रिपोर्ट :-



रंगकर्म के जानकार, कई नाटकों के निर्देशक, छत्तीसगढ़ी फिल्म 'माटी के लाल' के निर्देशक योग मिश्र लिखते हैं -

विश्व रंगमंच दिवस की शुभकामनाएं....चीनी वायरस की इस विश्व त्रासदी और लाकडाऊन की विवशता में विश्व रंगमंच दिवस पर 'अभिनट फिल्म एवं नाट्य फाऊँडेशन' द्वारा आज शाम 6 बजे फेसबुक लाईव में अपने नाटक "कल्प-दंतेवाड़ा" का नाट्यपाठ किया जायेगा।

बस्तर के दंतेवाड़ा में 6 अप्रेल 2010 को घटित इस लोमहर्षक घटना, जिसमें हमारे 76 जवान शहीद हुए थे, उसी ताड़मेटला काँड पर आधारित है यह नाटक।

'कल्प-दंतेवाड़ा' जरूर सुनिए और रंग विमर्श का हिस्सा बनिये।

साथियों आज विश्व रंगमंच दिवस है। आज का दिन रंगकर्मियों के जुनून, उत्साह और साहस को सलाम करने का दिन है। बिना प्रेक्षागृह, बिना मूलभूत सुविधाओं के, सीमित संसाधन में अपने दम पर सतत रंगकर्म में सक्रिय उन तमाम रंगसेवकों को और उनके जज्बे-जुनून को मेरा सलाम है, जो अनेक कठिनाईयों के बाद भी अपने-अपने स्तर पर रंगकर्म कर रहे हैँ। और वहीं हमारी सरकारों के साँस्कृतिक प्रयासों के लिए यह बेहद शर्मनाक है कि हमारे छत्तीसगढ़ में जहाँ प्राचीन नाट्यशाला के अवशेष तो मौजूद हैं, पर हकीकत में पूरे प्रदेश में कहीं भी एक भी सर्वसुविधायुक्त ऐसा एक भी प्रेक्षागृह नजर नहीं आता जो संस्कृति कर्मियों की सुविधाओं को ध्यान में रखकर बनाया गया हो। जो बने हैं अपनी अनेक त्रुटियों की वजह से साँस्कृतिक प्रदर्शनों के अयोग्य साबित हुए हैं। चिंता होती है कि जो राज्य अपनी संस्कृति की रक्षा नही कर पा रहे हैं, वह भविष्य में अपना इतिहास कैसे सुरक्षित रख पाएँगे? उदाहरण है कि जिन राजा, महराजाओं और बादशाहों ने कला और संस्कृति का संरक्षण-संवर्धन किया, कलाकारों के मान प्रतिष्ठा का ध्यान रखा, वही शताब्दियों बाद आज भी इतिहास के पन्नों पर नजर आ रहे हैं।

संस्कृति कर्मी अपना पूरा जीवन झोंककर अपने राज्य की सँस्कृति को बचाए रखने का प्रयास करता रहा है। जिसके लिए संस्कृति कर्मियों ने अपना समूचा जीवन होम किया, लेकिन बदले में उसे उसके जीवन के आखरी पड़ाव में अपने राज्य और अपने समाज से मिलता क्या है ? घनघोर उपेक्षा, भुखमरी, बीमारी और समुचित ईलाज के अभाव में असमय मौत!

बीते वर्षों में अपना पूरा जीवन कला संस्कृति के लिये समर्पित कर जाने वाले ऐसे ही कला संस्कृति के सेवक गोविंदराम, रामलाल, चैतराम, किस्मत बाई, सुरूज बाई, खुमान साव, देवी लाल नाग, अमर दास, सूरज विराट और अभी हाल में फौत हुए भैया लाल हेड़ऊ जैसे न जाने कितने कलाकार राज्य और समाज की उपेक्षा और बेरूखी का शिकार होकर असीम दुख तकलीफें झेलकर असमय मौत के करीब पहुँच जाते हैं और अपना अंतिम समय बेहद कष्ट से गुजारते हैं।

रंगमंच दिवस पर उन तमाम रंगकर्मी साथियों का पुण्य स्मरण जो बीच राह में साथ छोड़ गए।

रंगमंच दिवस की शुभकामनाओं के साथ मंच पर सक्रिय समस्त रंगधुनियों को मेरा प्रणाम है।

रंगमर्मज्ञ योग मिश्र का 'विश्व रंगमंच दिवस' के मौके पर एक संस्मरण -

मैं 'प्रेमदेवल' था नाटक ने मुझे 'योग मिश्र' बना दिया...गौरमेंट स्कूल से मेरी नाटक की शुरूआत "चुनाव का टट्टू" गोल्डी के लिखे एक व्यंग्य नाटक से हुई थी। इस नाटक में अभिनय और निर्देशन भी मैंने ही किया था, क्योंकि स्कूल में हो रहे नाटक 'अनारकली' में मुझे आनंद वर्मा सर ने काम नहीं करने दिया था। युवराज को सलीम का रोल पहले दिया गया था। मैंने सलीम की रिडिंग बहुत अच्छे से किया था। यह मुझे ही नहीं और भी लोगों को लग रहा था लेकिन मुझे उस रोल से कुछ दिन बाद पता नहीं क्यों अलग कर दिया गया। तब मैंने अपनी क्लास के लड़कों को लेकर 'चुनाव का टट्टू' नाटक किया था। गौरमेंट स्कूल के वार्षिक समारोह में 'जापानी अदालत' नाटक प्रथम आया था। इसमें दिनेश दुबे और कुँज बिहारी शर्मा भूमिका कर रहे थे और चुनाव का टट्टू हमारा नाटक सेकण्ड आया था। इससे मुझे काफी कान्फिडेंस मिल गया था। पर मैंने डायरेक्शन बहुत बाद में मजबूरीवश प्रारम्भ किया। मेरा आकर्षण हमेशा अभिनय रहा। फिर मैंने रायपुर रंगमंच में शुरुआत स्कूल में पढ़ते हुए ही 1978-79 में अशोक मिश्र के निर्देशन में "एक था गधा उर्फ अल्लाहदाद खाँ" से की थी। जहाँ मुझे 'योग मिश्र' नाम मिला। मेरा स्कूल का नाम 'प्रेमदेवल' था और घर का नाम 'वियोग' जिसे अशोक मिश्र जो कि मेरे ममेरे भाई भी हैं। उन्होने बिना मेरी सहमति लिए मेरे नाम से वि विलोपित कर योग मिश्र नाम नाटक के ब्रोसर में दे दिया था। उन्हे मेरे स्कूल का नाम प्रेमदेवल ज्ञात नहीं था वे मुझे घर के नाम से जानते थे। ब्रोसर जब छपकर आया और आनंद चौबे ने सबको ब्रोसर पढ़ने दिया तब मैंने कहा मेरा तो नाम ही ब्रोसर में नहीं है। अशोक भैया बोले मैंने तेरे नाम से 'वि' हटाकर योग मिश्र कर दिया है। मैंने कहा मेरा नाम प्रेमदेवल है। ब्रोसर में मेरा नाम सही करो। नहीं तो मैं नाटक में काम नहीं करूँगा। सब मुझे समझाने के बाद पेन लेकर नाम सुधारने लगे। बीस पच्चीस नाम सुधरते तक अशोक भैया मुझे मेरे नये नाम का महत्व समझाते रहे। मैंने देखा हाथ से सुधारने में बहुत समय लग जाएगा और रिहर्सल ही नही हो पाएगी। मैंने कहा सुधारो मत नाटक खत्म होने पर परिचय में मैं अपना असली नाम ले लुँगा। मुझे क्या पता था कि 'प्रेमदेवल' नाम जिससे मैं अपने स्कूल के साथियों और परिचितों में इतने वर्षों तक जाना जाता था इस नाटक के साथ हमेशा-हमेशा के लिए मुझसे जुदा हो जाने वाला था।

आप गौर करें तो मेरे दोनों आरम्भिक दौर के नाटकों के नाम में एक चीज समान थी। लेकिन दोनों नाटकों में उसके नाम अलग थे। जब उसे गधा होकर आपत्ति नही थी तो मैं कैसे करता। नाम बदल जाने से कुछ नहीं बदलता यह मैं समझ चुका था। मैँने नाम के पीछे भागना फिर छोड़ दिया। जिसे जो लगता मुझे उस नाम से बुला लेता है। कई दोस्त मुझे आज भी अलग-अलग नाम से जानते और बुलाते हैं। मस्त रहें।

आप सबको रंगमंच दिवस की शुभकामनाएं....।



साहित्यकार, रंगकर्मी और छत्तीसगढ़ी फिल्म 'मोही डारे' के डायरेक्टर अनुपम वर्मा का एक संस्मरण -

मैं जब क्लास छठवीं में था, उस समय गवर्नमेंट स्कूल हमारे शिक्षक श्री आनंद वर्मा सर के निर्देशन में हम लोगों ने एक नाटक इंटर स्कूल कंपटीशन के लिए तैयार किया, जिसमें 'सद्गति' फ्रेम सलिल दीवान उस नाटक के हिस्सा थे यह मेरा मेरे जीवन का पहला रंगमंच में पदार्पण होने जा रहा था। हम लोगों ने नाटक तैयार किया जेआर दानी स्कूल में। हम लोगों का परफॉर्मेंस था मंच पर। जाने के पहले मैं बहुत कॉन्फिडेंट था। हमारा नाटक शुरू हुआ। मेरी इंट्री एक डायलॉग के साथ मंच के बीचो बीच जाकर खड़े होने की थी और वहां पर फिर दूसरे कलाकार के साथ मेरा संवाद था। मैं जैसे ही इंट्री मारा मंच के बीचो बीच खड़े होकर डायलॉग डिलीवरी की और सामने देखा दानी स्कूल की सारी स्टूडेंट हॉल में बैठी हुई थी। चूंकि आई कांटेक्ट कहां होना चाहिए इससे बेखबर मैंने भीड़ पर नजर डाल दी। साथी कलाकार अपना संवाद डिलीवर कर रहा था और मैं अपने डायलॉग बोलते हुए मंच के दूसरे कोने पर जा खड़ा हुआ। लेकिन कुछ सेकंड में मैंने अपने आप को रिकवर किया और दिए हुए चरित्र को निभाते हुए मैंने अपना पहला मंच प्रदर्शन को पूरा किया। यह वही मंच था जिसने मुझको सिखाया कि आप अपने अंदर के आत्मविश्वास को कैसे उपयोग में ला सकते हैं। उसके बाद मैंने शाहनवाज प्रधान शानू भैया के निर्देशन में लगातार उनके साथ जुड़कर मंचीय प्रस्तुति में लगा रहा। 11 साल की उम्र से थिएटर से जुड़े होने के कारण जीवन से जुड़ी बहुत सी बातों को लेकर मेरे को ऐसा लगता था कि मैं परिपक्व होता चला गया। आज विश्व रंगमंच दिवस पर 'कल्प दंतेवाड़ा' की प्रस्तुति के लिए योग भैया को अग्रिम शुभकामनाएं...।

अनुपम वर्मा का एक अन्य संस्मरण-

शाहनवाज प्रधान जी के साथ हम लोग एक स्ट्रीट प्ले खेल रहे थे जिसका नाम सारे सर्वनाम था। उस नाटक में मेरे साथ अपराजित शुक्ला अहफाज रशीद मले मन्ना अतुल मिश्रा आदि थे। उसमें एक डायलॉग यह था उंगली कटा कर शहीदों में नाम लिखा लिया। यह अपराजित को डिलीवर करना था। यह नाटक तेलीबांधा ओवर ब्रिज नहीं बन रहा था उसके समर्थन में हम लोगों ने प्ले किया था। अपराजित ने जैसे ही यह डायलॉग बोला कुछ हाथ पैर के मोमेंट थे उसने टाइट पैंट पहन रखी थी उसकी पेंट पीछे से बुरी तरीके से फट गई । 1 सेकंड के लिए हम सारे लोग सहम गए कि क्या हो गया पर तुरंत शानू भैया का ऐसा कंट्रोल आया कि हम लोगों ने अपना पूरा प्ले किया। चूंकि भीड़ बहुत थी और इतनी शालीनता से उस गंभीर हंसा देने वाली घटना को हम लोगों ने दबाते हुए उस नाटक को पूरा किया और नाटक पूरा होने के बाद शानू भैया के साथ हम लोग लगभग 15 मिनट मस्त होकर लोटपोट हंसते रहे। इस घटना ने सिखाया अगर परिस्थिति विपरीत हो तो आप उन से बाहर कैसे आते हैं हैप्पी रंगमंच दिवस...।



छत्तीसगढ़ी फिल्म प्रोड्यूसर एसोसिएशन के अध्यक्ष, लोक कला, रंगकर्म और सिनेमा के दीर्घानुभवी संतोष जैन एक संस्मरण व्यक्त करते हैं -

जब नाटक में 'नाटक' हुआ...बात 25,30 साल पुरानी है,जब हमारी संस्था क्षितिज रंग शिविर की धूम हुआ करती थी। महासमुंद में हमारे नाटक महासमुंद कला संगम कराया करती थी,वो भी टिकट लगा कर। इस संस्था के प्रमुख थे,प्रसिद्ध साहित्यकार लतीफ घोंघी,ईश्वर शर्मा,,मुकुंद शर्मा इत्यादि। उन्होंने हमें प्रेम साइमन का नाटक 'अरण्यगाथा' खेलने बुलाया,साथ मे शर्त रखी कि साइमन की पैदाइश महासमुंद की है इसलिए उन्हें भी एक रोल में लिया जाए। मैंने मना किया कि वो राइटर है,उन्हें उसी रूप में सम्मानित करे। मगर उनकी जिद के आगे झुकना पड़ा। नाटक की तारीख में हम सब दुर्ग के महाबीर बाल मंदिर में पहुंच गए। बस भी आ गयी, मगर साइमन का पता नही था। हमें बताया गया कि वे अपने एक दोस्त के साथ मोटरसायकल से वहां समय पर पहुंच जाएंगे। हम महासमुंद के लिए रवाना हो गए।

हम सब जिनमें बिनायक अग्रवाल,पल्ले ताम्रकार,नवल दुबे इत्यादि थे,शाम तक पहुच गए,तथा मेकअप व ड्रेस इत्यादि पहनकर साइमन का इंतज़ार करने लगे। हमारे साथ महासमुंद के लोग भी उत्सुक थे अपने प्रिय नाटककार की अगवानी करने। 6 बज गए,7 बजे नाटक था। दर्शक आने शुरू हो गए। हम लोग चिंता में पड़ गए कि अब क्या होगा, मैं राम की भूमिका में था और साइमन आखेटक याने रावण बने थे,सब चिंतित थे। हाल भरने वाला था,मै आयोजको पर खीज उतार रहा था। उधर जो पहले आखेटक का रोल करता था, वो नाराज होकर नही आया था।

मैंने सबसे पूछा कि वो रोल किसी को याद है क्या। सबने मना कर दिया, उधर नाटक देखने लोग हल्ला करने लगे। तभी दिमाग में आया कि पूरे ड्रामे में रावण राम के सामने नही आता। मैंने रावण का काला कोट और मूंछे लेकर बिनायक को पर्दे के पीछे खड़ा किया। राम का रोल करता और फिर तुरंत बिना पजामा बदले मुंछ लगाकर ओर काली शेरवानी पहन कर आखेटक का डायलॉग जो मुझे डायरेक्टर के नाते याद था,नाटक पूरा किया। दर्शको को नाटक पसंद आया। उन्हें पता भी नही चला कि इस नाटक के भीतर क्या नाटक हुआ था। आज भी इस घड़ी को याद कर कांप उठता हूं कि कहीं राम और रावण का आमने सामने संवाद होता तो,,,,,,,?



छत्तीसगढ़ी सिनेमा के सुपरस्टार करण खान एक संस्मरण कुछ यूं पेश करते हैं -

सर्वप्रथम विश्व रंगमंच दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं ...मैं आज जो कुछ भी हूं, उसके पीछे रंगमंच का बहुत बड़ा योगदान है। मुझे बचपन से ही अभिनय करने का शौक था, लेकिन सही दिशा मुझे पता नहीं थी कि कहां और कैसे अपने भीतर छिपी इस कला का प्रदर्शन मुझे करना है । मुझे इस बात का बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था। स्कूल टाइम में ही मुझे ( भारतीय जन नाट्य संघ ) इप्टा की जानकारी मिली। मुझे पता चलते ही साथ मैं इप्टा से जुड़ गया और मेरा पहला नाटक 'बंदिनी' जिसे श्री मिनहाज असद ( जो कि मेरे गुरु हैं) ने निर्देशित किया था और 'बंदिनी' के मुख्य पात्र के लिए उन्होंने मुझे चयन कर दिया। पहले ही नाटक से मुझे मुख्य किरदार में भारतीय जन नाट्य संघ इप्टा के मंच से प्रस्तुति करना अपने आप में बहुत ही गौरवान्वित क्षण था। मेरे साथ श्री घनश्याम सेंदरे जी , काशी नायक जी, स्वर्गीय स्वप्निल ढोक, विजय श्री मोजेश मैडम,अनिता साहू जी व बहुत ही नामचीन रंगमंच के कलाकार भी उस नाटक में थे।

यह क्रम तब से अब तक लगातार जारी है। मैं आज भी लगातार अभिनय कर रहा हूं। फिल्मों की व्यस्तता की वजह से वर्तमान में रंगमंच पर ज्यादा समय नहीं दे पाता हूं किंतु फिल्मों में मेरे अभिनय की जब दर्शक या फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े दूसरे लोग तारीफ करते हैं, उस पल अपने रंगमंच के अनुभवों व रंगमंच के गुरु व साथियों का धन्यवाद करता हूं।

मैं आज जो भी हूं उसके पीछे श्रेय रंगमंच को ही जाता है। मेरे परिवार ने सदैव मुझे मेरी कला के प्रदर्शन में सहयोग दिया, कभी कहीं परिवार की तरफ से कोई अवरोध नहीं रहा।

रंगमंच इप्टा के माध्यम से मैंने बहुत से नाटक किए, नुक्कड़ नाटक भी किए, स्वर्गीय श्री हबीब तनवीर जी के साथ शिविर भी अटेंड किया। जगदलपुर में जावेद अख्तर साहब के सामने डॉक्टर राही मासूम रजा द्वारा लिखित उपन्यास व श्री मिनहाज असद द्वारा निर्देशित टोपी शुक्ला की प्रस्तुति भी दी , जिसमें मैं और श्री काशी नायक मुख्य भूमिका में थे, जिसे देखकर श्री जावेद अख्तर (प्रख्यात गीतकार व फिल्मकार ) भाव विभोर हो गए थे और उनकी आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। उन्होंने मेरी व साथियों की पीठ थपथपाते हुए हम लोगों की हौसला अफजाई की और यह कहा कि जब भारत के सारे नौजवान चमक धमक और ग्लैमर की तरफ जा रहे हैं, ऐसी स्थिति में आप लोग रंगमंच के माध्यम से इतना बड़ा संदेश दे रहे हैं यह अपने आप में बहुत ही बड़ी बात है।

मुंबई में 'भूलवा राम का गमछा' जिसमें भी मैं मुख्य भूमिका में था, की जब इप्टा रायपुर ने प्रस्तुति दी तो वहां मौजूद सारे दर्शक, जिसमें मुंबई फिल्म इंडस्ट्री के व भारतीय रंगमंच के बहुत से जाने पहचाने चेहरे थे, सब लोगों ने खड़े होकर ताली बजाई थी और मुंबई इप्टा के निर्देशक ने हमारे निर्देशक श्री मिनहाज असद से कहा था कि मिनहाज जी आप मुंबई इप्टा के सारे कलाकार सारी स्क्रिप्ट सब कुछ रख लीजिए बदले में हमें अपनी रायपुर इप्टा के ये कलाकार दे दीजिए। यह भी हमारे लिए बहुत ही गौरवान्वित क्षण था।

बहुत कम शब्दों में अपने रंगमंच से जुड़ी यादें व अनुभवों को बता पाना मेरे लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है, क्योंकि ऐसी बहुत सी मीठी मीठी और अच्छी अच्छी यादें व घटनाएं मेरे रंगमंचीय जीवन से जुड़ी हुई है, जिन्हें बताते बताते शायद पूरी एक किताब भर जाए। जब मैंने रंगमंच की शुरुआत की थी, तब नवभारत पेपर में मेरे द्वारा मुख्य भूमिका निभाए गए नाटक 'गोड़ के धुर्रा' की बहुत ही तारीफ व मेरी तस्वीर मुख्य पृष्ठ पर छपी थी, जिसमें एक कॉलम में लिखा था कि रंगमंच रोटी नहीं देता, जिसे पढ़कर मैं बहुत दुखी हो गया था क्योंकि उस वक्त मैंने ठान लिया था कि आगे अभिनय की दुनिया में ही अपना कैरियर बनाना है। लेकिन आज बहुत ही गर्व के साथ मैं हर मंच से यह कहता हूं कि रंगमंच सिर्फ रोटी ही नहीं बल्कि रंगमंच हमें जिंदगी की वह हर सुख सुविधा व अनुशासन प्रदान करता है जिसके जरिए हम एक बेहतर जीवन बीता सकते हैं। मैं आज छत्तीसगढ़ी फिल्म, एल्बम्स में जो अपनी कला का प्रदर्शन कर रहा हूं, यह सिर्फ और सिर्फ रंगमंच की ही देन है।



छत्तीसगढ़ी फिल्मों के नामचीन कलाकार, रंगकर्मी, डायरेक्टर, वर्सटाइल आर्टिस्ट पुष्पेंद्र सिंह भी एक संस्मरण पेश करते हैं -

मेरे रंगमंच की शुरुआत में स्कूल में ही अपने पिता जी के निर्देशन कर हुई थी। घटना तो तब हुई जब मैं व्यवसायिक रंगमंच की तरफ गया। काम से पहले छोटे मोटे लडाई झगड़ों के बीच एक दिन भोपाल में रंगमंच निर्देशक श्री बंसी कौल साहब से मुलाकात हो गई। वो बोले शाम को यदि खाली हो तो गांधी भवन आ जाओ। मेरे नय नाटक का अभ्यास चल रहा है। पहले तो मैंने उनकी बात मज़ाक में ली पर शाम होते होते मुझे लगा चलो चल कर देख लेते हैं। शाम को जब गांधी भवन पहुंचा तो वहाँ कुछ लोग कसरत कर रहे थे, कुछ लोग लाठी घुमाने का अभ्यास कर रहे थे।

मुझे देखते ही बंसी दादा ने एक कोने में नीचे बैठने का इशारा किया। मैंने देखा खुद स्टूल पर बैठे है और मुझे नीचे बैठने के लिये कह रहे हैं। मुझे बुरा लगा। मैं वहाँ से वापस आ गया, लेकिन कुछ दिन बाद मन हुआ, तो फिर गांधी भवन पहुंच गया। फिर वही हुआ। पर ना जाने क्या सोच कर मैं नीचे बैठ गया। शाम से रात हो गई मैं वही बैठा रहा। सब देखते रहे पर किसी ने मुझसे बात नही की।

अभ्यास समाप्त होने के बाद मैंने ही बंसी जी से पूछा- आपने मुझे बुलाया था पर बात तक नही की। ऐसी अपमानित होने वाली जगह पर मैं नही आऊंगा। बंसी जी ने कहा "थियेटर करना है कुछ अच्छा सीखना है, बड़ा बनना है, तो अपनी बारी आने तक इंतजार को अपमान मत मानो। यह बात मैंने उसी वक्त गांठ बांध ली। अब नाटक, फिल्म सब करता हूं। अपनी बारी का इंतजार करता हूं, पर अपमानित नही होता। प्रणाम करता हूं मुझ जैसे कलाकार के निर्माता बंसी दादा को...।



(प्रोड्यूसर एसोसिएशन के अध्यक्ष संतोष जैन, वरिष्ठ पत्रकार अनिरुद्ध दुबे, स्टार करण खान, एक्टर डायरेक्टर पुष्पेंद्र सिंह, आलाप आर्टिस्ट एसोसिएशन के महासचिव, डायरेक्टर अनुमोद राजवैद्य,छत्तीसगढ़ फिल्म विकास बोर्ड के प्रथम अध्यक्ष राजेश अवस्थी, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा की लोक कला और संस्कृति पर बराबर कमांड रखने वाले दिग्गज क्षमानिधि मिश्रा जैसे जानकारों के सौजन्य से भी जानकारियां और तस्वीरें प्राप्त हुई हैं। सुविख्यात अभिनेता रजनीश झांझी ने पुराने प्ले के कुछ वीडियोज भी उपलब्ध कराए हैं, लेकिन कॉपीराइट संबंधी जोखिमों के कारण उन वीडियोज को नहीं दिखा पा रहे हैं। पुरानी और दिलचस्प तस्वीरें देखने के लिए इसके ठीक ऊपर स्लाइडर पर जरूर गौर फरमाएं।)

रिपोर्ट :- विनोद डोंगरे

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