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दस माह में 643 किडनी प्रभावित मरीज पहुंचे डीकेएस , 13 गंवा चुके जान, 3 करा रहे इलाज

सुपेबेड़ा सहित आधा दर्जन गांवों में फैले किडनी रोग की रोकथाम के लिए अभी भी स्वास्थ्य विभाग ठोस कदम नहीं उठा पाया। दस माह में यहां से 643 मरीज इलाज के लिए डीके अस्पताल पहुंचे, जिसमें में 13 लोगों ने जान गंवाई।

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दस माह में 643 किडनी प्रभावित मरीज पहुंचे डीकेएस , 13 गंवा चुके जान, 3 करा रहे इलाज643 kidney affected patients reaches DKS in 10 months, 13 lost lives, 3 undergoing treatment

रायपुर। सुपेबेड़ा सहित आधा दर्जन गांवों में फैले किडनी रोग की रोकथाम के लिए अभी भी स्वास्थ्य विभाग ठोस कदम नहीं उठा पाया। दस माह में यहां से 643 मरीज इलाज के लिए डीके अस्पताल पहुंचे, जिसमें में 13 लोगों ने जान गंवाई। वहीं तीन अभी भी अस्पताल में अपना इलाज करा रहे हैं। इसका खुलासा हुए सालभर से अधिक हो गए हैं और न्यूरोसर्जन के अभाव में डायलिसिस मशीन धूल खा रही है। ब्लाक स्तर पर वहां आधे से कम स्वास्थ्य कर्मी इस बीमारी की रोकथाम के लिए जूझ रहे हैं। देवभोग में पचास बिस्तर अस्पताल की योजना तो बनाई गई थी, लेकिन उस पर अब तक काम शुरू नहीं हो पाया।

सुपेबेड़ा तथा आसपास के गांवों में ग्रामीण जिस पानी का उपयोग करते हैं, उसमें फ्लोराइड और केडियम की मात्रा अधिक है, जो धीमे-धीमे किडनी को डेमेज कर रहा है। ग्रामीणों को स्वच्छ पानी पहुंचाने के लिए अब तक किसी तरह की योजना शुरू नहीं हो पाई। सुपेबेड़ा में किडनी प्रभावित मरीजों का खुलासा होने के बाद उनके इलाज की व्यवस्था राजधानी के डीके अस्पताल में की गई थी, जहां लगातार मरीज आकर अपना इलाज करवा रहे हैं और गंभीर स्थिति में पहुंचे तेरह से ज्यादा मरीज अपनी जान गंवा चुके हैं। आंकड़ों के मुताबकि देवभोग से 53 तथा सुपेबेड़ा से 9 मरीज इलाज के लिए यहां पहुंचे थे। सालभर पहले सुपेबेड़ा में निरीक्षण के दौरान डीके अस्पताल की ओर से मरीजों की जांच के लिए वहां एक डायलिसिस मशीन दी गई थी, जो अब तक धूल खा रही है। मशीन फ्यूज्ला (सेंट्रल लाइन) तैयार करनी पड़ती है, जो केवल न्यूरो सर्जन या फिर प्लास्टिक सर्जन ही कर सकता है, जिसकी नियुक्ति की वहां जरूरत ही नहीं समझी गई। हाल ही में देवभोग में एमडी मेडिसिन की नियुक्ति की गई है, लेकिन इससे डायलिसिस मशीन का उपयोग होना मुश्किल है। सूत्रों के मुताबिक प्रभावित गांवों में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए लगभग 150 स्टाफ के पद स्वीकृत हैं, जिसमें साठ से भी कम काम कर रहे हैं। सुविधा के लिए देवभोग में पचास बिस्तर अस्पताल की योजना भी बनाई गई थी, जो अभी भी ठंडे बस्ते में है।

डीकेएस में विशेष इंतजाम

डीकेएस में किडनी प्रभावित मरीजों के इलाज के लिए विशेष इंतजाम किया गया है। यहां नेफ्रोलाजिस्ट डा. आरके साहू, डा. प्रफुल्ल दावले तथा आठ जूनियर डाक्टर सेवा दे रहे हैं। सुपेबेड़ा से आने वाले मरीजों की देखरेख के लिए यहां देवभोग के एक युवक त्रिलोचन साहू को तैनात किया गया है। हाल में एम्स ने भी किडनी प्रभावित मरीजों के इलाज के लिए अपनी सेवा देने में सहमति जताई है।

दो दिन की सेवा

स्वास्थ्य विभाग द्वारा सुपेबेड़ा व आसपास के गांवों में मोबाइल मेडिकल यूनिट के माध्यम से हर सप्ताह सुपेबेड़ा में दो दिन चिकित्सकों एवं पैरामेडिकल स्टाफ़ द्वारा सेवाएं दी जा रही हैं। जिला अस्पताल में फ्लोराइड की जांच के लिए प्रयोगशाला स्थापित की गई है। यहां चौबीस घंटे में स्वास्थ्य सेवाओं के लिए कर्मचारी तैनात किया जाना था, जिस पर अभी काम शुरू नहीं हो पाया।

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