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हौंसलों की उड़ान/ दिल में पढ़ाने का जज्बा, अकेली निकलीं, बनता गया कारवां, अब सैकड़ों साक्षर

दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो और कड़ी मेहनत की जाए, ताे तकदीर काे भी झुकना पड़ता है। इसे साबित किया वंदना चक्रवती ने। स्लम बस्तियों के बच्चे-बच्चियों और बुजुर्गाें को शिक्षा के अभाव में लुटते देख 6 साल पहले उन्होंने गरीबों को साक्षर करने का अकेल सफर शुरू किया।

हौंसलों की उड़ान/ दिल में पढ़ाने का जज्बा, अकेली निकलीं, बनता गया कारवां, अब सैकड़ों साक्षर

दिल में कुछ कर गुजरने का जज्बा हो और कड़ी मेहनत की जाए, ताे तकदीर काे भी झुकना पड़ता है। इसे साबित किया वंदना चक्रवती ने। स्लम बस्तियों के बच्चे-बच्चियों और बुजुर्गाें को शिक्षा के अभाव में लुटते देख 6 साल पहले उन्होंने गरीबों को साक्षर करने का अकेल सफर शुरू किया।

गृहस्थी का काम खत्म कर शिवानंदनगर और डब्ल्यूआरएस कॉलोनी की बस्तियों में बुजुर्गों को इकट्ठा कर पढ़ाना शुरू किया। थोड़े ही दिन में घरेलू महिलाएं एक-एक कर जुड़ने लगीं और करवां बनता चला गया।

आज दर्जनभर से अधिक स्लम बस्तियों के बुजुर्ग महिला और पुरुष साक्षर हो गए हैं। वे 50 की उम्र में ना सिर्फ अपना नाम लिखना-पढ़ना, बल्कि हिसाब करने लगे हैं। इससे उनके जीवन में फैला अंधेरा दूर हो गया है। अब उनके साथ शहरभर की दर्जनों बस्तियों में लोग पढ़ने-लिखने लगे हैं।

शुरुआत में आई थी दिक्कत

वंदना मुखर्जी बताती हैं, गुढ़ियारी, उरला और खमतराई इलाके की स्लम बस्तियों में अधिकतर महिला और पुरुष पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्हें नाम तक लिखना नहीं आता था। उनका लोग गलत तरीके से स्तेमाल करते थे। यह देख 6 साल पहले शिवानंदनगर के पास की उड़िया बस्ती के टुकेश्वरी, शीतला बाई, संतरात समेत दर्जनभर लोगों को साक्षर करने का सफर शुरू किया।
गृहस्थी का काम खत्म करने के बाद शाम को घंटेभर पढ़ाने बुजुर्गों को इकट्ठा किया और पढ़ाना शुरू किया। 3 महीना मेहनत करने के बाद उन्हें लिखना-पढ़ना आ गया।
पढ़ने से करते थे परहेज
वंदना बताती हैं, शुरुआती दौर में स्लम बस्तियों की खासकर महिलाएं पढ़ने में रुचि नहीं लेती थीं। घर के काम का बहाना कर पढ़ने आने से परहेज करतीं थीं, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझाइश देकर पढ़ने के लिए राजी किया और फिर वे सब रेगुलर पढ़ाई करने आने लगी हैं। अब वे अपने परिवार के खर्च का पूरा हिसाब रखती हैं।
40 की चल रही पढ़ाई
वंदना बताती हैं, वर्तमान में डब्ल्यूआरएस काॅलोनी में 40 से 45 महिला और पुरुष हैं, जिन्हें लिखने और पढ़ने की प्रारंभिक शिक्षा दी जाती है। इनमें बच्चों के साथ खासकर 40 साल और उसके ऊपर की उम्र के लोग हैं। राेज शाम को 6 से 7 बजे तक बस्ती के बीच में बैठाकर पढ़ाया जाता है। इसमें उनकी मदद शहीद कर्नल की पत्नी संगीता करती हैं।
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